INDIA Block Protest | हजारों की भीड़, सामने पुलिस और Rahul Gandhi.. कैमरे में कैद हुआ पूरा VIDEO
INDIA Bloc के Election Commission विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में राहुल गांधी और पुलिस के बीच हुई बातचीत का एक वीडियो अब चर्चा में है। Jantar Mantar की ओर बढ़ रहे विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ के बीच एक दिल्ली पुलिस अधिकारी राहुल गांधी से अपील करते हुए सुनाई दिए—“सर, हजारों की भीड़ है… चोट लग जाएगी।” इसके बाद राहुल गांधी ने पुलिस के साथ तीखी बातचीत की और प्रदर्शन स्थल की ओर आगे बढ़ने पर जोर दिया। #rahulgandhi #rahulgandhiprotest #delhipolice #jantermantar #indiabloc #congress #ecprotest #electioncommission #timesnownavbharat You can Search us on YouTube by- NBT, NBT TV Live, Navbharat Times, Times Now, TNN, TNNB, Navbharat TV, Hindi News, Latest news and @timesnownavbharat About Channel: Times Now Navbharat देश का No.1 Hindi news है। यह चैनल भारत और दुनिया से जुड़ी हर Latest News और Breaking News , राजनीति, मनोरंजन और खेल से जुड़े समाचार आपके लिए लेकर आता है। इसलिए सब्सक्राइब करें और बने रहें टाइम्स नाउ नवभारत के साथ Times Now Navbharat is India's fastest growing Hindi News Channel with 24 hour coverage. Get Breaking news, Latest news, Politics news, Entertainment news and Sports news from India & World on Times Now Navbharat. ------------------------------------------------------------------------------------------------------------- Watch Live TV : https://www.timesnowhindi.com/live-tv Subscribe to our other network channels: Times Now: https://www.youtube.com/TimesNow Zoom: https://www.youtube.com/zoomtv ------------------------------------------------------------------------------------------------------------- You can also visit our website at: https://www.timesnowhindi.com Download our App for Breaking News: https://tinyurl.com/bde8rv84 Like us on Facebook: https://www.facebook.com/Timesnownavbharat Follow us on Twitter: https://twitter.com/TNNavbharat Follow us on Instagram: https://www.instagram.com/timesnownavbharat
बुक रिव्यू- जिंदगी का साथ निभाता चला गया:साहिर लुधियानवी का जिंदगीनामा, जहां मोहब्बत, बगावत, तन्हाई और शायरी, सब साथ चलते हैं
किताब का नाम- जिंदगी का साथ निभाता चला गया साहिर का प्रामाणिक जिंदगीनामा लेखक- राजेश बादल प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन मूल्य- 499 रुपए कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है... इस पंक्ति को लिखने वाले साहिर लुधियानवी की अपनी जिंदगी में भी कई ऐसे ख्याल थे, जो कभी मुकम्मल नहीं हो सके। प्रेम था, लेकिन मंजिल नहीं। शोहरत थी, लेकिन सुकून नहीं। लोगों की भीड़ थी, लेकिन भीतर गहरा अकेलापन था। यही वजह है कि राजेंद्र बादल की किताब 'जिंदगी का साथ निभाता चला गया: साहिर का प्रामाणिक जिंदगीनामा' सिर्फ एक मशहूर गीतकार की जीवनी नहीं रह जाती। यह उस इंसान की तलाश बन जाती है, जिसने अपने शब्दों से करोड़ों लोगों की भावनाओं को आवाज दी, लेकिन खुद अपनी जिंदगी में कई अधूरेपन लेकर जीता रहा। किताब में क्या है? बहुत सादगी से लेखक साहिर की जिंदगी के एक-एक