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दवा कंपनियों की लूट पर Supreme Court ने की सख्त टिप्पणी, 'दिनदहाड़े डकैती और वसूली' पर प्रशासन चुप क्यों है?

बीमारी इंसान को केवल शारीरिक रूप से नहीं तोड़ती, बल्कि इलाज का खर्च कई परिवारों की आर्थिक कमर भी तोड़ देता है। ऐसे समय में जब कोई परिवार कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो, तब जीवन बचाने वाली दवा की कीमत में दस गुना तक का अंतर सामने आए तो सवाल सिर्फ महंगी दवा का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का बन जाता है। हम आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को दवाओं की कीमतों में इसी भयावह अंतर पर गंभीर चिंता जताते हुए ऐसे सवाल उठाए हैं, जिनका जवाब सरकार, दवा कंपनियों, नियामक संस्थाओं और अस्पतालों, सभी को देना होगा।

मामला उस समय बेहद गंभीर हो गया जब अदालत के सामने बताया गया कि कैंसर की एक आवश्यक दवा खुदरा विक्रेताओं को करीब 2,700 रुपये में उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन उसी दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित है। यानी खुदरा मूल्य उस कीमत का लगभग दस गुना है जिस पर दवा खुदरा विक्रेता तक पहुंच रही है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अंतर पर कड़ा सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर किसी मरीज से इतनी बड़ी रकम क्यों वसूली जानी चाहिए और जिन अधिकारियों को ऐसी व्यवस्था पर निगरानी रखनी चाहिए, वे चुप क्यों हैं।

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देखा जाये तो यहां से सवालों की पूरी श्रृंखला शुरू होती है। अगर दवा की वास्तविक आपूर्ति कीमत और मरीज से वसूले जाने वाले मूल्य के बीच इतना बड़ा अंतर हो सकता है, तो मूल्य-निर्धारण की निगरानी कौन कर रहा है? अगर नियामक संस्थाएं मौजूद हैं, तो ऐसी कीमतें बाजार में पहुंचती कैसे हैं? और अगर नियम हैं, तो उनका पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी है?

सर्वोच्च न्यायालय ने इस अंतर को लेकर बेहद कठोर भाषा का इस्तेमाल किया और इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ तथा ‘वसूली’ जैसे शब्दों से जोड़ा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब जीवनरक्षक दवा की कीमत इतनी अधिक हो जाती है तो मजबूर मरीज क्या करे? अदालत के समक्ष यह बात भी रखी गई कि इलाज के लिए परिवारों को मकान और गहने तक बेचने पड़ते हैं। यही इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू है।

देखा जाये तो एक स्वस्थ व्यक्ति किसी वस्तु की ऊंची कीमत देखकर उसे खरीदने से इंकार कर सकता है, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहा मरीज दवा को आसानी से मना नहीं कर सकता। कैंसर की दवा, हृदय की दवा या किसी दूसरी गंभीर बीमारी की आवश्यक औषधि उसके लिए विलासिता नहीं, जिंदगी की जरूरत है। ऐसे में मरीज और उसके परिवार की मजबूरी ही बाजार में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।

सवाल यह भी है कि क्या किसी अस्पताल की अपनी दवा दुकान से ही दवा खरीदने के लिए मरीज को मजबूर किया जाना चाहिए? हम आपको बता दें कि याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को बाहर से सस्ती दवा खरीदने की अनुमति नहीं देते और अस्पताल की ही दवा दुकान से महंगी दवा लेने के लिए मजबूर करते हैं। इन आरोपों की अंतिम कानूनी पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन अदालत ने इन परिस्थितियों और कीमतों के अंतर को गंभीरता से लिया है।

देखा जाये तो मामला तब और गंभीर हो जाता है जब सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का पैसा इसमें शामिल हो। सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता जताई कि यदि किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत अस्पताल महंगी कीमत पर दवा की प्रतिपूर्ति हासिल करता है, तो अंततः उस खर्च का भार करदाताओं पर पड़ सकता है। अदालत ने ऐसी स्थिति में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की आशंका पर भी सवाल उठाया।

