सीसीआई ने 2025 में प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथाओं के 54 मामले दर्ज किए : हर्ष मल्होत्रा
नई दिल्ली, 9 फरवरी (आईएएनएस)। वर्ष 2025 के दौरान, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथाओं से संबंधित 54 मामले दर्ज किए और विलय (एमएंडए) के 149 आवेदन प्राप्त किए। यह जानकारी कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा की ओर से सोमवार को दी गई।
मल्होत्रा ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में बताया कि कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने देश में प्रतिस्पर्धा कानून सुधारों और संशोधनों के संबंध में कई कदम उठाए हैं।
पिछले वर्ष सीसीआई ने 38 प्रतिरक्षा विरोधी मामलों में अंतिम आदेश पारित किए और 146 विलय नोटिसों का निपटारा भी किया है।
केंद्रीय मंत्री ने आगे बताया कि हाल ही में हुए प्रतिस्पर्धा कानून सुधारों को लागू करने के लिए, भारत सरकार ने प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अधिनियम, 2023 के तहत विभिन्न नियमों और विनियमों को अधिसूचित किया, जिसे 11 अप्रैल, 2023 को पारित किया गया था। जुर्माने के निर्धारण के लिए, प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अधिनियम, 2023 में व्यक्ति या उद्यम के वैश्विक कारोबार के आधार पर जुर्माने की गणना का प्रावधान किया गया है।
केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने सीसीआई (मौद्रिक दंड निर्धारण) दिशानिर्देश, 2024 को अधिसूचित किया है, जिसमें दंड निर्धारण के लिए एक विस्तृत कार्यप्रणाली निर्धारित की गई है।
आयोग के समक्ष कार्यवाही की दक्षता, पारदर्शिता और समयबद्धता में सुधार करने के लिए, प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अधिनियम, 2023 ने विलय और अधिग्रहण (कॉम्बिनेशन) की मंजूरी के लिए समय सीमा को 210 दिनों से घटाकर 150 दिन करने के लिए दूरदर्शी सुधार पेश किए और प्रतिस्पर्धा मामलों के तेजी से समाधान के हित में निपटान और प्रतिबद्धता ढांचा भी पेश किया।
केंद्रीय मंत्री के मुताबिक, इसके अलावा, अधिनियम के अंतर्गत शामिल ग्रीन चैनल मार्ग के माध्यम से नोटिस दाखिल करने पर स्वीकृति मानी जाने के जरिए संयोजनों की त्वरित मंजूरी की सुविधा मिलती है, जिससे प्रतिस्पर्धा मामलों का तेजी से निपटान संभव होता है।
--आईएएनएस
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Naseeruddin Shah Disinvite Row: University कार्यक्रम में नहीं बुलाने पर नसीरुद्दीन शाह को नफरत दिखी?
Naseeruddin Shah Disinvite Row: लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सबको है, लेकिन जब यह असहमति डर का चोला ओढ़ ले और निशाना देश बनने लग जाए तो सवाल उठाना लाजमी है. नसीरुद्दीन शाह एक ऐसा नाम जिसे इस देश ने सिर आंखों पर बैठाया जिसकी अदाकारी का लोहा पूरी दुनिया मानती है. लेकिन आज वही नसीरुद्दीन शाह कह रहे हैं कि यह वो देश नहीं रहा जहां वो बड़े हुए हैं. नसीरुद्दीन शाह जिनकी पहचान एक संजीदा अभिनेता के तौर पर होती थी. लेकिन आज उनकी पहचान फिल्मों से ज्यादा उनके बयानों को लेकर होने लगी है. कभी कहते हैं देश में डर का माहौल है. कभी केरल स्टोरी और कभी कश्मीर फाइल जैसी सच्ची घटनाओं पर बनी फिल्मों से डर जाते हैं तो कभी यह तक कह देते हैं कि यह वो देश नहीं जहां वो पले बढ़े थे.
वाक्या कुछ दिन पहले का ही है जब नसीरुद्दीन शाह ने एक न्यूज़पेपर के ओपिनियन पीस में लिखा मुंबई यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग ने 1 फरवरी को जश्न उर्दू का आयोजन किया जिसमें उन्हें भी न्योता दिया गया था लेकिन ऐन मौके पर उसे वापस ले लिया गया उस इवेंट में उन्हें स्टूडेंट के साथ बातचीत करनी थी उस इवेंट में वह जाना चाहते थे लेकिन ऐसा हो ना सका उनसे कोई कारण या माफी मांगे बिना न्योता वापस ले लिया गया जिसमें उन्हें बेइज्जती महसूस हुई नसरुद्दीन शाह आगे लिखते हैं कि इस अनुभव ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि यह वो देश नहीं जहां मैं पला बढ़ा जहां मुझे प्यार करना सिखाया गया था. अब 2 मिनट की नफरत 24 घंटे की नफरत में बदल चुकी है.
