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Ganesh Chaturthi Celebration: गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त और Vrat Katha, क्या है चंद्र दर्शन की मनाही?

सनातन धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य, पूजा, यज्ञ या नए कार्य के आरंभ से पहले भगवान गणेश का स्मरण और पूजन करने की परंपरा है। वे बुद्धि, विवेक, शुभारंभ और विघ्नों को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजनीय हैं। गणेश चतुर्थी भगवान श्रीगणेश के जन्मोत्सव का पावन पर्व है, जिसे पूरे भारत में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित की जाती है, पूजा-अर्चना होती है और भजन-कीर्तन के साथ उत्सव मनाया जाता है।

गणेश चतुर्थी 2026 की तिथि

वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी सोमवार, 14 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की स्थापना और पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। हालांकि, पूजा का सटीक शुभ मुहूर्त स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने शहर या क्षेत्र के पंचांग के अनुसार पूजा का समय निर्धारित करना चाहिए।

इसे भी पढ़ें: Hartalika Teej 2026: तिथि, महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा

गणेश चतुर्थी का महत्व

भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी नए कार्य को आरंभ करने से पहले उनका स्मरण करने की परंपरा है, ताकि कार्य में आने वाली बाधाएं दूर हों और सफलता प्राप्त हो। गणेश उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी पर्व है। सार्वजनिक गणेशोत्सव के माध्यम से लोग एक साथ आते हैं, पूजा करते हैं और विभिन्न सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।

गणेश चतुर्थी की पूजन विधि

गणेश चतुर्थी के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर और पूजा स्थल की सफाई करने के बाद भगवान गणेश का स्मरण करते हुए पूजा और व्रत का संकल्प लें।

गणपति स्थापना

पूजा स्थल पर स्वच्छ चौकी रखें और उस पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। प्रतिमा स्थापित करते समय श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश का ध्यान करें। प्रतिमा स्थापित करने के बाद गणपति का आवाहन कर पूजा प्रारंभ की जाती है।

पूजन सामग्री

पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है—

भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र
रोली और चंदन
अक्षत
दूर्वा घास
लाल या पीले पुष्प
धूप और दीप
फल
मोदक और लड्डू
नारियल
पान और सुपारी
पंचामृत एवं स्वच्छ जल
पूजा की विधि

सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और पूजा का संकल्प लें। इसके बाद उन्हें जल से स्नान कराएं अथवा श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करें। फिर चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प और दूर्वा अर्पित करें। भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। उन्हें फल और अन्य सात्त्विक नैवेद्य भी अर्पित किया जा सकता है। पूजा के दौरान श्रद्धालु “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जप कर सकते हैं। इसके पश्चात गणेश चतुर्थी की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है और अंत में भगवान गणेश की आरती की जाती है।

गणेश चतुर्थी व्रत का महत्व

गणेश चतुर्थी के दिन कई श्रद्धालु व्रत रखते हैं। व्रत की विधि और नियम परिवार तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ लोग दिनभर फलाहार करते हैं और पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। व्रत का मुख्य उद्देश्य भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा, आत्मसंयम और सकारात्मक संकल्प की भावना रखना है। इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना भी शुभ माना जाता है।

गणेश चतुर्थी की व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने एक दिन स्नान करने से पहले अपने शरीर के उबटन से एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण प्रतिष्ठित कर दिए। उन्होंने उस बालक को अपना पुत्र बनाया और उसे द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया। माता पार्वती ने बालक से कहा कि जब तक वे भीतर से बाहर न आएं, किसी को भी अंदर प्रवेश न करने देना।

कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे और भीतर जाने लगे। बालक गणेश ने उन्हें रोक दिया। भगवान शिव ने स्वयं को माता पार्वती का पति बताते हुए प्रवेश करने की अनुमति मांगी, लेकिन गणेश जी ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। इससे भगवान शिव और गणेश जी के बीच संघर्ष हुआ। पौराणिक कथा के अनुसार संघर्ष के दौरान भगवान शिव ने क्रोधित होकर गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब माता पार्वती को इस घटना का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं। उन्होंने भगवान शिव से अपने पुत्र को पुनः जीवित करने का आग्रह किया।

