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सिंगापुर एफवन क्षेत्र में वैध टिकट के बिना प्रवेश करने पर भारतीय नागरिक पर मामला दर्ज

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उच्च शिक्षा का दशक और गुणवत्ता की परीक्षा

समावेशी विकास के हिमायती अर्थशास्त्री मानव पूंजी सिद्धांत के तहत शिक्षा को महज सामाजिक कल्याण या व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि उत्पादकता, नवाचार और दीर्घकालिक आर्थिक विकास की बुनियादी पूंजी के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से कह सकते हैं कि किसी देश की युवा आबादी अपने आप में विकास की गारंटी नहीं होती। उसकी वास्तविक आर्थिक और सामाजिक क्षमता इस बात से निर्धारित होती है कि उसे उपलब्ध शिक्षा ज्ञान, कौशल और निर्णय क्षमता में कितना रूपांतरित कर पाती है। भारत आज इसी द्वंद्व के बीच खड़ा है। एक ओर विशाल युवा आबादी जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावना प्रस्तुत करती है, दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक श्रम बाजार में आते बदलाव मानव पूंजी निर्माण की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दे रहे हैं।

ह्यूमनिटीज एंड सोशल साइंसेज कम्युनिकेशंस में 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी रेखांकित किया कि भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव का आर्थिक लाभ अनुकूल नीतिगत वातावरण, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और लैंगिक सशक्तीकरण पर निर्भर करता है। इसलिए पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा के विस्तार और सुधारों का मूल्यांकन केवल संस्थानों तथा नामांकन की बढ़ती संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर किया जाना चाहिए कि भारत अपनी युवा आबादी को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की सक्षम मानवीय शक्ति में कितना बदल पाया है।

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इस दशक में भारतीय उच्च शिक्षा का सामाजिक आधार उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुआ है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, कुल नामांकन 2014 से 15 के लगभग 3.42 करोड़ से बढ़कर 2023 से 24 में करीब 4.50 करोड़ हो गया। महिलाओं के साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ी है, जो उच्च शिक्षा के व्यापक सामाजिक विस्तार का संकेत है। हालांकि, नामांकन वृद्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लोकतंत्रीकरण के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पर्याप्त संसाधन और रोजगारपरक अवसरों तक समान पहुंच जरूरी है। महानगरों और छोटे शहरों के संस्थानों के बीच गुणवत्ता का अंतर अब प्रमुख चुनौती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने उच्च शिक्षा सुधार के लिए व्यापक वैचारिक ढांचा प्रस्तुत किया। बहुविषयक अध्ययन, लचीली पाठ्यचर्या, शोध उन्मुख शिक्षा, कौशल विकास और अकादमिक क्रेडिट की हस्तांतरणीयता इसके प्रमुख प्रावधान हैं। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट विद्यार्थियों को शैक्षणिक यात्रा में अधिक लचीलापन देता है, जबकि समर्थ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रवेश, परीक्षा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने की क्षमता रखते हैं। इन पहलों का महत्व संस्थागत विस्तार से आगे बढ़कर सीखने की गुणवत्ता, शैक्षणिक गतिशीलता और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में है।

फिर भी नीतिगत महत्वाकांक्षा और संस्थागत वास्तविकता के बीच की दूरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बहुविषयक शिक्षा के लिए विभिन्न विषयों के सक्षम विभाग, प्रशिक्षित शिक्षक और पर्याप्त अकादमिक संसाधन चाहिए। शोध आधारित शिक्षा के लिए प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, शोध अनुदान और मार्गदर्शन की व्यवस्था आवश्यक है। डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बना सकते हैं, लेकिन वे कमजोर शिक्षण व्यवस्था की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके प्रावधानों ने कक्षाओं में शिक्षण, विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और विश्वविद्यालयों की अकादमिक संस्कृति में कितना बदलाव पैदा किया है।

उच्च शिक्षा सुधार की केंद्रीय कसौटी शिक्षक व्यवस्था और शोध क्षमता है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि ज्ञान सृजन, आलोचनात्मक विवेक और बौद्धिक स्वतंत्रता के वाहक हैं। अनेक संस्थानों में रिक्त पदों, संविदा नियुक्तियों और गैर शैक्षणिक दायित्वों का दबाव शिक्षण, शोध निर्देशन और विद्यार्थियों से संवाद को प्रभावित करता है। इसलिए पारदर्शी नियुक्ति, अकादमिक स्वतंत्रता और निरंतर प्रशिक्षण को दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखना आवश्यक है।

