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Saudi Airport Blast Video : सऊदी एयरपोर्ट पर धमाके का वीडियो! | Airport Blast | World News |

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जंतर-मंतर का इतिहास: 300 साल पुराना खगोलीय केंद्र कैसे बना आंदोलनों का ठिकाना?

Explainer: दिल्ली के जंतर-मंतर का इतिहास केवल धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं है. इसका निर्माण 18वीं शताब्दी में खगोलीय गणनाओं और समय मापने के मकसद से कराया गया था. जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने खगोलीय वेधशालाओं की स्थापना कराई थी. दिल्ली की वेधशाला का निर्माण 1724 के आसपास हुआ. यहां विशाल पत्थर और ईंट से बने उपकरणों के जरिए सूर्य की स्थिति, समय और खगोलीय घटनाओं का अध्ययन किया जाता है. 

समय के साथ दिल्ली का राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व बढ़ा. संसद, सरकारी दफ्तरों और केंद्रीय सत्ता के प्रमुख संस्थानों के निकट होने के कारण जंतर-मंतर विरोध जताने वालों के लिए एक अहम स्थान बन गया. यहां प्रदर्शन करने से मीडिया का ध्यान आकर्षित करना और सरकार तक अपनी मांग पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान था. 

जंतर-मंतर कब बना देश के आंदोलनों का केंद्र?

ऐसा नहीं है कि जंतर-मंतर बनते ही यह लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया या फिर प्रदर्शन करने वालों को ये जगह काफी पसंद आ गई. इस जगह को विरोध-प्रदर्शनों की पहचान में कई दशक लग गए. पहले दिल्ली में वोट क्लब जैसे स्थानों पर बड़े प्रदर्शन होते थे. बाद में भीड़, सुरक्षा और यातायात से जुड़ी चिंताओं के कारण विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थानों की व्यस्था में बदलाव हुए. जंतर-मंतर धीरे-धीरे शांतिपूर्ण धरनों, भूख हड़तालों और जन अभियानों का प्रमुख केंद्र बन गया.  

यहां छोटे समूहों से लेकर देशव्यापी आंदोलनों तक ने अपनी आवाज उठाई. सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र संगठन, किसान, पूर्व सैनिक, खिलाड़ी और राजनीतिक दल अलग-अलग मुद्दों पर यहां जुटते रहे. जंतर-मंतर की खासियत यह थी कि यहां होने वाला प्रदर्शन संसद और केंद्र सरकार के नजदीक होने के कारण राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकता था. 

 

Photograph: (AI)

 

अन्ना हजारे का आंदोलन, जिसने देश की राजनीति बदल दी

जंतर-मंतर पर हुए सबसे चर्चित आंदोलनों में वर्ष 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शामिल है. सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने लोकपाल कानून की मांग को लेकर अप्रैल 2011 में यहां भूख हड़ताल शुरू की. आंदोलन को सामाजिक कार्यकर्ताओं, युवाओं और नागरिक समूहों का समर्थन मिला. 

भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई और जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर शुरू हुआ यह अभियान जल्द ही राष्ट्रीय चर्चा का विष्य बन गया. इसके बाद आंदोलन का विस्तार हुआ और दिल्ली के रामलीला मैदान सहित देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए. इस आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख चेहरों ने आगे चलकर आम आदमी पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभाई. 

निर्भया मामले के बाद भी उठी न्याय की आवाज

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया सामूहिक दुष्कर्म मामले के बाद देशभर में महिलाओं की सुरक्षा और यौन हिंसा के खिलाफ कड़े कानूनों की मांग उठी. दिल्ली में जगह-जगह प्रदर्शन  हुए और जंतर-मंतर भी न्याय की मांग से जुड़े सार्वजनिक विरोध का हिस्सा बना. 

इन प्रदर्शनों ने महिलाओं की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और आपराधिक न्याय व्यवस्था पर राष्ट्रीय बहस को तेज किया. इस दौर ने दिखाया कि जंतर-मंतर केवल राजनीतिक दलों का मंच नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर नागरिकों की आवाज उठाने की जगह भी रहा है. 

OROP आंदोलन: पूर्व सैनिकों की लंबी लड़ाई

वन रैंक वन पेंशन यानी OROP की मांग को लेकर पूर्व सैनिकों ने वर्ष 2015 से दिल्ली में आंदोलन किया. 
उनकी प्रमुख मांग थी कि समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले सेवानिवृत्त सैनिकों को पेंशन में समानता मिले. 
जंतर-मंतर पर पूर्व सैनिकों के धरने ने लंबे समय तक ध्यान खींचा. इस आंदोलन में पेंशन व्यवस्था, सैनिकों के कल्याण और सरकार की जिम्मेदारी से जुड़े सवाल उठे. यह प्रदर्शन इस बात का उदाहरण बना कि जंतर-मंतर पर आंदोलन केवल कुछ दिनों के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक भी चल सकते हैं. 

