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अमेरिका में 90 साल बाद सरेआम मौत, पहली बार किसी आर्मी अफसर की सजा का होगा लाइव प्रसारण

US to Execute Fort Hood Shooter: अमेरिकी न्याय और सैन्य इतिहास में एक ऐसा पन्ना जुड़ने जा रहा है जिसकी मिसाल आधुनिक दौर में कहीं नहीं मिलती. टेक्सास के फोर्ट हुड मिलिट्री बेस पर साल 2009 में अंधाधुंध गोलियां बरसाकर 13 लोगों को मौत के घाट उतारने वाले पूर्व आर्मी मेजर निदाल हसन को अब सबके सामने मौत की सजा दी जाएगी. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस पूरी कार्रवाई को टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाइव दिखाया जाएगा. किसी लोकतांत्रिक देश में कैदी को कैमरे के सामने गोली मारने का यह कदम पूरी दुनिया में भारी चर्चा और बहस छेड़ चुका है.

रक्षा मंत्रालय का बड़ा ऐलान

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने एक आधिकारिक बयान जारी कर इस फैसले की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि आने वाली 3 दिसंबर को निदाल हसन को फायरिंग स्क्वाड के सामने लाकर खड़ा किया जाएगा और गोलियां दागकर उसकी सजा पूरी की जाएगी. इस सैन्य सजा का बाकायदा सीधा प्रसारण किया जाएगा. दुनिया भर में सजा को लाइव दिखाने की रिवायत केवल कुछ कट्टरपंथी गुटों या बेहद सख्त तानाशाही वाले देशों में ही देखी जाती रही है. ऐसे में एक महाशक्ति देश द्वारा अपनी सैन्य अदालत के फैसले को इस रूप में पेश करना हर किसी को चौंका रहा है.

फोर्ट हुड के उस खूनी दिन की कहानी

यह पूरा मामला 5 नवंबर 2009 का है जब टेक्सास के फोर्ट हुड सैनिक अड्डे पर अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी थी. सेना में मनोचिकित्सक के पद पर तैनात मेजर निदाल मलिक हसन ने अपनी निजी हैंडगन निकाली और वहां मौजूद सैनिकों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. इस दिल दहला देने वाले हमले में 13 बेकसूर लोगों की जान चली गई थी जिनमें 12 अमेरिकी सैनिक शामिल थे. हमले में 32 अन्य लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे. अमेरिकी धरती पर किसी मिलिट्री बेस के भीतर हुआ यह अब तक का सबसे बड़ा और खूनी हमला था जिसने पूरे देश की सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था.

अमेरिका में 90 साल का सन्नाटा टूटेगा

आधुनिक दौर में अमेरिका के भीतर किसी भी दोषी को जनता के सामने मौत की सजा देने की परंपरा लगभग खत्म हो चुकी थी. सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक अमेरिका में सार्वजनिक रूप से मौत की सजा देने की आखिरी घटना करीब 90 साल पहले दर्ज की गई थी. अगस्त 1936 में केंटकी राज्य के ओवेन्सबोरो शहर में रेनी बेथिया नाम के एक व्यक्ति को बलात्कार के जुर्म में खुले मैदान में फांसी पर लटकाया गया था. उस वक्त उस घटना को देखने के लिए करीब 20 हजार लोगों की भीड़ जमा हुई थी. उसके बाद से देश में फांसी या अन्य तरीकों को जेल की बंद चारदीवारी के अंदर ही सीमित कर दिया गया था. अब निदाल हसन के मामले में ठीक उसी फोर्ट हुड अड्डे पर यह सजा दी जाएगी जहां उसने बेकसूरों का खून बहाया था.

दुनिया भर में सार्वजनिक सजा की स्थिति

एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी मानवाधिकार संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि सार्वजनिक तौर पर जान लेने की प्रथा अब दुनिया के बहुत कम हिस्सों में बची है. ईरान, उत्तर कोरिया, सऊदी अरब और अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत ही ऐसे मामले सामने आते हैं जहां लोगों के सामने दोषियों को सजा दी जाती है. इसके अलावा इस्लामिक स्टेट जैसे कुख्यात आतंकी संगठन अपने बंधकों की हत्या के वीडियो बनाकर इंटरनेट पर जारी करते रहे हैं. किसी स्थापित कानूनी प्रणाली वाले देश में इस तरह का सीधा प्रसारण होना बेहद असामान्य माना जा रहा है.

फायरिंग स्क्वाड से कैसे दी जाती है मौत

फायरिंग स्क्वाड के जरिए सजा देने का एक तय और बेहद कड़ा प्रोटोकॉल होता है. सबसे पहले कैदी को एक मजबूत कुर्सी पर बैठाकर उसकी कमर और सिर को चमड़े के चौड़े पट्टों से कसकर बांध दिया जाता है. कैदी के चेहरे पर एक काला कपड़ा यानी हुड डाल दिया जाता है ताकि वह कुछ देख न सके. इसके बाद एक डॉक्टर स्टेथोस्कोप की मदद से कैदी की छाती की जांच करता है और ठीक उसके दिल की जगह पर एक सफेद गोल निशान लगा देता है.

निशाना तय होने के बाद कैदी से करीब 20 फीट की दूरी पर पांच प्रशिक्षित निशानेबाज अपनी पोजीशन लेते हैं. इन सभी के पास विशेष राइफलें होती हैं जिनमें एक-एक गोली भरी जाती है. इन पांच बंदूकों में से किसी एक में असली कारतूस की जगह डमी यानी खाली कारतूस डाला जाता है. यह बात किसी भी शूटर को नहीं बताई जाती कि किसकी बंदूक में खाली कारतूस है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि सजा पूरी होने के बाद किसी भी शूटर के मन में यह भारी बोझ न रहे कि कैदी की जान उसी की चलाई गोली से गई है. अमेरिका में साल 1976 के बाद से अब तक केवल 6 मामलों में ही इस तरीके का इस्तेमाल किया गया है.

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