तब भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा की ओर जाएं और जो भी प्राणी सबसे पहले दिखाई दे, उसका सिर लेकर आएं। गणों को एक हाथी दिखाई दिया और वे उसका सिर लेकर आए। भगवान शिव ने हाथी का सिर गणेश जी के शरीर पर स्थापित कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें अपना पुत्र स्वीकार किया और वरदान दिया कि संसार में किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाएगी। तभी से भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है।

गणेश चतुर्थी और चंद्र दर्शन की मान्यता

गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता के अनुसार इस दिन चंद्रमा के दर्शन से बचने की परंपरा भी है। इसके पीछे भगवान गणेश और चंद्रमा से संबंधित एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश को मोदक और अन्य प्रिय व्यंजनों का भोग लगाया गया। अधिक भोजन करने के बाद वे अपने वाहन मूषक पर सवार होकर जा रहे थे। मार्ग में मूषक के अचानक डर जाने से भगवान गणेश नीचे गिर पड़े। यह देखकर चंद्रमा हंसने लगा। चंद्रमा के इस उपहास से भगवान गणेश क्रोधित हुए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि जो व्यक्ति चतुर्थी के दिन उसका दर्शन करेगा, उस पर झूठे आरोप लग सकते हैं। बाद में चंद्रमा ने क्षमा मांगी, तब भगवान गणेश ने श्राप को पूर्ण रूप से समाप्त न करते हुए उसमें परिवर्तन कर दिया। इसी कारण कुछ परंपराओं में गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से बचने की मान्यता प्रचलित है।

इस प्रकार, गणेश चतुर्थी आस्था, बुद्धि, शुभारंभ और सामाजिक एकता का पर्व है। भगवान गणेश का स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन में बुद्धि, धैर्य, विवेक और विनम्रता का विशेष महत्व है। वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर, सोमवार को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान गणेश की स्थापना और पूजा कर सुख, समृद्धि, बुद्धि और जीवन की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना कर सकते हैं।

- शुभा दुबे

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Hartalika Teej 2026: तिथि, महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा

सनातन धर्म में हरतालिका तीज का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार के मंगल की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनोवांछित एवं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। हरतालिका तीज को श्रद्धा, तप, प्रेम और अटूट संकल्प का पर्व माना जाता है। इस दिन माता पार्वती के कठोर तप और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा का स्मरण किया जाता है।

हरतालिका तीज 2026 की तिथि

वर्ष 2026 में हरतालिका तीज का व्रत मुख्य रूप से सोमवार, 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर को प्रातः लगभग 7:08 बजे प्रारंभ होकर 14 सितंबर को प्रातः लगभग 7:06 बजे समाप्त हो रही है। उदयातिथि के आधार पर अधिकांश पंचांग 14 सितंबर को हरतालिका तीज मानते हैं। हालांकि, कुछ क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं में प्रदोषकाल या स्थानीय मान्यता के अनुसार 13 सितंबर को भी व्रत रखा जा सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग का पालन करना चाहिए।

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हरतालिका तीज का महत्व

हरतालिका तीज माता पार्वती के भगवान शिव के प्रति अटूट प्रेम और तपस्या का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। उनकी दृढ़ भक्ति और संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस व्रत के माध्यम से श्रद्धालु विशेष रूप से निम्न कामनाएं करते हैं—

सुखी और समृद्ध दांपत्य जीवन
पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य
परिवार में सुख-शांति
मनोवांछित एवं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति
भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद

हरतालिका तीज का नाम भी इसकी पौराणिक कथा से जुड़ा है। प्रचलित व्याख्या के अनुसार ‘हरत’ या ‘हरण’ का संबंध किसी को दूर ले जाने से और ‘आलिका’ का अर्थ सखी से माना जाता है। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें वन में ले गई थीं, ताकि वे अपनी इच्छा के विरुद्ध होने वाले विवाह से बच सकें और भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए तपस्या कर सकें।

हरतालिका तीज की पूजन विधि

हरतालिका तीज के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके चौकी स्थापित करें। परंपरा के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी, रेत या अन्य पारंपरिक सामग्री से शिव-पार्वती की प्रतीकात्मक प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं।

पूजन सामग्री

पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है—

भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र
गणेश जी की प्रतिमा या चित्र
बेलपत्र
धतूरा, आक आदि, स्थानीय परंपरा के अनुसार
पुष्प और माला
रोली, चंदन और अक्षत
धूप और दीप
फल एवं नैवेद्य
सुहाग की सामग्री, जैसे चूड़ियां, सिंदूर और बिंदी
वस्त्र या चुनरी
पंचामृत और स्वच्छ जल
पूजा की विधि

सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान कर उन्हें जल, चंदन, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। भगवान शिव को बेलपत्र और अन्य प्रिय सामग्री श्रद्धापूर्वक चढ़ाई जाती है। इसके बाद हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती कर सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार के मंगल की प्रार्थना की जाती है। प्रातःकाल पूजा को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। यदि किसी कारण से प्रातःकाल पूजा संभव न हो, तो कई परंपराओं में प्रदोषकाल में भी शिव-पार्वती की पूजा की जाती है।

हरतालिका तीज के व्रत का महत्व

हरतालिका तीज का व्रत अनेक परिवारों में निर्जला व्रत के रूप में रखा जाता है। हालांकि, व्रत के नियम क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल भोजन और जल का त्याग नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम, आत्मनियंत्रण और भगवान के प्रति समर्पण भी है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करना चाहिए।

हरतालिका तीज की व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार पर्वतराज हिमवान की पुत्री माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। उन्होंने मन ही मन भगवान शिव को अपना सर्वस्व मान लिया था। माता पार्वती की इच्छा से अनजान उनके पिता हिमवान ने उनका विवाह भगवान विष्णु से करने का विचार किया। जब माता पार्वती को इस बात का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुईं। उनकी एक प्रिय सखी ने उन्हें सलाह दी कि यदि वे भगवान शिव को ही पति रूप में प्राप्त करना चाहती हैं, तो उन्हें एकांत स्थान पर जाकर कठोर तपस्या करनी चाहिए।

कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें घर से दूर घने वन में ले गईं। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव की आराधना करते हुए कठोर तप किया और अन्न-जल का त्याग कर अपनी भक्ति में लीन रहीं। उनकी कठिन तपस्या और अटूट श्रद्धा से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनके समक्ष प्रकट हुए। भगवान शिव ने माता पार्वती से उनकी इच्छा पूछी। माता पार्वती ने विनम्रतापूर्वक भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की।

भगवान शिव ने उनकी तपस्या और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। बाद में पर्वतराज हिमवान ने भी भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के लिए सहमति दे दी। इस प्रकार माता पार्वती की अटूट भक्ति, तपस्या और दृढ़ निश्चय सफल हुआ। तभी से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए हरतालिका तीज का व्रत और पूजन करने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।

इस प्रकार, हरतालिका तीज केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, तपस्या और दृढ़ संकल्प का संदेश देने वाला पर्व है। माता पार्वती का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्ची श्रद्धा और अटल संकल्प के साथ किए गए प्रयास जीवन में सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकते हैं। वर्ष 2026 में हरतालिका तीज मुख्य रूप से 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। तिथि को लेकर क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं में अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा-व्रत का निर्णय करना उचित रहेगा। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना कर सुख, शांति, सौभाग्य और मंगलमय जीवन की कामना कर सकते हैं।

- शुभा दुबे

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