दिग्गज अभिनेता Nana Patekar का Goa स्थित घर में 75 वर्ष की उम्र में निधन
पणजी, आठ अक्टूबर गैर-पारंपरिक, जटिल, संजीदा और विविध... कई विशेषण, एक शख्सियत—नाना पाटेकर। ये विशेषण नाना पाटेकर के व्यक्तित्व का जितना वर्णन करते हैं, उतना ही उस अभिनेता की पर्दे पर साफ नजर आने वाली संजीदगी के बारे में भी बताते हैं। ‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘यशवंत’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग विधाओं को साधते हुए पाटेकर ने स्टारडम को छुआ जरूर, लेकिन कभी पूरी तरह उसके वश में नहीं हुए।
शायद उनके लिए मिलने वाली भूमिकाओं की असाधारण विविधता ही काफी थी। फिल्म उद्योग में, जहां कूटनीति को जरूरी हुनर माना जाता है, पाटेकर अपनी बेबाकी और दो-टूक अंदाज के लिए जाने जाते थे। 75 वर्षीय अभिनेता का बृहस्पतिवार को गोवा स्थित उनके घर में निधन हो गया।
अपने निधन से महज चार दिन पहले पणजी के पास समुद्र तटीय इलाके डोना पाउला में एक कार्यक्रम में पाटेकर ने कहा था, ‘‘हम सभी को एक दिन जाना है। मुझे नहीं पता कि मैं कल यहां रहूंगा या नहीं। हर किसी के जीवन में वह समय आता है।
लेकिन उससे पहले हमें सोचना चाहिए... क्या मैं वह कर पा रहा हूं जो मैं करना चाहता हूं?’’ उनके ये शब्द अब भविष्यवाणी जैसे लगते हैं और उनके जीवन के दर्शन को भी प्रतिबिंबित करते हैं। पाटेकर का जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 2018 में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।
इस विवाद ने भारत में ‘मीटू’ आंदोलन को गति देने में भूमिका निभाई। पाटेकर ने आरोपों से इनकार किया था। पिता का कारोबार डूबने के बाद किशोरावस्था में ही वह परिवार का भरण-पोषण करने लगे थे।
स्कूल के दिनों में ही उन्हें रंगमंच से लगाव हो गया और फिल्मों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। विजया मेहता के नाटक ‘हमीदाबाईची कोठी’ से रंगमंच पर उन्हें पहचान मिली और इसके बाद कई चर्चित मंचीय भूमिकाएं मिलीं। पाटेकर ने कई साक्षात्कारों में दिवंगत अभिनेत्री स्मिता पाटिल को फिल्मों में आने के लिए प्रेरित करने का श्रेय दिया था।
उन्होंने बताया था कि वह झिझक रहे थे क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके सांवले रंग के कारण उन्हें फिल्मों में अस्वीकार कर दिया जाएगा। 1978 में मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ से उन्होंने बड़े पर्दे पर कदम रखा। इस फिल्म में स्मिता पाटिल और फारुख शेख मुख्य भूमिकाओं में थे।
इसके बाद ‘सिंहासन’, ‘गिद्ध’, ‘आज की आवाज’, ‘अंकुश’ और ‘प्रतिघात’ जैसी फिल्मों में उन्होंने काम किया। 1988 में मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे!’ में स्थानीय गुंडे और ड्रग डीलर की भूमिका ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। ऑस्कर के लिए नामांकित इस फिल्म ने उन्हें समीक्षकों द्वारा प्रशंसित अभिनेताओं की अग्रिम पंक्ति में पहुंचा दिया।
1990 में विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ में उन्होंने मुख्य खलनायक अन्ना की भूमिका निभाई। उनके शांत लेकिन खौफनाक अंदाज में निभाए गए इस किरदार के लिए उन्हें अपना पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 1994 की हिट फिल्म ‘क्रांतिवीर’ में स्वतंत्रता सेनानी के भटके हुए बेटे की भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
