सऊदी एयरपोर्ट पर हूतियों का हमला, 3 की मौत:ड्रोन-मिसाइल हमले में 36 घायल; जवाब में यमन के 80 ठिकानों पर सऊदी की एयरस्ट्राइक
सऊदी अरब के दो एयरपोर्ट्स पर हूती विद्रोहियों ने ड्रोन और मिसाइल से हमले किए। इसमें 3 लोगों की मौत हो गई है। साथ ही 36 लोग घायल हुए हैं। सऊदी अरब की जनरल अथॉरिटी ऑफ सिविल एविएशन (GACA) ने बुधवार को यह जानकारी दी। आभा इंटरनेशनल एयरपोर्ट और रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट को 6 और 7 अक्टूबर को निशाना बनाया गया। हूती विद्रोहियों ने दोनों हमलों की जिम्मेदारी ली है। वहीं, यमन में सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने कहा कि उसने हूतियों के 80 से ज्यादा सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की है। इंडिगो और एयर इंडिया ने रियाद की फ्लाइट्स रद्द कीं हूती हमलों के बाद इंडिगो और एयर इंडिया ने रियाद आने-जाने वाली उड़ानें 10 अक्टूबर तक रद्द कर दी हैं। एयर इंडिया एक्सप्रेस ने भी सुरक्षा स्थिति को देखते हुए अपनी रियाद की उड़ानें रद्द की हैं। प्रभावित यात्रियों को पूरा रिफंड या बिना अतिरिक्त शुल्क के टिकट रीशेड्यूल करने का विकल्प दिया जाएगा। रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने यात्रियों से एयरपोर्ट पहुंचने से पहले अपनी एयरलाइन से फ्लाइट का स्टेटस जांचने को कहा है। एयरपोर्ट ने सोशल मीडिया पर कहा कि यात्रियों को एयरपोर्ट जाने से पहले संबंधित एयरलाइन से सीधे संपर्क करना चाहिए और अपनी उड़ान की स्थिति की जानकारी लेनी चाहिए। विदेशी नागरिकों ने हमले में जान गंवाई आभा एयरपोर्ट पर हमले में मोरक्को और अल्जीरिया की दो महिला नागरिकों की मौत हुई। साथ ही यहां 28 लोग घायल हुए। इनमें सऊदी, बांग्लादेशी और फिलीपींस के नागरिक शामिल हैं। वहीं, किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एक सूडानी नागरिक की मौत हुई। यहां 8 लोग घायल हुए, जिनमें 5 सऊदी नागरिक, 2 मिस्र के निवासी और एक पाकिस्तानी निवासी शामिल हैं। GACA ने बताया कि सभी घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया है। साथ ही अधिकारी सुविधाओं की सुरक्षा की जांच कर रहे हैं और यात्रियों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं। अरामको रिफाइनरी पर हमले का दावा इससे पहले हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने सऊदी अरब में कई जगहों पर मिसाइल और ड्रोन हमले करने की जिम्मेदारी ली थी। इसमें रबीघ में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी अरामको पर हमला भी शामिल है। याह्या सरी ने टेलीग्राम पर जारी बयान में कहा कि संगठन ने बड़ी संख्या में बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ ड्रोन का इस्तेमाल करते हुए तीन बड़े सैन्य अभियान चलाए। याह्या ने दावा किया कि ये हमले यमन पर सऊदी अरब के हमलों के जवाब में किए गए। उनके मुताबिक, इससे पहले के 24 घंटों में सऊदी अरब ने यमन पर 60 हवाई और मिसाइल हमले किए थे। सऊदी ने यमन में मिसाइल लॉन्च करने वाला ठिकाना नष्ट किया इस बीच, यमन में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने दावा किया कि उसने रियाद पर हमले के लिए इस्तेमाल किए गए एक बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म को नष्ट कर दिया है। गठबंधन के प्रवक्ता कर्नल तुर्की अल-मालिकी ने कहा कि यह कार्रवाई यमन की राजधानी सना में की गई। उनके मुताबिक, वहां सऊदी अरब पर एक और हमले की तैयारी चल रही थी और हमला जल्द किया जा सकता था। यमन में हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान जारी यमन सरकार हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान चला रही है। इसका मकसद यमन और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास कब्जाए इलाकों को वापस पाना है। इस सैन्य अभियान में यमन सरकार को सऊदी अरब से समर्थन मिल रहा है। सितंबर में हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर तेजी से बढ़ते हुए मोचा शहर और बाब अल-मंदेब के आसपास के कई अहम इलाकों पर कब्जा कर लिया था। इससे इस रणनीतिक समुद्री रास्ते पर हूतियों की पकड़ मजबूत हो गई थी। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। 