गौरतलब है कि विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता शोध और नवाचार में उनके योगदान से भी निर्धारित होती है। भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन व्यापक विश्वविद्यालय व्यवस्था में शोध संस्कृति को और मजबूत करने की आवश्यकता है। कृषि, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्र भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण शोध अवसर प्रस्तुत करते हैं। इसके लिए शोध वित्तपोषण बढ़ाने, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के सहयोग तथा युवा शोधकर्ताओं को स्वतंत्र अवसर देने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके उत्पादक केंद्र बनाना होगा।

इसी तरह रोजगार और उच्च शिक्षा के संबंध को भी अधिक सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है। डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता, व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्योग की बदलती मांगों पर प्रश्न उठाती है। तकनीकी दक्षता, डिजिटल साक्षरता, संचार क्षमता और समस्या समाधान जैसे कौशल अब अनेक क्षेत्रों में आवश्यक हो गए हैं। फिर भी, रोजगारोन्मुखी शिक्षा का अर्थ विश्वविद्यालयों को उद्योग की तात्कालिक जरूरतों के अधीन कर देना नहीं है। मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषय विद्यार्थियों में ऐतिहासिक चेतना, नैतिक विवेक, लोकतांत्रिक समझ और समाज के जटिल प्रश्नों का विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करते हैं। एक सक्षम उच्च शिक्षा व्यवस्था को आर्थिक उपयोगिता और बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम करना होगा। उसका उद्देश्य केवल रोजगार पाने योग्य व्यक्ति तैयार करना नहीं, बल्कि ज्ञानवान, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है।

हाल में बिहार में 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों की शुरुआत, 2,451 संविदा सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति तथा विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक और डिजिटल सुधारों की पहल इसी राष्ट्रीय चुनौती का एक प्रासंगिक उदाहरण है। इन प्रयासों से उच्च शिक्षा की भौगोलिक पहुंच और संस्थागत क्षमता बढ़ाने की संभावना बनती है। लेकिन इनकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉलेजों में नियमित शिक्षण, पर्याप्त संसाधन, अकादमिक नेतृत्व और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन का वातावरण कितना विकसित होता है। बिहार का अनुभव इस व्यापक तथ्य को रेखांकित करता है कि संस्थानों की संख्या बढ़ाना सुधार का प्रारंभिक चरण है, उसकी परिणति गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में ही हो सकती है।

ये पूरा दशक भारतीय उच्च शिक्षा में विस्तार और संस्थागत परिवर्तन का दौर रहा है, लेकिन अगली चुनौती कहीं अधिक जटिल है। बढ़ता नामांकन, महिलाओं और वंचित समूहों की भागीदारी तथा डिजिटल प्रशासन सकारात्मक आधार तैयार करते हैं, पर गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, शोध क्षमता और रोजगारपरकता की चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। इसलिए उच्च शिक्षा नीति का केंद्र अब मात्र विस्तार नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और समान अवसरों का निर्माण होना चाहिए। भारत की युवा आबादी तभी वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश में बदल सकती है, जब शिक्षा उसे ज्ञान, कौशल और नवाचार की क्षमता प्रदान करे। आने वाले दशक की अग्निपरीक्षा इसी रूपांतरण में निहित है।

- संजीव कुमार मिश्र

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  Sports

Rishabh Pant चोट के कारण India A के शुरुआती दो Test मैचों से बाहर

भारतीय विकेटकीपर बल्लेबाज ऋषभ पंत न्यूजीलैंड दौरे पर भारत ए टीम के शुरुआती 2 मुकाबलों में नहीं खेल पाएंगे। चोट से समय पर पूरी तरह उबर नहीं पाने के कारण उन्हें टीम से बाहर रखा गया है। बीसीसीआई ने उनकी जगह युवा विकेटकीपर बल्लेबाज कुमार कुशाग्र को टीम में शामिल किया है। कुशाग्र ने हाल के मुकाबलों में शानदार प्रदर्शन किया है, जिसमें दलीप ट्रॉफी के फाइनल और ऑस्ट्रेलिया ए के खिलाफ भारत ए के मैच में लगाए गए शतक शामिल हैं।