फिल्म में उनका किरदार बाद में गरीबों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला व्यक्ति बन जाता है। 1996 की ‘अग्नि साक्षी’ में एक हिंसक और पीछा करने वाले पति की भूमिका के लिए उन्हें तीसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया। प्रकाश झा की ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’, मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’, हास्य फिल्म ‘वेलकम’ और ‘वेलकम बैक’, तमिल फिल्म ‘काला’, संजय लीला भंसाली की पहली फिल्म ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, गुलजार की ‘हू तू तू’ और राम गोपाल वर्मा की ‘भूत’ में उनकी भूमिकाएं एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं।
सिर्फ अभिनय तक सीमित न रहते हुए पाटेकर ने अपने करियर के चरम पर फिल्म निर्देशन में भी हाथ आजमाया। उन्होंने ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन किया और इसमें मराठा लाइट इन्फैंट्री के अधिकारी की भूमिका निभाई। इस भूमिका के लिए उन्होंने दो साल तक प्रशिक्षण लिया।
बाद में इसी प्रशिक्षण का इस्तेमाल उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान किया। उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से युद्ध क्षेत्र में सैनिकों के साथ जाने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलने के बाद वह सेना की क्विक रिएक्शन टीम का हिस्सा बने।
फिल्मों से आगे सामाजिक सरोकारों से जुड़ा उनका पक्ष भी उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा था। महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में जल संरक्षण और जल संचयन के लिए उन्होंने ‘नाम फाउंडेशन’ के माध्यम से काम किया। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने उनके निधन पर कहा, ‘‘आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को उन्होंने जो सहायता दी, वह कई परिवारों के लिए सहारा बनी।
नाना केवल एक बेहतरीन कलाकार और अभिनेता ही नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति बेहद संवेदनशील व्यक्ति भी थे।’’ ‘क्रांतिवीर’ में सांप्रदायिक सौहार्द पर उनका संवाद—‘‘ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून, बता इसमें मुसलमान का कौन सा, हिंदू का कौन सा’’—मुख्यधारा की हिंदी फिल्म में सांप्रदायिक सद्भाव के सबसे प्रभावशाली दृश्यों में आज भी उद्धृत किया जाता है। इसके बाद उन्होंने अपनी बेहतरीन हास्य टाइमिंग का परिचय देते हुए ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी का किरदार निभाया—एक ऐसा गुंडा जो अभिनेता बनने की महत्वाकांक्षा रखता है और गुस्से की समस्या से जूझता है। उसका खुद से कहा जाने वाला संवाद, ‘‘कंट्रोल उदय’’, आज लोकप्रिय मीम और रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुका है।
पाटेकर की अभिनय क्षमता का दायरा इतना व्यापक था कि वह ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी से लेकर ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ के शांत, मूक-बधिर पिता और पति जोसेफ ब्रैगांजा तक को समान सहजता से निभा सकते थे। रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में मराठी परिवार में तीन भाइयों में सबसे छोटे विश्वनाथ पाटेकर के रूप में जन्मे नाना के पिता का छोटा कारोबार था, जो बाद में बंद हो गया। दिसंबर 2024 में ‘पीटीआई भाषा’ से बातचीत में उन्होंने बताया था कि उनका मंचीय नाम नाना कैसे पड़ा।
उन्होंने कहा था, ‘‘एक आंटी मुझे पहले नानू-नानू कहती थीं। वहीं से यह शुरू हुआ। अब तो मेरे पासपोर्ट में भी नाना नाम है।’’ पाटेकर ने ‘बॉम्बे टाइम्स’ को बताया था कि महज 13 साल की उम्र में उन्हें काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
वह एक पारसी कारोबारी के लिए फिल्म के पोस्टर छापने का काम करने के लिए कई मील पैदल जाते थे और इसके बदले उन्हें 35 रुपये मिलते थे। जब उनके पिता का निधन हुआ, तब पाटेकर 28 वर्ष के थे और फिल्मों में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। पिता की मृत्यु का दुख उनके मन में हमेशा रहा।