किरदार से हमारा परिचय कराते हैं। कहीं भी अनावश्यक सनसनी नहीं है। न प्रेम प्रसंगों में, न विवादों में और न ही उनके संघर्षों में। यही संयम किताब को विश्वसनीय बनाता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि हम एक बेहद दिलचस्प उपन्यास पढ़ रहे हैं, जहां आगे क्या होगा, यह जानने की उत्सुकता लगातार बनी रहती है। किताब की सबसे असरदार बात किताब की सबसे बड़ी ताकत इसकी ईमानदारी है। लेखक साहिर की उपलब्धियां बताते हैं तो उनकी कमजोरियां भी सामने रखते हैं। उनके भीतर के आत्मविश्वास को दिखाते हैं और उनके अकेलेपन को भी दिखाते हैं। साहिर की जिंदगी में जितनी जगह शायरी की है, उतनी ही जगह रिश्तों की भी है। उनकी मां, दोस्त, प्रेम संबंध, साथी और उनकी लड़ाइयां, इन सबको मिलाकर साहिर की एक ऐसी तस्वीर बनती है, जो अक्सर उनके गीतों और नज्मों के पीछे छिप जाती है। किताब पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि साहिर को समझने के लिए सिर्फ उनके गीत काफी नहीं हैं। उनके पीछे खड़े उस इंसान को समझना भी जरूरी है। माहौल ने व्यक्तित्व को आकार दिया किताब का एक रोचक हिस्सा साहिर के शुरुआती जीवन से जुड़ा है। यहां पाठक उस 'अब्दुल हई' से मिलता है, जो आगे चलकर साहिर लुधियानवी के नाम से मशहूर हुआ। राजेंद्र बादल बताते हैं कि कैसे उनका बचपन, पारिवारिक परिस्थितियां, पढ़ाई-लिखाई और साहित्यिक माहौल ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया। इसके बाद किताब का सबसे भावनात्मक हिस्सा साहिर और उनकी मां के रिश्ते का है। बचपन में पिता से अलगाव, जमींदारी, परिवार की खींचतान और मां का संघर्ष उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करता है। किताब पढ़ते हुए लगता है कि महिलाओं के प्रति साहिर की संवेदनशीलता की जड़ें इसी रिश्ते में थीं। कई जगह यह हिस्सा इतना मार्मिक हो जाता है कि पाठक कुछ देर के लिए रुक जाता है। अधूरी मोहब्बतें और एक लंबी तन्हाई साहिर की जिंदगी का जिक्र अमृता प्रीतम के बिना पूरा नहीं हो सकता। लेखक इसे किसी सनसनीखेज प्रेम कहानी की तरह नहीं लिखते। यह दो संवेदनशील रचनाकारों के बीच मौजूद एक गहरे लगाव की कहानी बनकर सामने आता है। इसके बाद साहिर की जिंदगी में आने वाले दूसरे रिश्तों और भावनात्मक पड़ावों का भी जिक्र मिलता है। किताब पढ़ते हुए महसूस होता है कि प्रेम उनकी जिंदगी में कई रूपों में आया, लेकिन शायद कोई भी रिश्ता उनके भीतर की तन्हाई को पूरी तरह भर नहीं पाया। यही वजह है कि उनकी शायरी में मोहब्बत के साथ-साथ एक गहरा खालीपन भी दिखाई देता है। शायद इसी कारण उनके गीत और नज्में आज भी इतने निजी और सच्चे लगते हैं। सिर्फ 'प्रेम के शायर' नहीं थे साहिर राजेंद्र बादल की किताब का एक बड़ा योगदान यह है कि वह साहिर को सिर्फ रोमांटिक गीतों के रचनाकार की सीमित छवि से बाहर निकालती है। उनकी शायरी में दिल टूटने की टीस भी है और समाज के प्रति बेचैनी भी। उनकी रचनाओं में बंटवारे का दर्द, किसानों की बदहाली, मजदूरों का संघर्ष, युद्ध की त्रासदी और सामाजिक असमानताएं बार-बार दिखाई देती हैं, जैसेकि- "ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया, ये इंसां के दुश्मन समाजों की दुनिया..." इन पंक्तियों में अपने समय की विसंगतियों से बेचैन एक रचनाकार बोल रहा है। शायद यही वजह है कि साहिर की शायरी आज भी सिर्फ सुनी नहीं, बल्कि महसूस भी की जाती है। गीतकारों के सम्मान की लड़ाई किताब