यहां सरकार और नियामक तंत्र से एक और बड़ा सवाल है। जब दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था मौजूद है, तो क्या उसका दायरा पर्याप्त है? सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि कई दवाएं मूल्य-सीमा के दायरे से बाहर हैं और गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने को लेकर नियामकीय खालीपन मौजूद है। हालांकि इस पूरे मामले में यह भी जरूरी है कि हर ऊंची कीमत को अपने आप घोटाला या हर अस्पताल और दवा कंपनी को दोषी न माना जाए। अस्पतालों के एक प्रमुख संगठन ने हाल में कहा है कि दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य अस्पताल तय नहीं करते और खरीद कीमत तथा मरीज से लिए गए मूल्य के अंतर को अलग-अलग परिस्थितियों में जांचना चाहिए। इसलिए असली जरूरत पारदर्शी जांच, कीमतों की स्पष्ट जानकारी और जिम्मेदारी तय करने की है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की मौजूदा सुनवाई ने कम से कम एक महत्वपूर्ण दरवाजा खोल दिया है कि अब सवाल पूछा जा रहा है।

और आम आदमी के लिए यही सबसे बड़ी उम्मीद है। अदालत ने केवल महंगी दवा की शिकायत सुनकर मामला आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि यह पूछा कि कीमत तय करने की व्यवस्था क्या है, नियामक कहां है, मरीज पर इतना बोझ क्यों है और सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है। हम आपको बता दें कि अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होनी है, जिसमें दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने और सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े प्रस्तावों पर आगे विचार होना है।

सर्वोच्च न्यायालय की यह सख्ती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वास्थ्य कोई ऐसा बाजार नहीं होना चाहिए जहां मरीज की मजबूरी मुनाफे का अवसर बन जाए। जरूरत अब सिर्फ तीखी टिप्पणियों की नहीं, बल्कि ऐसी ठोस व्यवस्था की है जिसमें दवा की वास्तविक लागत, निर्माता का मूल्य, खुदरा मूल्य और मरीज से वसूली जाने वाली रकम के बीच पारदर्शिता हो। क्योंकि बीमारी से लड़ रहा आम आदमी पहले ही जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा है। उसे इलाज के नाम पर कीमतों की ऐसी भूलभुलैया में धकेलना, जहां वह अपनी जिंदगी बचाने के लिए घर-गहने बेचने को मजबूर हो जाए, तब इस व्यवस्था पर सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन सवालों को अदालत की चौखट से बाहर समाज के सामने ला दिया है। अब निगाह इस बात पर है कि इन सवालों के बाद व्यवस्था बदलती है या फिर महंगी दवाओं का यह खेल उसी तरह चलता रहता है।

-नीरज कुमार दुबे

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Best Monsoon Car Accessories: मानसून में कार को चमकदार और सुरक्षित रखने के लिए खरीदें ये जरूरी गैजेट्स

मानसून अपने साथ ठंडी हवाएं और राहत जरूर लेकर आता है, लेकिन कार चालकों के लिए यह मौसम कई नई चुनौतियां भी पैदा करता है। तेज बारिश के दौरान विंडशील्ड पर पानी की बूंदें जम जाना, शीशों पर धुंध छा जाना, केबिन में नमी बढ़ना और कार के अंदर कीचड़ पहुंचना आम समस्याएं हैं। इन वजहों से ड्राइविंग मुश्किल होने के साथ-साथ दुर्घटना का खतरा भी बढ़ जाता है। अच्छी बात यह है कि बाजार में कुछ ऐसी किफायती कार एक्सेसरीज उपलब्ध हैं, जो न केवल आपकी कार को साफ-सुथरा रखेंगी बल्कि हर सफर को पहले से ज्यादा सुरक्षित और सुविधाजनक भी बनाएंगी।