परिवार की आर्थिक मुश्किलें लंबे समय तक जारी रहीं। स्नातक की पढ़ाई के बाद उन्होंने एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी की, लेकिन रंगमंच से जुड़े रहे। इसी दौरान उन्होंने नीलकांति से शादी की, जो बैंक में काम करती थीं और शौकिया तौर पर रंगमंच से जुड़ी थीं।
दंपति के एक बच्चे का जन्म हुआ, जो जन्म से ही कटे होंठ की समस्या से पीड़ित था और ढाई साल की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके दूसरे बेटे मल्हार का जन्म हुआ। आर्थिक और निजी तनाव के इन वर्षों ने उन पर गहरा असर डाला और शायद यही वजह रही कि उनकी कई फिल्मों के किरदारों में गुस्से और आक्रोश की झलक दिखाई दी।
2018 में तनुश्री दत्ता के आरोपों के बाद पाटेकर सुर्खियों में आए। उन्होंने आरोपों का जोरदार खंडन किया था। प्राथमिकी दर्ज हुई और मामला स्थानीय अदालत में गया, लेकिन पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण इसे बंद कर दिया गया।
‘वनवास’ की शूटिंग के दौरान एक प्रशंसक को थप्पड़ मारने का उनका वीडियो भी वायरल हुआ था। बाद में फिल्म की टीम ने कहा था कि यह शूटिंग का हिस्सा था। इस साल फरवरी में रिलीज हुई विशाल भारद्वाज की ‘ओ’ रोमियो’ में डीसीपी इस्माइल खान की भूमिका उनका आखिरी प्रमुख किरदार था।
इसमें वह एक ऐसे अधिकारी के रूप में नजर आए थे जो भारत में सक्रिय एक डॉन को निशाना बनाने के लिए एक गैंगस्टर को तैयार करता है। फिल्म के प्रचार के दौरान देरी से नाराज होकर पाटेकर बीच में ही प्रचार अभियान छोड़कर चले गए थे। जब परिवार, मित्र और प्रशंसक उन्हें अंतिम विदाई दे रहे हैं, तब ‘वेलकम’ का वह दृश्य याद आता है जो अनेक मुद्दों पर बने अनगिनत मीम में बार-बार नजर आता है, जिसमें पाटेकर का किरदार जोर-जोर से हंसता है।
फिल्मों से निकलकर समकालीन लोकप्रिय संस्कृति तक पहुंची यह छवि शायद इसी तरह प्रशंसकों की स्मृतियों में नाना पाटेकर को जीवित रखेगी।
Vanakkam Poorvottar: Sikkim में बन रही है 9000 करोड़ की नई रेल लाइन, Tourism से लेकर Strategic Connectivity तक आयेगा बड़ा बदलाव
सिक्किम की खूबसूरत पहाड़ियों तक पहुंचने का अनुभव अब एक नए अध्याय में प्रवेश करने जा रहा है। भारतीय रेल ने गंगटोक को रेल नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाते हुए 34 किलोमीटर लंबी रंगपो-गंगटोक रेल लाइन को प्राथमिकता के स्तर पर आगे बढ़ाया है। करीब 9,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली यह परियोजना पूरी होती है तो देश के सबसे आकर्षक पर्वतीय पर्यटन स्थलों में शामिल गंगटोक तक रेल पहुंच का रास्ता खुल जाएगा।
यह प्रस्ताव हाल में प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के तहत काम करने वाले इंटीग्रेटेड मल्टीमॉडल नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप (NPG) के सामने रखा गया है। मकसद केवल एक नई रेल लाइन बनाना नहीं, बल्कि ऐसा क्रम तैयार करना है जिसमें सिवोक-रंगपो लाइन के चालू होते ही रंगपो-गंगटोक पर काम में बड़ा अंतर न आए।
फिलहाल पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग क्षेत्र के सिवोक को पूर्वी सिक्किम के रंगपो से जोड़ने वाली 44.96 किलोमीटर लंबी सिवोक-रंगपो रेल परियोजना निर्माणाधीन है। करीब 17,124 करोड़ रुपये की लागत वाली इस राष्ट्रीय महत्व की परियोजना को दिसंबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है। परियोजना लगभग 75 प्रतिशत भौतिक प्रगति हासिल कर चुकी है।
