T20 World Cup 2026 का आगाज़ धमाकेदार! ओपनिंग सेरेमनी में नोरा फतेही से लेकर बादशाह समेत ये सितारे लगाएंगे चार चाँद
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मीडिया को दबाने में सरकारें कर रहीं ताकतों का इस्तेमाल:50 फीसदी से ज्यादा देशों में प्रेस की आजादी खतरे में, अमेरिका ने स्वतंत्र विदेशी मीडिया की सब्सिडी रोकी
नवंबर 2024 में सर्बिया के एक रेलवे स्टेशन की कैनोपी गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई। इस घटना पर स्वतंत्र पत्रकारों ने रिपोर्टिंग की, लेकिन कुछ पत्रकारों को गुंडों ने पीटा, पुलिस खड़ी होकर देखती रही। सर्बिया के स्वतंत्र पत्रकार संघ के अनुसार 2025 में वहां पत्रकारों पर 91 शारीरिक हमले हुए। हमलावरों को सजा भी नहीं मिलती है। सर्बिया ही नहीं, दुनियाभर में मीडिया की आजादी घट रही है। रिपोटर्स विदआउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में प्रेस की स्वतंत्रता का वैश्विक औसत स्कोर 2025 में 55 से नीचे आ गया। 2014 में ये 100 में 67 पर था। दुनिया के आधे से ज्यादा देशों में पत्रकारिता करने की स्थितियां कठिन या बहुत गंभीर हैं। प्रेस फ्रीडम की इस गिरावट को गंभीरता से देखा जाना चाहिए, क्योंकि आलोचनात्मक पत्रकारिता (क्रिटिकल जर्नलिज्म) सत्ताधीशों की मनमानी पर नियंत्रण है। अगर ताकतवर लोगों को पता हो कि उनके गलत काम न तो उजागर होंगे और न ही प्रचारित, तो वे और ज्यादा करेंगे। अमेरिकी सरकार पहले दुनियाभर में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खड़ी होती थी। वह अब ऐसा नहीं करती। ट्रम्प प्रशासन ने स्वतंत्र विदेशी मीडिया को दी जाने वाली सब्सिडी खत्म कर दी है। रेडियो फ्री एशिया जैसे सार्वजनिक आउटलेट्स बंद कर दिए हैं। ट्रम्प ने साफ कर दिया है कि वे सरकारों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर दबाव नहीं डालेंगे, जब तक वे वोक यूरोपीयन हों। अजरबैजान से एल साल्वाडोर तक मजबूत शासकों ने परेशान करने वाले पत्रकारों को जेल में डालने, डराने का मौका पकड़ लिया है, क्योंकि राजनयिक प्रतिक्रिया का डर नहीं रहा। इकोनॉमिस्ट के 180 देशों के डेटा के विश्लेषण के मुताबिक मीडिया को दबाने और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के बीच संबंध है। जनता को लूटने वाले राजनेता प्रेस को दबाते हैं, ताकि चोरी करना आसान हो जाए। विश्लेषण बताता है कि किसी देश में प्रेस की आजादी बहुत अच्छी स्थिति से गिरकर खराब स्थिति में आजाए, तो वह ज्यादा भ्रष्ट बन सकता है। यह प्रक्रिया कई वर्षों में बढ़ती है, इसे मतदाता अगला चुनाव होने के बाद ही नोटिस कर पाते हैं। लोकलुभावन सरकारों में स्थिति और भी बदतर होती है। वे उन संस्थाओं को कुचलने की कोशिश करती हैं, जो उनके अधिकार सीमित करती हैं। लोकतांत्रिक सरकारें पत्रकारिता को दबाने के लिए तीन तरह के हमले करती हैं- पहला, शाब्दिक हमला जिसमें पत्रकारों को देशद्रोही बताया जाता है। दूसरा, कानूनी, जिसमें मुकदमे, टैक्स रेड, गिरफ्तारी होती है। तीसरा, आर्थिक हमला जिसमें विज्ञापन और फंड रोककर मीडिया को कमजोर किया जाता है। बड़ी गिरावट लोकतांत्रिक देशों में आ रही मीडिया की आजादी में बड़ी गिरावट लोकतांत्रिक देशों में आ रही है क्योंकि तानाशाही देशों में तो स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग खत्म हो गई है। लोकतांत्रिक सरकारें आलोचना को पूरी तरह खत्म करने की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि वे खबर जुटाने वालों के लिए प्रोत्साहनों को इस तरह बिगाड़ देती हैं कि आम लोगों को सत्तारूढ़ पार्टी की भरपूर तारीफ सुनाई दे और असहमति की आवाज सिर्फ कभी-कभार की चीख जैसी रह जाए। मकसद है ताकतवरों को सत्ता में बनाए रखना और उनके दुरुपयोग की निगरानी कम करना। महिला पत्रकारों पर भी हमले जो लोग ताकतवरों को परेशान करते हैं, उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक की जाती है, खासकर अगर वे महिलाएं हों। संयुक्त राष्ट्र के सर्वे में पाया गया कि 75% महिला रिपोर्टरों ने ऑनलाइन दुर्व्यवहार झेला और 42% को व्यक्तिगत रूप से परेशान किया गया या धमकी दी गई। तुर्किये से तंजानिया तक में असर सितंबर में तुर्किये सरकार ने कैन होल्डिंग नामकमीडिया समूह पर नियंत्रण कर लिया। तंजानिया में धांधली वाले चुनाव को कवर करने पर पत्रकारों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वहीं इंडोनेशिया में पत्रकारिता की गुणवत्ता पिछले पांच या छह वर्षों में आर्थिक दबाव के कारण गिर गई है।
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