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Explainer: फाल्गुनी पाठक के बिना अधूरी क्यों लगती है नवरात्रि? ऐसे बनीं डांडिया क्वीन
Falguni Pathak Story: नवरात्रि का त्योहार आते ही गरबा और डांडिया नाइट्स की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. कहीं लोग रंग-बिरंगे कपड़ों में सजते हैं, तो कहीं डांडिया की लकड़ियों के साथ कदम मिलाने के लिए खास प्लेलिस्ट तैयार की जाती है. इस प्लेलिस्ट में बॉलीवुड के कई गाने शामिल हैं. लेकिन फाल्गुनी पाठक के गानों की बात कुछ अलग ही है. 'इंधना विनवा', 'आवो तो रमवाने' और 'पंखिड़ा' जैसे गाने बजते ही लोगों के कदम अपने आप थिरकने लगते हैं. सालों पुराने इन गानों का क्रेज आज भी कम नहीं हुआ है. यही वजह है कि नवरात्रि के दौरान फाल्गुनी पाठक का नाम खास तौर पर चर्चा में रहता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कभी महज 25 रुपये में गाना गाने वाली फाल्गुनी आज डांडिया क्वीन कैसे बन गईं? आइए जानते हैं-
बचपन से ही सिंगिंग करती थी फाल्गुनी
फाल्गुनी पाठक का जन्म 12 मार्च 1969 को मुंबई में हुआ था. गुजराती परिवार में पली-बढ़ीं फाल्गुनी का बचपन संगीत के बीच बीता. उनके घर में गुजराती लोकगीतों और गरबा का माहौल रहता था. धीरे-धीरे उनका लगाव म्यूजिक की ओर बढ़ने लगा और उन्होंने कम उम्र में ही गाना शुरू कर दिया. उनके करियर की शुरुआत किसी बड़े मंच या म्यूजिक कंपनी से नहीं हुई थी.बल्कि फाल्गुनी ने महज 9 साल की उम्र में पहली बार स्टेज पर गाना गाया था. एक स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में उन्होंने फिल्म 'कुर्बानी' का गाना 'लैला मैं लैला' गाया. इस परफॉर्मेंस के लिए उन्हें 25 रुपये मिले थे, जो उन्होंने अपनी मां को दे दिए थे.
ऐसे शुरू हुआ फाल्गुनी पाठक का करियर
फाल्गुनी पाठक का सफर आसान नहीं था. शुरुआती दिनों में वो स्कूल से घर लौटती थीं, फिर बिना ज्यादा आराम किए कार्यक्रमों के लिए निकल जाती थीं. कई बार उन्हें देर रात तक परफॉर्म करना पड़ता था और घर लौटने में सुबह हो जाती थी. उस समय हर कार्यक्रम से कमाई होना भी जरूरी नहीं था. इसके बावजूद उन्होंने म्यूजिक से दूरी नहीं बनाई.
फिर धीरे-धीरे फाल्गुनी ने पारंपरिक गुजराती संगीत को करीब से समझा और अपनी सिंगिंग को बेहतर किया.
उन्होंने लोकगीतों की ट्रेनिंग ली और अपनी आवाज को निखारने के लिए संगीत प्रेक्टिस की. फिर साल 1989 में उन्हें 'द बीटरज्ज' नाम के डांडिया ग्रुप के साथ काम करने का मौका मिला. यहां उन्होंने डांडिया के गानों और लाइव परफॉर्मेंस की बारीकियां सीखीं. इसके बाद साल 1994 में उन्होंने अपना बैंड 'ता थैया' शुरू किया. इस बैंड के जरिए फाल्गुनी ने डांडिया और गरबा के कार्यक्रमों में अपनी अलग पहचान बनाई.
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'याद पिया की आने लगी' ने बदली किस्मत
फाल्गुनी पाठक को असली पहचान साल 1998 में रिलीज हुए उनके इंडिपॉप एल्बम 'याद पिया की आने लगी' से मिली. इस गाने को लोगों ने खूब पसंद किया और फाल्गुनी की आवाज घर-घर तक पहुंची. उस दौर में म्यूजिक चैनलों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था और इस गाने ने फाल्गुनी को देशभर में पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने कई ऐसे गाने गाए, जो 90 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में खूब फेमस हुए जैस 'मैंने पायल है छनकाई', 'याद पिया की आने लगी', 'चूड़ी जो खनके हाथों में' और ये गाने आज भी पॉपुलर हैं.
फाल्गुनी पाठक के फेमस डांडिया हिट
फाल्गुनी पाठक ने इसके बाद डांडिया और गरबा के गाने भी गाए. इनमें से इंधना विनवा गई थी मोर सैयां गाना तो गुजराती लोकसंगीत और गरबा पसंद करने वालों के बीच काफी फेसम है और आज भी बजता है. इनके अलावा 'पंखिड़ा पंखिड़ा', 'ओ रंग रसिया' और 'मधमिठु नाम' जैसे गुजराती गाने भी फाल्गुनी की पहचान बने और हर साल नवरात्री पर लोग इन गानों पर डांस करते हैं.
कैसे बनीं डांडिया क्वीन?
फाल्गुनी पाठक को डांडिया क्वीन बनाने में उनकी आवाज के साथ-साथ उनके स्टेज शो का भी बड़ा हाथ रहा है. वो अपने गानों के साथ लाइव परफॉर्मेंस के लिए भी जानी जाती हैं. उनके शो में गुजराती लोकगीत, गरबा और डांडिया की धुनें सुनने को मिलती हैं. फाल्गुनी हर साल नवरात्रि के कार्यक्रमों की तैयारी पहले से ही शुरू कर देती हैं. इसके लिए वो गुजराती लोकगीत सुनती हैं और अपने शो के लिए गाने चुनती हैं. उनकी कोशिश रहती है कि लोगों को उनके पुराने पसंदीदा गाने भी सुनने को मिलें और कुछ नया भी देखने-सुनने का मौका मिले.
भारत के साथ विदेशों में भी उनके शो काफी पसंद किया जाता है. यही वजह है कि धीरे-धीरे वो लोगों के बीच 'डांडिया क्वीन' के नाम से मशहूर हो गईं. आज भी नवरात्रि आते ही उनके गानों और लाइव शो का इंतजार लोगों को रहता है. भले ही फाल्गुनी ने बॉलीवुड फिल्मों के लिए ज्यादा गाने नहीं गाए हो, लेकिन उन्होंने इंडिपॉप और लाइव परफॉर्मेंस करके अपनी अलग ही पहचान बनाई है. उन्होंने एक पुराने इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें लगता है कि उनकी आवाज बॉलीवुड के लिए नहीं है.
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