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फ्रांस से भारत तक Gen Z आंदोलन का ग्लोबल कनेक्शन? 2.2 करोड़ डॉलर की फंडिंग और नेविल रॉय सिंघम पर क्यों उठ रहे सवाल

Explainer: युवाओं के विरोध-प्रदर्शन अब केवल किसी एक देश की सड़कों तक सीमित नहीं रह गए हैं. सोशल मीडिया के दौर में एक देश में उठने वाला मुद्दा कुछ ही घंटों में अंतरराष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन सकता है. फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का आंदोलन हो या भारत में मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर युवाओं की नाराजगी, इन घटनाओं ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि क्या दुनिया भर के युवा आंदोलनों के बीच कोई साझा रणनीति भी काम करती है?

इसी बहस के केंद्र में अमेरिकी मूल के कारोबारी और एक्टिविस्ट नेविल रॉय सिंघम, उनसे जुड़े संगठनों की फंडिंग और वामपंथी विचारधारा वाले मीडिया नेटवर्क आ गए हैं. हालिया मीडिया रिपोर्ट्स में आरोप लगाया गया है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों का एक नेटवर्क फ्रांस के छात्र प्रदर्शनों को व्यापक राजनीतिक विमर्श से जोड़ रहा है.

 इन रिपोर्ट्स में भारत सहित कई देशों के युवाओं के आंदोलनों का भी जिक्र है. हालांकि, इन दावों को समझने के लिए वास्तविक विरोध के कारणों, संगठनों की भूमिका और फंडिंग के सबूतों को अलग-अलग देखना जरूरी है.

फ्रांस में क्यों सड़कों पर उतरे छात्र?

फ्रांस में सितंबर 2026 के अंतिम सप्ताह से छात्र प्रदर्शनों में तेजी आई. छात्रों की प्रमुख शिकायतें स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, जरूरत के मुकाबले कम शिक्षकों और पढ़ाई के लिए खराब होते हालात से जुड़ी बताई गई हैं.

सशस्त्र संघर्ष या किसी विदेशी साजिश से अलग, इन प्रदर्शनों का तत्काल कारण शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं हैं. एसोसिएटेड प्रेस और रॉयटर्स की रिपोर्टिंग में भी स्कूलों की स्थिति, संसाधनों की कमी और पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद का उल्लेख किया गया है.

संघर्ष बढ़ने के साथ छात्र संगठनों के अलावा शिक्षक यूनियनों, श्रमिक संगठनों और राजनीतिक समूहों ने भी आंदोलन को समर्थन दिया. ACLED के अनुसार, 28 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के बीच फ्रांस में छात्रों के नेतृत्व में 800 से अधिक प्रदर्शन दर्ज किए गए. यह 2020 के बाद वहां के बड़े छात्र आंदोलनों में से एक रहा.

इससे स्पष्ट होता है कि आंदोलन का विस्तार केवल ऑनलाइन प्रचार तक सीमित नहीं था. बड़ी संख्या में छात्र और दूसरे समूह वास्तव में सड़कों पर उतरे. लेकिन आंदोलन में विभिन्न संगठनों की भागीदारी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि सभी को किसी एक केंद्र से निर्देश मिल रहे थे.

कौन हैं नेविल रॉय सिंघम?

नेविल रॉय सिंघम अमेरिकी मूल के टेक कारोबारी हैं, जिन्होंने अपनी कंपनी Thoughtworks की बिक्री के बाद सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े संगठनों को आर्थिक सहायता दी. वह चीन के शंघाई में रहते हैं और वामपंथी विचारधारा से जुड़े विभिन्न समूहों के साथ उनके संबंधों पर अमेरिका में राजनीतिक विवाद होता रहा है.

सिंघम से जुड़े नेटवर्क में राजनीतिक शिक्षा, मीडिया, शोध और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े  संगठन काम करते हैं. अमेरिका में इन संगठनों की फंडिंग और विदेशी प्रभाव को लेकर जांच-पड़ताल भी हुई है. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की Ways and Means Committee ने जुलाई 2026 में द पीपल्स फोरम, BreakThrough News और Tricontinental से संबंधित दस्तावेजों की मांग के लिए समन जारी किए थे. जांच का उद्देश्य फंडिंग के स्रोत, वित्तीय संबंधों और विदेशी संस्थाओं से संभावित संपर्कों की पड़ताल करना था.

हालांकि, किसी जांच या समन का जारी होना अपने आप में गैरकानूनी गतिविधि का प्रमाण नहीं है. इसी तरह, किसी कारोबारी के चीन में रहने या चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति कथित वैचारिक समर्थन के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके वित्तपोषित सभी संगठन किसी विदेशी सरकार के निर्देश पर काम कर रहे हैं.