बता दें कि पंत को न्यूजीलैंड दौरे के लिए भारत ए टीम में उनकी फिटनेस के आधार पर चुना गया था। ईरानी कप में रेस्ट ऑफ इंडिया टीम की कप्तानी करते समय उनके बाईं तरफ खिंचाव आ गया था। इसके बाद से वह चोट से उबरने में जुटे हैं। हालांकि, उनकी हालत में सुधार हो रहा है, लेकिन शुरुआती 2 मुकाबलों तक पूरी तरह फिट होने की संभावना नहीं बन सकी है।

बीसीसीआई ने अपने बयान में कहा है कि पंत अभी भी बोर्ड की चिकित्सा टीम की निगरानी में हैं और अच्छी तरह से ठीक हो रहे हैं। तीसरे मुकाबले में उनकी उपलब्धता पर फैसला बाद में लिया जाएगा। ऐसे में फिलहाल यह साफ नहीं है कि वह न्यूजीलैंड दौरे पर आखिरी मैच में खेल पाएंगे या नहीं।

पंत को इस दौरे पर भारत ए टीम की कप्तानी भी करनी थी, लेकिन अब ध्रुव जुरेल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। जुरेल टीम के कप्तान होने के साथ विकेटकीपर की भूमिका भी निभाएंगे। कुमार कुशाग्र को शुरुआती 2 मुकाबलों के लिए टीम में जगह मिली है। वह इस टीम के उन 4 खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने अभी तक भारतीय सीनियर टीम के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेला है। उनके अलावा स्मरण रविचंद्रन, विदर्भ के बल्लेबाज यश राठौड़ और बाएं हाथ के तेज गेंदबाज मुकेश चौधरी भी इस सूची में शामिल हैं।

गौरतलब है कि भारत ए की टीम में कई अनुभवी और प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं। यशस्वी जायसवाल, केएल राहुल, देवदत्त पडिक्कल, साई सुदर्शन और वॉशिंगटन सुंदर जैसे खिलाड़ियों को भी टीम में शामिल किया गया है। हालांकि, राहुल, जायसवाल और सुंदर के दूसरे तथा तीसरे मुकाबले में खेलने की संभावना कम है। इसकी वजह न्यूजीलैंड के खिलाफ होने वाली एकदिवसीय श्रृंखला का कार्यक्रम है। भारत और न्यूजीलैंड के बीच एकदिवसीय मुकाबले 4, 7 और 10 नवंबर को खेले जाने हैं। ऐसे में इन खिलाड़ियों के लिए भारत ए के सभी मैचों में हिस्सा लेना मुश्किल होगा।

भारत ए और न्यूजीलैंड ए के बीच पहला मुकाबला 24 से 28 अक्टूबर तक लिंकन में खेला जाएगा। दूसरा मैच 31 अक्टूबर से 3 नवंबर तक क्राइस्टचर्च में होगा। वहीं, तीसरा और आखिरी मुकाबला 7 से 10 नवंबर तक लिंकन में आयोजित किया जाएगा। इन तीनों मुकाबलों का प्रारूप टेस्ट क्रिकेट होगा।

मौजूद जानकारी के अनुसार, भारत ए की संशोधित टीम में यशस्वी जायसवाल, केएल राहुल, देवदत्त पडिक्कल, स्मरण रविचंद्रन, ध्रुव जुरेल, वॉशिंगटन सुंदर, औकिब नबी, आकाश दीप, अंशुल कंबोज, मानव सुथार, मुकेश चौधरी, साई सुदर्शन, यश राठौड़, मुकेश कुमार और कुमार कुशाग्र शामिल हैं। कुशाग्र को केवल पहले 2 मुकाबलों के लिए चुना गया है।

कुमार कुशाग्र के लिए यह दौरा अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा मौका होगा। लगातार शतक लगाने के बाद उन्हें टीम में जगह मिली है। वहीं, पंत की फिटनेस पर सभी की नजरें रहेंगी, क्योंकि भारतीय टीम के लिए उनका विकेटकीपिंग और बल्लेबाजी में योगदान काफी अहम रहा है। आने वाले दिनों में चिकित्सा टीम की रिपोर्ट के आधार पर उनके तीसरे मुकाबले में खेलने को लेकर फैसला लिया जाएगा।

Tue, 13 Oct 2026 20:47:00 +0530

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