तमिलनाडु के किसानों का अनोखा प्रदर्शन

मार्च और अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली में लगभग 40 दिनों तक प्रदर्शन किया. किसानों ने कर्ज राहत, सूखे से प्रभावित किसानों के लिए सहाता और कावेरी प्रबंधन बोर्ड जैसे मुद्दे उठाए. 

उनके प्रदर्शन का तरीका भी चर्चा में रहा. किसानों ने अपनी आर्थिक कठिनाइयों को दिखाने के लिए अलग-अलग प्रतीकात्मक तरीके अपनाए, जिनमें खोपड़ियां और चूहे दिखाना भी शामिल था. इस आंदोलन ने कृषि संकट, किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय सुर्खियों में जगह दिलाई. 

CAA विरोध से महिला पहलवानों के आंदोलन तक

दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शन हुए. कानून को लेकर समर्थकों और आलोचकों के बीच बहस के दौरान नागरिकता, संविधान और समानता के सवाल प्रमुखता से उठे. 

इसके बाद साल 2023 में महिला पहलवानों का आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बनना. विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया समेत शीर्ष पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों पर कार्रवाई की मांग की.

बृजभूषण सिंह ने आरोपों से इनकार किया था. पहलवानों ने जांच और जवाबदेही की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर धरना दिया. इस आंदोलन ने खेल संस्थाओं में शिकायत निवारण, महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा और जवाबदेही पर बहस को प्रमुखता दी. 

अब जंतर-मंतर की जगह कहां होंगे प्रदर्शन?

12 अक्टूबर 2026 को सामने आए आदेश के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया है. गृह मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर अब रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को प्रदर्शन के लिए निर्धारित किया गया है. इन स्थानों पर धरना-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP अलग से जारी की जाएगी.

यह फैसला ऐसे समय आया है जब कॉकरोच जनता पार्टी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर पर रोक की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी.

पुलिस ने अनुमति देने से इनकार कर दिया. इससे पहले CJP ने 20 जून से 25 जुलाई तक NEET पेपर लीक के मुद्दे पर प्रदर्शन किया था. संगठन के दावे के मुताबिक, यह धरना 36 दिन चला और इसमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई थी.

क्या प्रदर्शन स्थल बदलने से विरोध का अधिकार खत्म हो जाएगा?

अब सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या प्रदर्शन स्थल बदलने से विरोध का अधिकार खत्म हो जाएगा या इससे प्रदर्शनकारियों पर कोई असर पड़ेगा. जंतर-मंतर को निर्धारित स्थल की सूची से हटाने का अर्थ यही नहीं कि संविधान के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार खत्म हो गया है. 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियार इकट्ठा होने का अधिकार देता है. हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए इन अधिकारों पर कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.

ऐसे में आगे स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि नए निर्धारित स्थलों पर अनुमति की प्रक्रिया, समय, भीड़ की सीमा और अन्य नियम कैसे तय किए जाते हैं. प्रदर्शनकारियों के लिए स्थान बदलना एक व्यवहारिक चुनौती हो सकती है, जबकि प्रशासन के सामने सुरक्षा, यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रकने की जिम्मेदारी रहेगी. 

इतिहास बदलेगा, लेकिन सवाल बने रहेंगे

जंतर-मंतर ने करीब तीन सदियों में खगोलीय अध्ययन केंद्र से लेकर लोकतांत्रिक विरोध के प्रमुख मंच तक का सफर तय किया है. अन्ना आंदोलन, OROP, किसानों के प्रदर्शन और महिला पहलवानों की लड़ाई ने इसे राष्ट्रीय पहचान दी.

अब निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से इसका नाम हटने के बाद रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड की भूमिका बढ़ सकती है. लेकिन असली सवाल यही रहेगा कि नागरिकों को अपनी मांगें शांतिपूर्ण तरीके से उठाने के लिए कितनी सुलभ जगह और पारदर्शी अनुमति व्यवस्था मिलती है.

जंतर-मंतर का इतिहास बताता है कि लोकतंत्र में विरोध का मंच केवल एक स्थान नहीं, बल्कि जनता की आवाज और सत्ता से जवाब मांगने की परंपरा भी है.

यह भी पढ़ें - CJP Protest: जंतर मंतर पर प्रदर्शन की इजाजत नहीं, दिल्ली पुलिस ने तय की 3 नई जगह

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