5 अक्टूबर को सऊदी समर्थित यमनी सेना ने हूतियों के खिलाफ बड़ा जवाबी अभियान शुरू किया। यमनी सेना ने बाब अल-मंदेब के पास धुबाब इलाके और कई अहम ठिकानों पर दोबारा कब्जे का दावा किया। इसके बाद सेना मोचा की तरफ बढ़ी और यमनी सरकार ने शहर को भी हूतियों से वापस लेने का दावा किया। रॉयटर्स के मुताबिक, सरकारी बलों ने हूतियों को पिछले महीने कब्जे में लिए गए ज्यादातर इलाकों से पीछे धकेल दिया है। हूतियों का दावा- यमन में सरकारी बलों पर 11 मिसाइलें दागीं अल जजीरा के मुताबिक, हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि पिछले 24 घंटे में संगठन ने यमन में सरकारी बलों के 11 ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमले किए। सरी के मुताबिक, यमनी सरकार के बलों को बाब अल-मंदेब के पास प्रमुख रास्तों पर निशाना बनाया गया। उन्होंने दावा किया कि इन हमलों में दर्जनों लोग हताहत हुए, जिनमें सैन्य कमांडर भी शामिल थे। कई गाड़ियां भी नष्ट हो गईं। हूती प्रवक्ता ने अलग से दावा किया कि संगठन ने सऊदी अरब के समर्थन वाले जायंट्स ब्रिगेड पर भी बैलिस्टिक मिसाइल से हमला किया। उसके मुताबिक, इस हमले में 30 से ज्यादा लोग मारे गए या घायल हुए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस संघर्ष में अब तक 270 से ज्यादा सरकारी सैनिकों और हूती लड़ाकों की मौत हो चुकी है। ----------------------- यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान में आटे के संकट से जूझ रहे लोग:20 किलो आटे का बैग 3300 रुपए पहुंचा, रोटी 20 से बढ़कर 30 रुपए हुई पाकिस्तान के पेशावर में आटे की कीमत तेजी से बढ़ने से लोग परेशान हैं। 20 किलो मोटे आटे का बैग 3,300 पाकिस्तानी रुपए तक पहुंच गया है। आटे की कीमत बढ़ने का असर तंदूरों पर भी पड़ा है। पूरी खबर पढ़ें…
ईरान ने अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर किया:हमलों के डर से ब्रिटेन से 12 बमवर्षक हटे; अमेरिकी सैनिक होटलों में रहने को मजबूर
ईरान पर हमला करके अमेरिका अपनी सैन्य ताकत दिखाना चाहता था, लेकिन अब यही युद्ध उसके लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है। ईरानी हमलों के बाद अमेरिका को मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य तैनाती बदलनी पड़ी है। अब ब्रिटेन के एक एयरबेस से B-1 बमवर्षक विमान भी अचानक अमेरिका वापस बुला लिए गए। अमेरिका ने इसे सुरक्षा के लिहाज से उठाया गया सामान्य कदम बताया है। राष्ट्रपति ट्रम्प और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी। लेकिन पिछले कुछ महीनों की घटनाएं बताती हैं कि ईरानी हमलों ने अमेरिकी सैन्य रणनीति को बदलने पर मजबूर किया है। बहरीन, कुवैत, कतर और यूएई में तैनात अमेरिकी सैनिकों को हटाना पड़ा है। कुछ ठिकानों को हुए नुकसान के बाद अमेरिका उन्हें दोबारा बनाने के बजाय ईरान से और दूर ले जाने पर विचार कर रहा है। ब्रिटेन से 12 बमवर्षक अचानक क्यों हटाए गए? ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस पर अमेरिका के 12 B-1 बमवर्षक विमान तैनात थे। ये विमान लंबी दूरी तक उड़कर हमला करने में सक्षम हैं। लेकिन अमेरिकी कमांडरों को ऐसी जानकारी मिली कि ईरान समर्थित लोग एयरबेस की बाड़ के ठीक बाहर से ड्रोन हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि फेयरफोर्ड एयरबेस अमेरिका और ब्रिटेन के सैन्य सहयोग का पुराना केंद्र है। इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1944 में बनाया गया था। ब्रिटेन का एयरबेस अकेला मामला नहीं है। ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर लगातार ड्रोन और मिसाइल हमले किए। इन हमलों के बाद अमेरिका ने बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देशों से अपने कई सैनिकों को हटाया। ये सभी ठिकाने ईरान की मिसाइल और ड्रोन की पहुंच में थे। कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को काफी नुकसान हुआ। पोर्ट शुएबा पर हुए हमले में छह अमेरिकी सैनिक मारे गए। ईरानी हमले में अमेरिकी सेना का एक ऑपरेशन सेंटर भी नष्ट हो गया। अमेरिकी सैनिकों को होटल-दफ्तरों में रहना पड़ा ईरानी हमलों का असर इतना ज्यादा हुआ कि कई अमेरिकी सैनिकों को अपने सैन्य ठिकाने छोड़कर होटल और दफ्तरों में जाना