का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जहां साहिर के फिल्म इंडस्ट्री में योगदान की चर्चा होती है। आज फिल्मों में गीतकारों का नाम देखना सामान्य बात लगती है। लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब गीतों की लोकप्रियता का श्रेय मुख्य रूप से संगीतकारों और गायकों को मिलता था। साहिर उन लोगों में थे, जिन्होंने गीतकारों की पहचान और सम्मान के लिए आवाज उठाई। उन्होंने यह स्थापित करने की कोशिश की कि गीत सिर्फ धुन से नहीं बनते, शब्द भी उसकी आत्मा होते हैं। इससे साहिर का एक ऐसा पक्ष सामने आता है, जिसकी चर्चा आमतौर पर उनके गीतों के मुकाबले कम होती है। शोध की गहराई हर पन्ने पर दिखाई देती है राजेंद्र बादल ने इस किताब को लिखने में करीब पंद्रह साल लगाए। कई इंटरव्यू, दुर्लभ संस्मरण, दस्तावेज, नज्में और चर्चित गीतों के जरिए वे साहिर के जीवन को विस्तार से सामने रखते हैं। किताब में दुर्लभ तस्वीरें और फिल्मी पोस्टर भी शामिल हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इतनी शोधपूर्ण सामग्री होने के बावजूद किताब कहीं भी बोझिल नहीं लगती। भाषा और लिखने का ढंग राजेंद्र बादल की भाषा इस किताब की बड़ी ताकत है। वे शोध को कहानी में बदल देते हैं। कई जगह ऐसा लगता है जैसे आंखों के सामने कोई फिल्म चल रही हो। पात्र आते हैं, रिश्ते बनते हैं, टूटते हैं और एक पूरा दौर जीवंत हो उठता है। हर अध्याय के अंत में एक उत्सुकता बनी रहती है। यही वजह है कि किताब को बीच में छोड़ना मुश्किल हो जाता है। यह किताब किसे पढ़नी चाहिए? अगर आप उन किताबों को पसंद करते हैं, जो किसी व्यक्ति के बहाने एक पूरे दौर की तस्वीर सामने रखती हैं, तो यह किताब आपको बांधे रखेगी। वहीं हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में रुचि रखने वाले पाठकों को भी इसमें कई रोचक प्रसंग मिलेंगे। ग्राफिक में देखिए, यह किताब किन्हें जरूर पढ़नी चाहिए- किताब के बारे में मेरी राय बहुत समय बाद कोई जीवनी इतनी देर तक साथ रही। कुछ हिस्से भावुक करते हैं, कुछ बेचैन करते हैं और कुछ एक अजीब-सा खालीपन छोड़ जाते हैं। किताब पढ़ने के बाद "वो सुबह कभी तो आएगी" और "मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया" जैसे गीत नए अर्थों में लौटते हैं। किताब का अंतिम हिस्सा सबसे ज्यादा देर तक याद रहता है। जब राजेंद्र बादल लिखते हैं कि- "पल दो पल का शायर पलभर में खामोशी से वहां जा बैठा था, जहां से लौटकर कोई नहीं आता।" तो पूरी किताब आंखों के सामने घूम जाती है। किताब बंद होने के बाद साहिर के गीतों से ज्यादा, उन्हें लिखने वाला इंसान याद रह जाता है। शायद किसी भी जीवनी की सबसे बड़ी सफलता यही है। …………………………. ग्राफिक्स- अजीत सिंह ………………………….. ये खबर भी पढ़ें…. बुक रिव्यू- 10 फैसले, जिन्होंने बदल दी भारत की तस्वीर:बड़े संकटों से बड़ी लड़ाइयों और बदलावों तक आधुनिक भारत की निर्माण यात्रा किसी देश का इतिहास सिर्फ युद्धों, चुनावों और सरकारों की कहानी नहीं होता। कई बार कुछ ऐसे फैसले और घटनाएं होती हैं, जो पूरे लोकतंत्र की दिशा बदल देती हैं। भारत के इतिहास में भी ऐसे कई मोड़ आए हैं, जब संविधान, अदालत, सरकार और आम नागरिक के बीच रिश्ते की परीक्षा हुई। प्रिया जैन की किताब ‘10 फैसले, जिनसे बदला देश’ इन्हीं निर्णायक घटनाक्रमों के जरिए आधुनिक भारत को समझने की कोशिश करती है। पूरी खबर पढ़ें…
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