2.2 करोड़ डॉलर की फंडिंग का मामला क्या है?

फ्रांस के छात्र आंदोलन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर प्रकाशित हालिया रिपोर्ट में करीब 2.2 करोड़ डॉलर की फंडिंग का आंकड़ा चर्चा में है. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा है कि यह रकम मुख्य रूप से अमेरिका के द पीपल्स फोरम से जुड़ी बताई गई है.

अमेरिकी कांग्रेस की समिति ने भी सिंघम से जुड़े संगठनों की वित्तीय व्यवस्था, दानदाताओं और विदेशी संबंधों से जुड़े दस्तावेज मांगे हैं. समिति का कहना है कि वह यह जांचना चाहती है कि गैर-लाभकारी संगठनों के माध्यम से आने वाली रकम के स्रोत और इस्तेमाल को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता है या नहीं.

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है. किसी संगठन को लाखों डॉलर का दान मिलने और उस रकम का किसी खास देश में छात्र आंदोलन आयोजित करने में इस्तेमाल होने के बीच सीधा संबंध साबित करना अलग-अलग बात है.

इसके लिए बैंकिंग रिकॉर्ड, अनुदान के दस्तावेज, आयोजकों के साथ संवाद और खर्च के विवरण जैसे प्रमाणों की जरूरत होगी. उपलब्ध रिपोर्टों में सामने आए वित्तीय संबंधों को गंभीरता से जांचा जा सकता है, लेकिन उनसे अकेले यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि फ्रांस के छात्र आंदोलन को उसी पैसे से संचालित किया गया.

फ्रांस के आंदोलन में अंतरराष्ट्रीय संगठनों की क्या भूमिका है?

फॉक्स न्यूज डिजिटल की एक जांच में फ्रांस के छात्र आंदोलन और उसके समर्थक नेटवर्क से जुड़ी 50 संस्थाओं का उल्लेख किया गया है. इनमें छात्र संगठन, श्रमिक यूनियन, वामपंथी राजनीतिक समूह, नागरिक अधिकार संगठन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान शामिल हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ संगठनों ने छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन आयोजित करने, हड़ताल का आह्वान करने और आंदोलन की तस्वीरें व वीडियो अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने का काम किया.

यह डिजिटल दौर की राजनीति का महत्वपूर्ण पहलू है. किसी आंदोलन को मीडिया में किस तरह पेश किया जाता है, इससे उसकी छवि, समर्थन और राजनीतिक संदेश प्रभावित हो सकते हैं.

भारत के Gen Z आंदोलनों से क्या है कनेक्शन?

भारत में युवाओं के विरोध-प्रदर्शन अलग-अलग मुद्दों पर सामने आते रहे हैं. इनमें शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित सवाल शामिल हैं. अक्टूबर 2026 में दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन की घोषणा भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा बनी.

फ्रांस में छात्र आंदोलन और भारत में युवाओं के विरोध के बीच समानता तलाशने वाले कुछ अंतरराष्ट्रीय सोशल मीडिया अकाउंट और संगठनों का उल्लेख हालिया रिपोर्टों में किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस स्थित Indian Alliance Paris ने फ्रांसीसी छात्रों के आंदोलन को भारत में युवाओं के प्रदर्शनों से जोड़ते हुए सोशल मीडिया पोस्ट साझा की.

इस तरह की पोस्ट से यह पता चल सकता है कि अलग-अलग देशों में सक्रिय समूह एक-दूसरे के आंदोलनों के प्रति समर्थन व्यक्त कर रहे हैं. लेकिन केवल सोशल मीडिया पर समर्थन जताने से यह साबित नहीं होता कि दोनों देशों के आंदोलनों का संचालन एक ही संगठन कर रहा है या उन्हें एक ही स्रोत से धन मिल रहा है.

भारत में किसी संगठन या व्यक्ति के विदेशी फंडिंग नेटवर्क से संबंध का दावा करने के लिए भी अलग से दस्तावेजी प्रमाणों की आवश्यकता होगी. केवल वैचारिक समानता, साझा नारे या सोशल मीडिया पर एक-दूसरे का समर्थन करना पर्याप्त सबूत नहीं है.

सोशल मीडिया कैसे बदल रहा है आंदोलनों का स्वरूप?

आज किसी प्रदर्शन की तस्वीर या वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है. हैशटैग, छोटे वीडियो, लाइव प्रसारण और प्रभावशाली सोशल मीडिया अकाउंट किसी स्थानीय मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला सकते हैं.

