Apple डिवाइस पर उम्र सत्यापन से Pornhub की ऑस्ट्रेलिया में वापसी, बच्चों की सुरक्षा भी पुख्ता
(टॉबी मुरे, द यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न) मेलबर्न, आठ अक्टूबर (द कन्वरसेशन) ऑस्ट्रेलिया में एप्पल उपकरणों का इस्तेमाल करने वाले लोग अब एक बार फिर दुनिया की सबसे लोकप्रिय वयस्क सामग्री वाली वेबसाइट पोर्नहब का इस्तेमाल कर सकते हैं। पोर्नहब की मूल कंपनी आयलो ने एप्पल द्वारा हाल में लागू बच्चों की सुरक्षा संबंधी सुविधाओं को अपनाया है। इन सुविधाओं के तहत कुछ संवेदनशील सामग्री तक पहुंचने के लिए एप्पल उपयोगकर्ताओं को यह पुष्टि करनी होगी कि उनकी उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक है।
आयु सत्यापन का यह तरीका ऑनलाइन सुरक्षा और निजता के बीच बेहतर संतुलन कायम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया में मार्च 2026 से नए ई-सेफ्टी नियमों के तहत वयस्क सामग्री तक पहुंचने वाले उपयोगकर्ताओं को आम तौर पर अपनी उम्र 18 वर्ष से अधिक साबित करनी पड़ती है। पोर्नहब समेत कुछ वेबसाइटों ने तीसरे पक्ष की आयु सत्यापन प्रणालियों पर भरोसा करने के बजाय ऑस्ट्रेलियाई उपयोगकर्ताओं के लिए अपनी सेवाएं बंद कर दी थीं।
जो वेबसाइटें उपलब्ध रहीं, उनमें से कई ने योती, पर्सोना, एजजीओ और एजवेरिफ जैसे तीसरे पक्ष के पहचान प्रदाताओं का इस्तेमाल किया। इन सेवाओं में उपयोगकर्ताओं को अक्सर सेल्फी या चेहरे का वीडियो अपलोड करने अथवा क्रेडिट कार्ड या सरकारी पहचान दस्तावेज की जानकारी देने की जरूरत पड़ती है। इस व्यवस्था को लेकर निजता संबंधी चिंताएं हैं।
वयस्कों को अपनी संवेदनशील जानकारी अलग-अलग पहचान प्रदाताओं के साथ साझा करनी पड़ती है, जिससे डेटा चोरी या सुरक्षा में सेंध की स्थिति में गंभीर जोखिम पैदा हो सकता है। कई अलग-अलग प्रदाताओं की मौजूदगी से इन जोखिमों के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था को दरकिनार करने के रास्ते भी बढ़ जाते हैं। एप्पल का मॉडल इससे अलग है।
इसमें उपयोगकर्ता को अलग-अलग वेबसाइटों या पहचान प्रदाताओं के सामने अपनी उम्र साबित करने के बजाय एक बार एप्पल के समक्ष आयु सत्यापित करनी होती है। यह सत्यापन किसी संवेदनशील सामग्री तक पहली बार पहुंचने पर या एप्पल अकाउंट बनाते समय किया जा सकता है। एप्पल उम्र सत्यापित करने के लिए सरकारी पहचान दस्तावेज, क्रेडिट कार्ड की जानकारी या एप्पल आईडी अकाउंट बनाए जाने की तारीख जैसे विकल्प उपलब्ध कराता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि एप्पल के समक्ष 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र साबित करने से उपयोगकर्ता की ऑनलाइन ब्राउजिंग आदतों की जानकारी कंपनी के पास नहीं जाती। बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से भी इस व्यवस्था की खासियत यह है कि जिन उपयोगकर्ताओं ने अपनी उम्र 18 वर्ष से अधिक होने की पुष्टि नहीं की है, उनके उपकरणों में सुरक्षा सुविधाएं डिफॉल्ट रूप से लागू रहती हैं। इनमें वयस्क वेबसाइटों को रोकने के लिए सामग्री फिल्टर और तस्वीरों तथा वीडियो में नग्नता जैसी संवेदनशील सामग्री को धुंधला करने वाली ‘कम्युनिकेशन सेफ्टी’ सुविधा शामिल है।
एप्पल उपकरण उपयोगकर्ता की उम्र से जुड़ी जानकारी एप्लिकेशन के साथ भी साझा कर सकता है, ताकि वे अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू कर सकें। उदाहरण के लिए, गूगल का ‘सेफसर्च’ फीचर संवेदनशील सामग्री को रोक सकता है और 18 वर्ष से कम उम्र के सत्यापित न किए गए उपयोगकर्ताओं के लिए इसे बंद नहीं किया जा सकता। यह मॉडल बच्चों के लिए डिफॉल्ट रूप से सुरक्षित ऑनलाइन अनुभव उपलब्ध कराने के साथ-साथ तीसरे पक्ष के पहचान प्रदाताओं से जुड़े निजता जोखिमों को कम कर सकता है।