हाई-प्रेशर वाटर स्प्रे से मिनटों में करें सफाई

बारिश के मौसम में सड़क का कीचड़ और धूल कार की बॉडी, व्हील और अंडरबॉडी पर तेजी से जमा हो जाती है। ऐसे में हाई-प्रेशर वाटर स्प्रे एक उपयोगी उपकरण साबित होता है। इसकी तेज पानी की धार जमी हुई गंदगी को आसानी से हटा देती है, जिससे कार की चमक बनी रहती है और जंग लगने की संभावना भी कम होती है।

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वाइपर डिटर्जेंट टैबलेट बढ़ाएगी विजिबिलिटी

सिर्फ वाइपर चलाना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि कई बार शीशे पर धूल और चिकनाई की परत बनी रहती है। वाइपर वॉटर टैंक में डिटर्जेंट टैबलेट डालने से पानी अधिक प्रभावी तरीके से सफाई करता है। इससे विंडशील्ड पर जमा दाग, धूल और गंदगी आसानी से हट जाती है और सामने का दृश्य साफ दिखाई देता है।

रेन रिपेलेंट से पानी की बूंदें नहीं टिकेंगी

रेन रिपेलेंट लिक्विड विंडशील्ड पर एक अदृश्य सुरक्षात्मक परत बना देता है। इसके बाद बारिश की बूंदें शीशे पर रुकने की बजाय फिसलकर नीचे गिर जाती हैं। खासकर हाईवे ड्राइविंग के दौरान यह एक्सेसरी विजिबिलिटी को काफी बेहतर बनाती है और कई बार हल्की बारिश में वाइपर चलाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

एंटी-रेन वाटरप्रूफ फिल्म का बढ़ता क्रेज

आजकल कार मालिकों के बीच एंटी-रेन वाटरप्रूफ फिल्म काफी लोकप्रिय हो रही है। इसे साइड ग्लास, रियर ग्लास और ओआरवीएम (साइड मिरर) पर लगाया जाता है। यह फिल्म पानी की बूंदों को शीशे पर जमने नहीं देती, जिससे लेन बदलते समय और पार्किंग के दौरान आसपास का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। यही फिल्म बाइक हेलमेट के वाइजर पर भी उपयोग की जा सकती है।

एंटी-फॉग स्प्रे देगा क्रिस्टल क्लियर व्यू

बारिश के दौरान कार के अंदर और बाहर के तापमान में अंतर होने से शीशों पर धुंध जम जाती है। एंटी-फॉग स्प्रे इस समस्या का आसान समाधान है। इसे शीशों पर लगाने से फॉग बनने की संभावना काफी कम हो जाती है और रात या सुबह की ड्राइविंग भी सुरक्षित रहती है।

इन जरूरी एक्सेसरीज को भी रखें कार में

मानसून के दौरान केवल विजिबिलिटी ही नहीं, बल्कि केबिन की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण होती है। वॉटरप्रूफ सीट कवर और रबर फ्लोर मैट कार के इंटीरियर को गीला और गंदा होने से बचाते हैं। वहीं वायरलेस डोर वार्निंग लाइट रात के समय दरवाजा खुलने पर अन्य वाहनों को सतर्क करती है। इसके अलावा टॉर्च, फर्स्ट एड किट, टो रोप, जंप स्टार्ट केबल और पोर्टेबल एयर पंप (टायर इन्फ्लेटर) जैसी इमरजेंसी एक्सेसरीज किसी भी अप्रत्याशित स्थिति में बेहद काम आती हैं।

मानसून में सुरक्षित ड्राइविंग के लिए अपनाएं ये स्मार्ट तैयारी

बरसात के मौसम में केवल अच्छी ड्राइविंग ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि सही कार एक्सेसरीज भी आपकी सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती हैं। थोड़े से निवेश से आप अपनी कार को साफ, सुरक्षित और हर मौसम के लिए तैयार रख सकते हैं। यदि आप मानसून में बिना किसी परेशानी के आरामदायक और सुरक्षित सफर करना चाहते हैं, तो इन उपयोगी एक्सेसरीज को अपनी कार का स्थायी हिस्सा जरूर बनाएं।

- डॉ. अनिमेष शर्मा

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