CEC Gyanesh Kumar विरोध प्रदर्शन, Delhi Police ने 22 FIR में लगाई BNS धारा 3(5)
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ सात दिनों तक चले विरोध प्रदर्शन के दौरान, कानून लागू करने वाली एजेंसियों ने कुल 27 FIR दर्ज कीं। प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करने के लिए दिल्ली पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की चार खास धाराओं का मुख्य रूप से इस्तेमाल किया, जिसमें 'संयुक्त आपराधिक दायित्व' को मुख्य आरोप बनाया गया। बैरिकेड्स लगाए गए, जंतर-मंतर और पार्लियामेंट स्ट्रीट के आस-पास की सड़कें बंद कर दी गईं और निषेधाज्ञा लागू की गई। डेटा से पता चलता है कि सरकारी आदेशों को न मानने, सरकारी काम में रुकावट डालने और सरकारी कर्मचारियों का सक्रिय रूप से विरोध करने वालों के खिलाफ़ ठोस कार्रवाई की गई। दिल्ली पुलिस ने नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की अहम धाराओं का इस्तेमाल करते हुए 27 अलग-अलग FIR दर्ज कीं। प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ 27 FIR दर्ज करने के लिए पुलिस ने चार चरणों वाली कानूनी रणनीति अपनाई, जिसमें 'संयुक्त जवाबदेही' (joint liability) वाली धारा का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया गया।
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मुख्य आधार भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 3(5) थी, जिसे 27 में से 22 FIR में लागू किया गया। यह धारा संयुक्त आपराधिक जवाबदेही से जुड़ी है, जिसके तहत अगर कई लोग मिलकर किसी मकसद को पूरा करने के लिए कोई अपराध करते हैं, तो वे सभी समान रूप से दोषी माने जाते हैं। इस धारा का इस्तेमाल करके पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अलग-अलग कार्रवाई करने के बजाय जमा हुए समूहों को एक इकाई के तौर पर देखा और यह साबित किया कि उनके अलग-अलग काम एक संगठित कोशिश का हिस्सा थे। दूसरा कदम BNS की धारा 223(a) थी, जिसका ज़िक्र 18 FIR में किया गया। हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत रोक वाले आदेश लागू होने की वजह से बिना इजाज़त इकट्ठा होने पर मनाही थी। धारा 223(a), जो सरकारी कर्मचारी के आदेश को न मानने से जुड़ी है, ने प्रदर्शनकारियों के तय सीमा पार करने पर उन्हें हिरासत में लेने का शुरुआती कानूनी आधार दिया। जब प्रदर्शनकारियों ने चेकपॉइंट से बचने और मुख्य रास्तों पर धरना देकर रास्ता रोकने की कोशिश की, तो 17 FIR में BNS की धारा 221 लागू की गई। यह धारा सरकारी कर्मचारी को उसके काम में रुकावट डालने से जुड़ी है और इसे उन लोगों के खिलाफ़ लागू किया गया जिन्होंने आने-जाने के रास्ते रोके या सुरक्षा प्रोटोकॉल में बाधा डाली।
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जिन मामलों में टकराव हिंसक हो गया, वहां पुलिस ने 17 FIR में BNS की धारा 132 भी जोड़ी। इस धारा में किसी सरकारी कर्मचारी को ड्यूटी करने से रोकने के लिए हमला करने या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने जैसे अपराध शामिल हैं; बैरिकेड्स पर सीधे शारीरिक विरोध की स्थिति में यह एक गंभीर आपराधिक आरोप जोड़ता है। BNS के आरोपों के अलावा, 9 FIR में PDPP/DPDP एक्ट (सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और उसे खराब करने से रोकने वाला कानून) की धारा 3 भी लगाई गई। मुख्य चार धाराओं के अलावा, कानून लागू करने वाली एजेंसियों ने अलग-अलग घटनाओं की गंभीरता के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई अन्य सख्त धाराएं भी लगाईं: BNS धारा 121/121(1): किसी सरकारी कर्मचारी को ड्यूटी करने से रोकने के लिए जान-बूझकर चोट पहुंचाना या गंभीर चोट पहुंचाना; BNS धारा 115(2): जान-बूझकर चोट पहुंचाना; BNS धारा 126(2): किसी व्यक्ति को गलत तरीके से रोकना; BNS धारा 127(2): गलत तरीके से कैद करना या किसी व्यक्ति की आवाजाही पर गैर-कानूनी रोक लगाना; BNS धारा 74/75: महिलाओं के खिलाफ हमला या आपराधिक बल का इस्तेमाल, जिसमें यौन उत्पीड़न से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं; और BNS धारा 118(1): खतरनाक हथियारों या साधनों का इस्तेमाल करके जान-बूझकर चोट पहुंचाना।
सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को निर्देश, प्रदर्शन के नाम पर Delhi Metro और ट्रेन सेवाएं पूरी तरह न रोकें
नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र को निर्देश दिया कि 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के विरोध प्रदर्शन के कारण मेट्रो और दिल्ली आने वाली ट्रेन की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाए। अदालत ने कहा कि सब कुछ ठप नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि भले ही कानून लागू करने वाली एजेंसियों को अनियंत्रित गतिविधियों को रोकने के लिए कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन नागरिकों को बेवजह परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के मद्देनजर 57 मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने और दिल्ली आने वाली ट्रेन को रद्द करने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। निर्वाचन आयोग के कामकाज में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉजपा और कुछ छात्र संगठनों ने प्रदर्शन का आह्वान किया है। पीठ ने कहा, ‘‘हमारे सामने एकमात्र मुद्दा यह है कि क्या कुछ स्टेशनों से मेट्रो ट्रेन और रेल सेवाओं को पूरी तरह बंद करने के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है।’’ पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि मेट्रो और अन्य ट्रेन की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगाने और उसे नियंत्रित करने में अंतर है।
पीठ ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने अधिकारियों से प्रतिबंध के फैसले पर फिर से विचार करने और मेट्रो ट्रेन तथा अन्य रेल सेवाओं को उचित नियमन के साथ चलने की अनुमति देने का आग्रह करने पर सहमति जताई है, ताकि लोगों को किसी तरह की असुविधा न हो। अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के नेतृत्व में कई वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनने के बाद प्रधान न्यायाधीश ने आदेश दिया, ‘‘इस आश्वासन के मद्देनजर हम स्पष्ट करते हैं कि मेट्रो ट्रेन की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाएगी।’’ प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि संभावित खतरे से निपटने के लिए लगाई जाने वाली पाबंदियां जरूरत से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘आपको कुछ चीज़ों को रोकना होगा।
उन्हें रोकने के लिए सिर्फ़ उतनी ही कार्रवाई करें जितनी जरूरी हो।’’ साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि एहतियाती कार्रवाई से लोगों की आवाजाही पूरी तरह नहीं रुकनी चाहिए। पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि मेट्रो ट्रेन और अन्य रेल सेवाओं की आवाजाही के संबंध में अधिकारियों द्वारा लिए गए फैसले का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। पीठ ने केंद्र से कहा कि वह उचित तरीके से फैसले ले, ताकि यह पक्का किया जा सके कि ‘‘आम जनता को होने वाली परेशानी कम से कम हो।’’ सुनवाई के दौरान पीठ ने दिल्ली मेट्रो के कई स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद किए जाने तथा ट्रेन को रद्द किए जाने पर गंभीर चिंता जताई।
पीठ ने कहा, ‘‘मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।’’ पीठ ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून लागू कराने वाली एजेंसियों को एहतियाती कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन ये कदम खतरे के अनुपात में होने चाहिए और आम नागरिकों को बेवजह परेशानी नहीं होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने सुनवाई की शुरुआत में सॉलिसिटर जनरल मेहता से कहा, ‘‘हमारी मुख्य चिंता इन मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश द्वार पूरी तरह बंद किए जाने को लेकर है। हमें इस पर गंभीर चिंता है।’’ अदालत ने कहा कि उसकी चिंता प्रदर्शनकारियों या किसी व्यक्ति विशेष को लेकर नहीं, बल्कि उन हजारों यात्रियों को लेकर है, जो काम, शिक्षा और अन्य जरूरी कार्यों के लिए गुरुग्राम, ग्रेटर नोएडा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के अन्य हिस्सों से हर दिन दिल्ली आते जाते हैं।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इनमें छात्र, कर्मचारी और बुजुर्ग शामिल हैं, जो सार्वजनिक परिवहन से सफर करते हैं। हम इस शहर के आम नागरिकों की ओर से बात कर रहे हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हर किसी के पास कार नहीं है और न ही सभी के पास निजी वाहन की सुविधा है। लोग सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं।