इस प्रक्रिया के तीन प्रमुख चरण हो सकते हैं. पहला, किसी स्थानीय समस्या को लेकर लोगों का जुटना. दूसरा, राजनीतिक दलों, यूनियनों और सामाजिक संगठनों का उससे जुड़ना. तीसरा, मीडिया और डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से उस आंदोलन का व्यापक राजनीतिक संदेश के रूप में प्रसार होना.

इस प्रक्रिया में संगठित प्रचार की भूमिका हो सकती है, लेकिन वायरल सामग्री हमेशा किसी सुनियोजित अभियान का हिस्सा नहीं होती. कई बार वास्तविक जन-असंतोष, लोगों के व्यक्तिगत अनुभव और घटनाओं की व्यापक मीडिया कवरेज भी आंदोलनों को तेजी से फैलाते हैं.

इसीलिए किसी आंदोलन की पड़ताल करते समय उसके मूल कारणों, आयोजकों, वित्तीय स्रोतों और डिजिटल प्रचार को अलग-अलग समझना जरूरी है.

क्या विदेशी फंडिंग से आंदोलनों को प्रभावित किया जा सकता है?

विदेशी फंडिंग किसी सामाजिक या राजनीतिक अभियान की पहुंच बढ़ाने में मदद कर सकती है. इससे शोध, मीडिया निर्माण, कार्यक्रमों, कार्यालयों और संगठनात्मक गतिविधियों को संसाधन मिल सकते हैं. यदि आर्थिक सहायता देने वाला व्यक्ति किसी खास विचारधारा को बढ़ावा देना चाहता है, तो यह सहायता उसके प्रभाव को बढ़ाने का माध्यम भी बन सकती है.

दूसरी ओर, सामाजिक आंदोलनों को मिलने वाली हर आर्थिक सहायता को विदेशी हस्तक्षेप मान लेना भी सही नहीं है. कई संगठन कानूनी रूप से दान प्राप्त करते हैं और अपने घोषित उद्देश्यों के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं.

असल सवाल यह है कि पैसा कहां से आया, किसे दिया गया, उसका इस्तेमाल किस काम में हुआ और क्या किसी विदेशी संस्था ने राजनीतिक गतिविधियों को निर्देशित किया. इन सवालों का उत्तर अनुमान के बजाय प्रमाणों से ही दिया जा सकता है.

आरोपों से आगे बढ़कर सबूतों पर नजर जरूरी

फ्रांस के छात्र प्रदर्शनों, भारत के युवा आंदोलनों और नेविल रॉय सिंघम से जुड़े वित्तीय नेटवर्क की चर्चा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में फंडिंग और डिजिटल प्रचार की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है.

एक तरफ फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों के कारण हजारों छात्र और समर्थक सड़कों पर उतरे. दूसरी तरफ मीडिया रिपोर्टों ने आंदोलन को व्यापक वैचारिक नेटवर्क से जोड़ने वाले संगठनों और आर्थिक संबंधों पर सवाल उठाए हैं.

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संगठन केवल आंदोलनों को समर्थन और प्रचार दे रहे हैं, या उनके आयोजन और दिशा तय करने में भी उनकी प्रत्यक्ष भूमिका है? इसका जवाब आरोपों या राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि पारदर्शी वित्तीय रिकॉर्ड, विश्वसनीय दस्तावेजों और स्वतंत्र जांच से ही मिल सकता है.

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Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि प्रारम्भ और घटस्थापना: शक्ति आराधना का पावन पर्व

हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्रि को शक्ति की उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाले इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि केवल उपवास और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना, आत्मसंयम और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है।

नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है। इसी के साथ नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना का विधिवत शुभारंभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कलश में देवी शक्ति का आह्वान कर उसे पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है।

2026 में कब शुरू होगी शारदीय नवरात्रि?

वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का प्रारम्भ रविवार, 11 अक्टूबर को होगा। इस दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा रहेगी और इसी दिन घटस्थापना तथा मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। नवरात्रि का समापन 19 अक्टूबर को नवमी के साथ होगा और 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी मनाई जाएगी।

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दिल्ली के लिए 2026 में घटस्थापना का प्रमुख मुहूर्त:?

11 अक्टूबर, प्रातः 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक।
अभिजित मुहूर्त 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा।

मुहूर्त स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। उदाहरण के लिए वाराणसी में घटस्थापना का प्रातःकालीन मुहूर्त 5:54 से 9:48 तक बताया गया है। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित है।

घटस्थापना का क्या है महत्व?