देखा जाये तो हिमालयी भूगोल ने इस रेलमार्ग को देश की सबसे चुनौतीपूर्ण रेलवे परियोजनाओं में शामिल कर दिया है। हम आपको बता दें कि पूरी लाइन का करीब 86 प्रतिशत हिस्सा यानी 38.623 किलोमीटर सुरंगों से होकर गुजरेगा। मार्ग में 14 सुरंगें, 13 बड़े और 10 छोटे पुल बनाए जा रहे हैं। सबसे लंबी सुरंग 5.30 किलोमीटर और सबसे छोटी 538 मीटर की होगी। सुरंग निर्माण के लिए न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (NATM) अपनाई जा रही है।
इस रेलखंड पर सिवोक, रियांग, मेल्ली, रंगपो और तीस्ता बाजार स्टेशन प्रस्तावित हैं। तीस्ता बाजार में भूमिगत हॉल्ट स्टेशन इस परियोजना को तकनीकी रूप से और भी खास बनाता है। 44.96 किलोमीटर में 41.55 किलोमीटर हिस्सा पश्चिम बंगाल और 3.41 किलोमीटर सिक्किम में होगा।
इस परियोजना का सामरिक महत्व भी कम नहीं है। पहाड़ी राज्य सिक्किम तक सड़क संपर्क मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है, जबकि रेल नेटवर्क एक अतिरिक्त और अपेक्षाकृत अधिक स्थिर परिवहन विकल्प उपलब्ध कराएगा। आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति, यात्रियों की आवाजाही और माल परिवहन को इससे मजबूती मिलने की उम्मीद है। आगे चलकर देश के अलग-अलग हिस्सों से सिक्किम के लिए लंबी दूरी की ट्रेन सेवाओं का रास्ता भी खुल सकता है।
इसके अलावा, सिक्किम पहुंचने वाले पर्यटकों के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि फिलहाल पहाड़ी सड़कों पर निर्भरता कई बार यात्रा का अनुभव प्रभावित कर देती है। बारिश, भूस्खलन, बर्फबारी या खराब मौसम के कारण सड़क मार्ग बाधित होने पर पर्यटकों को घंटों इंतजार करना पड़ता है, यात्रा कार्यक्रम बिगड़ जाता है और कई बार गंगटोक तथा आसपास के पर्यटन स्थलों तक पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है। दूर-दराज से सिक्किम पहुंचे पर्यटकों के लिए ऐसी परिस्थितियां खास तौर पर निराशाजनक होती हैं। ऐसे में रेल कनेक्टिविटी एक अतिरिक्त और अधिक भरोसेमंद परिवहन विकल्प उपलब्ध करा सकती है, जिससे पर्यटन सीजन में यात्रियों की आवाजाही सुगम होने के साथ सिक्किम की पर्यटन क्षमता को भी नया विस्तार मिल सकता है।
रणनीतिक स्तर पर देखें तो यह परियोजना केवल गंगटोक तक ट्रेन पहुंचाने की कहानी नहीं है। पूर्वोत्तर की राजधानियों को रेल नेटवर्क से जोड़ने की राष्ट्रीय कोशिश के क्रम में सिक्किम का राजधानी-कनेक्टिविटी नेटवर्क में आना क्षेत्रीय संपर्क को नया आयाम देगा। सिवोक-रंगपो और उसके बाद रंगपो-गंगटोक का जुड़ाव यात्री परिवहन, माल ढुलाई, पर्यटन और व्यापक आर्थिक गतिविधियों को एक ही कॉरिडोर में जोड़ सकता है।
साथ ही पर्यटकों के लिए इसकी तस्वीर बेहद रोमांचक है। कल्पना कीजिए कि पहाड़ों के बीच सुरंग से निकलती ट्रेन, खिड़की के बाहर तीस्ता की घाटियां, घने जंगल, ऊंचे पहाड़ और फिर धीरे-धीरे गंगटोक की ओर बढ़ता रेलमार्ग। जिस सिक्किम की यात्रा अब तक मुख्यतः सड़क या हवाई मार्ग से जुड़ी रही है, वहां भविष्य में ट्रेन की यात्रा खुद एक पर्यटन अनुभव बन सकती है।
हम आपको याद दिला दें कि 2021 में सिवोक-रंगपो परियोजना की समीक्षा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देरी के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए थे। अब परियोजना को 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है। यदि इसके बाद रंगपो-गंगटोक विस्तार भी गति पकड़ता है, तो सिक्किम की पहाड़ियों में केवल रेल की पटरियां नहीं बिछेंगी बल्कि पर्यटन, व्यापार, आपूर्ति और रणनीतिक संपर्क के लिए एक नया गलियारा तैयार होगा।
बहरहाल, गंगटोक तब सिर्फ पहाड़ों की खूबसूरती देखने की मंजिल नहीं रहेगा; वह भारतीय रेल के नक्शे पर दर्ज एक ऐसा गेटवे बन सकता है, जहां रोमांचक हिमालयी यात्रा और आधुनिक परिवहन का संगम दिखाई देगा।
-नीरज कुमार दुबे
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