लेखक के अनुसार, अब अन्य बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों को भी इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। पोर्नहब की मूल कंपनी आयलो ने गूगल और माइक्रोसॉफ्ट से एप्पल जैसी बाल-सुरक्षा व्यवस्था लागू करने का आग्रह किया है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सऐप की मूल कंपनी मेटा ने भी ऐसी ही व्यवस्था की वकालत की है।
गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के पास इस तरह की व्यवस्था के लिए आवश्यक कुछ बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद है। अगला कदम इसे डिवाइस स्तर पर डिफॉल्ट सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए इस्तेमाल करना होना चाहिए। अंततः पूरे प्रौद्योगिकी उद्योग में एक समान मानक विकसित करने की जरूरत है, ताकि बच्चे और अभिभावक किसी भी कंपनी या उपकरण का इस्तेमाल करें, उन्हें समान सुरक्षा मिले।
साथ ही वेबसाइटों और एप्लिकेशन के लिए उपयोगकर्ता की उम्र की जानकारी उसके उपकरण से सुरक्षित और विश्वसनीय तरीके से हासिल करना आसान हो। निकट भविष्य में अन्य वेबसाइटों द्वारा भी पोर्नहब का अनुसरण करते हुए तीसरे पक्ष के पहचान प्रदाताओं के बजाय उपकरणों में मौजूद आयु सत्यापन और बाल सुरक्षा सुविधाओं पर भरोसा करने की उम्मीद है। इससे बच्चों और अभिभावकों के लिए अधिक सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार हो सकता है।
42 पूर्व जजों का खुला पत्र,”संवैधानिक संस्थाओं को बार-बार “चोर”, “समझौता करने वाला” बताना जनता के भरोसे को कम कर सकता है”
वोट चोरी के आरोपों और विपक्ष के प्रदर्शन के बीच 42 पूर्व जजों ने भारत की जनता के नाम खुला पत्र लिखा है, पत्र लिखने वाले जजों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज से लेकर कई अन्य राज्यों के पूर्व जज शामिल हैं, इन सभी पूर्व जजों ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की कोशिशों पर गहरी चिंता जताई है। गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से विपक्ष देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है।
राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित विपक्ष के कई सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को वोट चोर कहकर उनपर हमलावर हैं और इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं, विपक्षी पार्टियाँ चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठा रही हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह पर वोट चोरी कर सरकार बनाने और ज्ञानेश कुमार पर उनकी मदद करने का आरोप लगा रही है, राहुल गांधी इस मुद्दे को लेकर पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद से ही मुखर हैं।
राहुल गांधी CEC ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी के आरोप लगा रहे हैं
पिछले कई दिनों से देश में वोट चोरी के खिलाफ आंदोलन कर रहे राहुल गांधी पिछले तीन दिनों से दिल्ली की सड़कों पर हैं , वे मंगलवार को चुनाव आयोग पर सैकड़ों लोगों के साथ प्रदर्शन करने पहुंचें, कल उन्होंने जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया और आज एक बार फिर राजघाट पर उन्होंने प्रदर्शन किया, राहुल गांधी का कहना है कि ज्ञानेश कुमार ने वोट चोरी करवाकर जनता के वोट के अधिकार को छीनकर अपराध किया है उन्हें इस्तीफा देना होगा और हम इस्तीफा लेकर रहेंगे।
पत्र में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 42 पूर्व जजों हस्ताक्षर
देश में पिछले तीन दिनों से हो रहे घटनाक्रम के बीच 42 पूर्व जजों का खुला पत्र आज चर्चा में आया है, पत्र में 7 अक्टूबर 20 26 की तारीख लिखी है, बताया जा रहा है कि कल जो कुछ जंतर मंतर पर हुआ उसके बार ये कल शाम ये पत्र देश की जनता के नाम पूर्व जजों ने लिखा है पत्र में पूर्व जजों ने अपना नाम और वे कहाँ पदस्थ रहे इसका उल्लेख भी किया है।
संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार, लेकिन उन्हें नीचा दिखाना नहीं
अंग्रेजी में लिखे तीन पेज के पत्र में 42 पूर्व जजों ने चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की कोशिशों पर गहरी चिंता जताई है। पत्र पर हस्ताक्षर करने वैल पूर्व जजों ने बिना किसी सबूत के “वोट चोरी” के आरोपों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि संवैधानिक संस्थाओं को बार-बार “चोर” और “समझौता करने वाला” (यानी मिलीभगत वाला) बताना लोकतंत्र में जनता के भरोसे को कम कर सकता है। पत्र में कहा गया है, “संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें नीचा दिखाना नहीं।”
जजों ने लिखा – ऐसे समय में चुप रहना अब कोई निष्पक्ष विकल्प नहीं है
तीन पेज के पत्र के पहले पेज पर जजों ने लिखा- “हम पूर्व जजों और संवैधानिक पदों पर रहे रिटायर्ड अधिकारियों के तौर पर लिख रहे हैं। हमारा किसी भी राजनीतिक पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है। हम इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि ऐसे समय में चुप रहना अब कोई निष्पक्ष विकल्प नहीं है। हमारी चिंता गंभीर है। भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। भारत का चुनाव आयोग इन हमलों के केंद्र में है। यहाँ तक कि उच्च न्यायपालिका, जिसका हम बहुत सम्मान करते हैं, और वैधानिक एजेंसियों को भी नहीं बख्शा गया है।”
“ये हमले तर्कसंगत आलोचना नहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह निहित राजनीतिक हितों से प्रेरित एक सुनियोजित अभियान है, जिसमें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अस्थिर करने के संभावित विनाशकारी परिणामों की कोई परवाह नहीं है। संस्थानों की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें बदनाम करना नहीं। अब सार्वजनिक मंचों से संवैधानिक अधिकारियों को “चोर”, “कठपुतली” और “समझौता करने वाला” कहा जाता है।”
“चुनाव कराने वाले अधिकारियों का नाम लेकर उन्हें शर्मिंदा किया जाता है और सत्ता बदलने पर कार्रवाई की खुली धमकी दी जाती है। किसी भी अदालत ने इनमें से किसी भी आरोप को सही नहीं पाया है। “वोट चोरी” के आरोप प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए जाते हैं, न कि अदालतों में। जब आयोग शपथ-पत्र मांगता है, तो कोई शपथ-पत्र दाखिल नहीं किया जाता। हारने के बाद ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर दोष मढ़ा जाता है। उन्हीं मशीनों से मिली जीत पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता। जो पार्टी पांच दशकों से ज़्यादा समय तक देश पर शासन करती रही, वही अब दावा कर रही है कि जिस सिस्टम ने उसे चुना, उसी में धांधली हुई है।”
“यह अकेले काम नहीं करता। चुनिंदा मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ने का लंबा इतिहास रखने वाले एक्टिविस्ट संगठन इन दावों को कानूनी रूप देते हैं। वे एक के बाद एक याचिकाएँ दायर करते हैं। वे शायद ही कभी सबूत पेश करते हैं। कोर्टरूम एक मंच बन जाता है, और जब फ़ैसला आता है, तो अगर वह उनके फ़ायदे का न हो, तो उसकी आलोचना की जाती है। इसके बाद, एक अच्छी तरह से स्थापित और व्यापक रूप से भरोसेमंद न्यायिक प्रणाली में जनता का भरोसा कम करने के जानबूझकर किए गए मकसद से, नफ़रत को बड़े पैमाने पर बढ़ाया और फैलाया जाता है।”
42 former judges write an open letter and warn against attempts to undermine Election Commission. https://t.co/Oq3pv9AQ2W pic.twitter.com/2nwEuTXIdF
— Press Trust of India (@PTI_News) October 8, 2026
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