घटस्थापना को नवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विधियों में माना जाता है। कलश को समृद्धि, पूर्णता, जीवन और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कलश के ऊपर स्थापित नारियल और उसके चारों ओर रखी जाने वाली आम की पत्तियां तथा कलश के नीचे बोए जाने वाले जौ प्रकृति, उर्वरता और जीवन के विकास का प्रतीक माने जाते हैं।

धार्मिक परंपरा में कलश स्थापना के माध्यम से देवी शक्ति का आवाहन किया जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक अखंड ज्योति, दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र जाप, आरती और देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है।

घटस्थापना की पूजन विधि

घटस्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके शुद्ध किया जाता है। इसके बाद निम्न प्रकार से पूजा की जा सकती है—

स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा का संकल्प लें।
पूजा स्थल पर स्वच्छ मिट्टी या चौकी तैयार करें।
उसमें जौ के बीज बोएं। नवरात्रि के दौरान उगने वाले इन जौ को धार्मिक रूप से शुभ माना जाता है।
तांबे, पीतल या मिट्टी के कलश में स्वच्छ जल भरें।
कलश में अक्षत, सुपारी, सिक्का और आवश्यकता अनुसार गंगाजल डालें।
कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते लगाएं।
इसके ऊपर लाल वस्त्र में लिपटा हुआ नारियल रखें।
कलश को जौ बोई गई मिट्टी के ऊपर स्थापित करें।
मां दुर्गा का ध्यान करते हुए देवी का आवाहन करें।
रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा सप्तशती अथवा देवी कवच का पाठ करें।
अंत में देवी की आरती करके प्रसाद वितरित करें।

नवरात्रि के नौ दिनों में मां के नौ स्वरूप

नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप की पूजा की जाती है—

पहला दिन — मां शैलपुत्री
दूसरा दिन — मां ब्रह्मचारिणी
तीसरा दिन — मां चंद्रघंटा
चौथा दिन — मां कूष्मांडा
पांचवां दिन — मां स्कंदमाता
छठा दिन — मां कात्यायनी
सातवां दिन — मां कालरात्रि
आठवां दिन — मां महागौरी
नौवां दिन — मां सिद्धिदात्री

इस प्रकार नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है।

शारदीय नवरात्रि की धार्मिक महत्ता

शारदीय नवरात्रि का सबसे प्रमुख संदेश शक्ति और धर्म की विजय है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने देवताओं और पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ा दिया था। तब देवताओं की शक्तियों से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर से युद्ध किया और उसका वध किया।

इसी कारण मां दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है। यह कथा प्रतीकात्मक रूप से यह संदेश देती है कि जब अधर्म, अहंकार और अत्याचार बढ़ता है, तब शक्ति का प्राकट्य होकर उसका प्रतिकार होता है। नवरात्रि की साधना में बाहरी शक्ति के साथ-साथ मनुष्य की आंतरिक शक्ति, संयम और आत्मशुद्धि पर भी जोर दिया जाता है।

नवरात्रि की व्रत कथा

नवरात्रि से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं अलग-अलग पुराणों और क्षेत्रीय परंपराओं में मिलती हैं। इनमें देवी और महिषासुर का युद्ध सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। कहा जाता है कि महिषासुर ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और उसके बाद अपनी शक्ति के अहंकार में देवताओं तथा मनुष्यों को परेशान करने लगा। देवताओं के लिए उसका सामना करना कठिन हो गया। तब ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित सभी देवताओं की शक्तियां एकत्र हुईं और उनसे एक दिव्य स्त्री शक्ति का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने देवी को विभिन्न अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। देवी सिंह पर सवार होकर महिषासुर से युद्ध करने पहुंचीं। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इसी विजय को अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अहंकार पर शक्ति की विजय के रूप में देखा जाता है।

एक अन्य प्रसिद्ध परंपरा में भगवान श्रीराम द्वारा रावण से युद्ध से पहले देवी की आराधना का वर्णन मिलता है। इसी कारण शारदीय नवरात्रि को विजयादशमी से भी जोड़ा जाता है।

व्रत में किन बातों का ध्यान रखें?

नवरात्रि में श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं। कुछ लोग पूरे नौ दिन फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग एक समय भोजन या सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान सामान्यतः अनाज, मांसाहार, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, सेंधा नमक आदि का सेवन अनेक व्रत परंपराओं में किया जाता है।

घटस्थापना से विजयादशमी तक

घटस्थापना के साथ शुरू होने वाली नवरात्रि धीरे-धीरे अष्टमी और नवमी की विशेष पूजा तक पहुंचती है। कई घरों में अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। नौ कन्याओं को देवी के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनका पूजन और भोजन कराया जाता है।

इसके बाद दसवें दिन विजयादशमी आती है। इस प्रकार नवरात्रि का पूरा पर्व केवल देवी पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों यानि अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अन्य विकारों पर विजय पाने का संदेश भी देता है।

- शुभा दुबे

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