पड़ा। यहीं से अमेरिका के सामने नई समस्या खड़ी हुई। ईरान ने यह पता लगाना शुरू कर दिया कि अमेरिकी सैनिक कहां रह रहे हैं। कुछ सैनिक ऐसे होटलों में भी रह रहे थे, जहां सुरक्षा बहुत कम थी। इसके बाद ईरान ने इन जगहों को भी निशाना बनाना शुरू किया। सऊदी अरब में CIA के एक ठिकाने को भी नुकसान पहुंचा। मिडिल ईस्ट में अमेरिका जिन 13 बड़े सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करता था, उनमें से कई हमलों के बाद रहने और काम करने लायक नहीं रहे। पेंटागन के अंदर अब कुछ ठिकानों को फिर से बनाने की बजाय उन्हें और दूर ले जाने पर विचार हो रहा है। ड्रोन हमले ने अमेरिका की सोच बदल दी इस युद्ध से अमेरिका को एक नई बात समझ आई है। पहले माना जाता था कि अगर अमेरिकी सैनिकों और विमानों को दुश्मन की मिसाइलों की पहुंच से दूर रखा जाए तो वे सुरक्षित रहेंगे। लेकिन ड्रोन ने यह सोच बदल दी है। ड्रोन छोटे होते हैं, उन्हें छिपाना आसान है और उन्हें बहुत दूर से भी हमला करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यूक्रेन ने पिछले साल रूस के खिलाफ इसी तरह की रणनीति अपनाई थी। उसने ड्रोन को ट्रकों में छिपाकर रूस के अंदर तक पहुंचाया और वहीं से उन्हें उड़ाकर सैन्य विमानों पर हमला किया। अब अमेरिका को डर है कि इसी तरह की रणनीति उसके सैन्य ठिकानों के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है। ईरानी सेना कमजोर हुई, लेकिन उसने अमेरिका को रोक दिया ट्रम्प का कहना है कि शुरुआती हमलों में ईरान की पूरी नौसेना खत्म हो गई और उसकी वायुसेना भी काम करने की स्थिति में नहीं है। फिर भी ईरान ने अमेरिकी सेना को कई जगह पीछे हटने पर मजबूर किया है। यही इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना है। ईरान की सेना को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन वह अमेरिकी सैनिकों को ईरान के करीब मौजूद ठिकानों पर टिकने नहीं दे रहा। अमेरिकी सैनिकों को अब पहले से ज्यादा दूर रहना पड़ रहा है। अमेरिका लंबे समय से मिडिल ईस्ट में अपनी सेना की मौजूदगी को इस दलील से सही ठहराता रहा है कि इससे दुनिया के अहम समुद्री रास्ते सुरक्षित रहते हैं। लेकिन अब अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर के कुछ हिस्सों में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही की पूरी गारंटी नहीं दे पा रहा है। अमेरिका को अपने सैनिक और भी दूर ले जाने पड़ सकते हैं पेंटागन अब इजराइल और जॉर्डन में नए सैन्य ठिकाने बनाने पर विचार कर रहा है। लेकिन यह आसान काम नहीं है। नए ठिकानों के लिए अमेरिकी कांग्रेस से पैसा लेना होगा। इसके बाद निर्माण और तैयारी में कई साल लग सकते हैं। इस बीच अमेरिका को अपने मौजूदा सैनिकों और हथियारों को दूसरे सुरक्षित ठिकानों पर रखना होगा। यही वजह है कि अमेरिका अब अपने देश के अंदर भी एक बड़े नए सैन्य ठिकाने की योजना पर सोच रहा है। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने हाल में अमेरिकी सैनिकों से बात करते हुए मिडिल ईस्ट के क्षतिग्रस्त ठिकानों की बजाय अमेरिका के अंदर नया बड़ा बेस बनाने की बात की। सबसे बड़ा सवाल: क्या अमेरिका पहले जैसा दबदबा रखता है? अमेरिका के सामने अब तीन बड़ी समस्याएं हैं। अमेरिका के लिए यह सिर्फ एक सैन्य समस्या नहीं है। इसका राजनीतिक असर भी हो सकता है। ईरान को कमजोर माना जाता है, फिर भी उसके हमलों के कारण अमेरिका को अपने सैनिक और विमान बार-बार पीछे हटाने पड़ रहे हैं। इससे दूसरे देशों को यह संदेश मिल सकता है कि सीधे अमेरिकी सेना से भिड़ने के बजाय उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर भी उसे पीछे हटने पर मजबूर किया जा सकता है। यही इस युद्ध का सबसे बड़ा उलटा असर है। ट्रम्प ईरान को झुकाने के लिए युद्ध में उतरे थे। लेकिन अब अमेरिका को ही यह तय करना पड़ रहा है कि ईरान के करीब अपनी सेना को सुरक्षित कैसे रखा जाए। ---------------------------- यह खबर भी पढ़ें… ममदानी की जीत से बदली यूरोप की राजनीति जोहरान ममदानी ने पिछले साल नवंबर में न्यूयॉर्क मेयर का चुनाव जीता था। उनकी जीत में महंगाई, बढ़ता किराया और रोजमर्रा का खर्च बड़े मुद्दे रहे। पूरी खबर पढ़ें…
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