ऐसा नहीं किया जा सकता।’’ शुरुआत में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि परामर्श में कुछ मेट्रो स्टेशनों से गुजरने वाली ट्रेन की संख्या कम करने की बात कही गई थी, न कि उन्हें पूरी तरह बंद करने की। हालांकि, जब सॉलिसिटर जनरल ने उस प्रावधान को पढ़कर सुनाया, जिसमें कहा गया था कि शनिवार सुबह नौ बजे से स्थिति सामान्य होने तक चिह्नित मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद रहेंगे, तो पीठ ने इस विरोधाभास पर सवाल उठाया। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि जब उसी परामर्श में ट्रेन की आवाजाही की आवृत्ति कम करने का जिक्र है, तो ऐसे कदम को स्वीकार करना मुश्किल होगा।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालत के कर्मचारियों, क्लर्कों, कैंटीन कर्मियों और अन्य कर्मचारियों को अपने कार्यस्थल तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के पास निजी वाहन नहीं हैं, उन्हें विशेष रूप से मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। मेहता ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह सरकार से विचार-विमर्श करेंगे और बदलती स्थिति को देखते हुए प्रतिबंधों को नियंत्रित करने के साथ-साथ समय-समय पर उनकी समीक्षा भी की जा सकती है।
प्रधान न्यायाधीश ने अधिकारियों से सड़कों को बंद करने और बैरिकेड लगाने के फैसले की भी समीक्षा करने को कहा। उन्होंने निर्देश दिया कि उन क्षेत्रों की पहचान की जाए, जहां प्रतिबंध लगाना वास्तव में जरूरी है और जहां तक संभव हो, यातायात का निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मतलब लोगों की सुरक्षा करना है, न कि केवल सरकारी संपत्ति की रक्षा करना।
उन्होंने कहा कि अधिकारियों को सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों की जरूरतों का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘नागरिकों को बेवजह परेशान नहीं किया जाना चाहिए। हम बस इतना ही चाहते हैं।’’ वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने भी शहर भर में बड़े पैमाने पर बैरिकेड लगाए जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि निजी वाहनों से यात्रा करने वाले लोगों को भी दिल्ली के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने से रोका जा रहा है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) महासचिव एम. ए. बेबी की ओर से पेश हुए सिब्बल ने रेल सेवाओं पर प्रस्तावित प्रतिबंधों का मुद्दा भी उठाया। सुनवाई के दौरान एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस के जवान लोगों को प्रदर्शन में शामिल होने से हतोत्साहित करने के लिए मस्जिदों में गए थे। उन्होंने कहा कि ये आरोप शपथपत्र पर लगाए गए हैं और इस संबंध में अदालत में पेश की गई एक तस्वीर तथा वीडियो का भी हवाला दिया।
मेहता ने यह मुद्दा उठाए जाने के तरीके पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह न्याय पाने की वास्तविक कोशिश के बजाय लोगों को भड़काने का प्रयास है। हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने संबंधित अधिकारियों का पक्ष सुने बिना आरोपों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। पीठ की ओर से जताई गई चिंताओं पर जवाब देते हुए मेहता ने कहा कि सरकार प्रतिबंधों की समीक्षा करेगी।
हालांकि, उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था की पृष्ठभूमि स्पष्ट करने की कोशिश की।
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