नसीरुद्दीन शाह की इस टिप्पणी पर सबसे तीखा प्रहार किया गीतकार मनोज मुंतशिर ने. मनोज मुंतशिर ने उल्टे नसीरुद्दीन शाह से सवाल पूछ लिया। जिस यूनिवर्सिटी की आड़ में वह सरकार पर निशाना साध रहे हैं, क्या उसे सरकार चलाती है? मुझे लगता है यूनिवर्सिटीज तो एक इंडिपेंडेंट तौर पे इस देश में संचालित होती हैं. यूनिवर्सिटीज सरकार गवर्न करती है। ये मेरे लिए नई जानकारी है. मुझे ऐसा नहीं पता था. उनका एक ऑटोनॉमस मैनेजमेंट होता है. जो कुछ भी हुआ मुझे यह घटना पता नहीं है. लेकिन नसीरुद्दीन शाह शाह साहब बहुत ज्यादा बड़े कलाकार हैं. बहुत बड़े एक्टर हैं। हम सब उनकी बड़ी इज्जत करते हैं.
मनोज मुंतशिर ने ना केवल नसीरुद्दीन शाह के दावों को खारिज किया बल्कि उन्हें आईना दिखाते हुए पूछा कि पुराना भारत आखिर कैसा था? मैंने एक स्टेटमेंट जरूर पढ़ा था. शायद आज ही अखबारों में पढ़ रहा था कि उन्होंने कहा कि मैं जिस भारत में बड़ा हुआ था यह वो भारत नहीं है. शायद सही कह रहे हैं वो यह वो भारत नहीं है. जिस भारत में वो बड़े हो रहे थे और मैं भी बड़ा हो रहा था वो अपीजमेंट का तुष्टीरण का भारत था. यह नया भारत है, यह बेहतर भारत है। यह अच्छा भारत है. मुझे यह भारत ज्यादा पसंद है. जो नैरेटिव दशकों तक लूटियंस दिल्ली और बॉलीवुड के गलियारों से तय होता था.
2014 के बाद जब यह नैरेटिव धराशाई होने लगा तो इस तरह के बयानों की झड़ी भी लग गई. बॉलीवुड के जो सितारे एक खास इकोसिस्टम का हिस्सा रहे. सत्ता बदलते ही उन्हें डर लगने लगा. उनमें से सबसे मुखर आवाज नसीरुद्दीन शाह की रही. नसीरुद्दीन शाह ने कभी कहा कि कहीं उनके बच्चे भीड़ का शिकार ना हो जाए। केरल स्टोरी की कामयाबी से उन्हें चिढ़ हो जाती है और वह उन्हें खतरनाक ट्रेंड लगती है. अचानक ही वह मुगलों की तारीफ करने लगते हैं। कहते हैं मुगलों ने देश को लूटा नहीं बल्कि बहुत कुछ दिया. नसरुद्दीन शाह अकेले ऐसे अभिनेता नहीं जिन्होंने अपने बयानों के जरिए गंगा जमुनी तहजीब को कटघरे में खड़ा किया है.
याद कीजिए आमिर खान का वह बयान जब उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी को देश में डर लगता है और वह देश छोड़ने की बात करती हैं। कुछ दिन पहले संगीतकार एआर रहमान ने भी कहा था पिछले 8 सालों में पावर शिफ्ट होने की वजह से कुछ बदलाव आए हैं. अब पावर उन लोगों के हाथ में है जो क्रिएटिव नहीं है और इसमें सांप्रदायिकता का एंगल भी हो सकता है. नसीरुद्दीन शाह जी देश वही है, वही गलियां हैं, वही लोग हैं और वही लोकतंत्र है. बदला है तो सिर्फ देखने का नजरिया। जिस देश ने आपको नसीरुद्दीन शाह बनाया, वह देश कभी नफरत का पर्याय नहीं हो सकता। नफरत तब होती है जब हम अपनी पहचान को देश की पहचान से ऊपर रखने लगते हैं। और आपके बयानों से, आपकी बातों से और आपके विचारों से तो ऐसा ही लगता है.
टीम न्यूज़ नेशन सवाल उठते हैं नसीरुद्दीन शाह ने नफरत की बात कहकर देश की छवि पर उंगली नहीं उठा रहे क्या? यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में नहीं बुलाने पर नसीरुद्दीन शाह को नफरत कैसे दिख गई? पहले रहमान और अब नसीरुद्दीन शाह उन्हें क्यों लगता है कि यह पहले वाला देश नहीं है? क्या नसीरुद्दीन शाह को
विवादों में रहना अच्छा लगता है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिस पर हम चर्चा करेंगे और इस चर्चा में शामिल हो रहे हैं बहुत ही खास मेहमान अरुण बखशी साहब फिल्म एक्टर मानवी तनेजा, प्रोफेसर कपिल कुमार विवेक श्रीवास्तव मुफ्ती समुन कासपी साहब.
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