गुजरात High Court का आदेश, ITS अधिकारी की हिरासत में मौत पर दर्ज हो FIR
अहमदाबाद, सात अक्टूबर गुजरात उच्च न्यायालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से रिश्वत के मामले में गिरफ्तार किए गए भारतीय व्यापार सेवा (आईटीएस) के एक अधिकारी की 2023 में हिरासत में हुई मौत के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने और डीआईजी (सीआईडी, अपराध) की देखरेख में घटना की जांच करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति एमके ठक्कर की पीठ ने आईटीएस के उस अधिकारी की हिरासत में हुई मौत से जुड़े मामले में एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया, जो रिश्वत के मामले में गिरफ्तारी के बाद केंद्रीय एजेंसी की ओर से ‘पोस्ट-ट्रैप’ प्रक्रिया के दौरान अपने चैंबर की खिड़की से कथित तौर पर कूद गया था। ‘पोस्ट-ट्रैप’ प्रक्रिया से आशय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वत या भ्रष्टाचार के मामलों में जाल बिछाने के बाद की जाने वाली कानूनी और वैज्ञानिक कार्रवाई से है।
उच्च न्यायालय ने हाल में दिए आदेश में कहा, “मामले की पूरी तथ्यात्मक पृष्ठभूमि और ऊपर बताए गए सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए इस अदालत की राय है कि न्याय के हित में यह उचित होगा कि किसी अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए और आगे की जांच किसी स्वतंत्र अधिकारी को सौंपी जाए।” आदेश में कहा गया है कि मामले की जांच गुजरात के अपराध जांच विभाग (सीईडी) के डीआईजी (अपराध) की देखरेख में की जाए। भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार किए गए जावरी मल बिश्नोई अपनी मौत के समय राजकोट में विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) में संयुक्त महानिदेशक के पद पर कार्यरत थे। बिश्नोई की पत्नी सुमन की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि पुलिस ने मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के बजाय घटना को “दुर्घटनावश हुई मौत” मानकर जांच की, जो उच्चतम न्यायालय की ओर से अलग-अलग फैसलों में दिए गए निर्देशों का उल्लंघन है।
बिश्नोई पर आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता को सीमा शुल्क बचाने के लिए जरूरी लाइसेंस दिलाने के अपने आधिकारिक काम के बदले उससे नौ लाख रुपये की रिश्वत की मांग की थी। सीबीआई ने 24 मार्च 2023 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-7 (आधिकारिक काम के लिए रिश्वत लेने के वास्ते लोक सेवक को सजा) के तहत बिश्नोई के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। उसने दावा किया था कि रिश्वत की कथित रकम का कुछ हिस्सा बिश्नोई के कार्यालय की दराज से बरामद किया गया था।
शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद: Eknath Shinde गुट ने सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग के फैसले को सही ठहराया
नयी दिल्ली, सात अक्टूबर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय में निर्वाचन आयोग के उस फैसले का बचाव किया, जिसमें उसे असली शिवसेना के रूप में मान्यता देते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ आवंटित किया गया था। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. के. कौल ने कहा कि इस बात का ‘‘रत्ती भर भी सबूत नहीं’’ है कि 2011 के बाद शिवसेना का कोई संविधान निर्वाचन आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। कौल ने पार्टी के संविधान, आंतरिक लोकतंत्र, निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र और चुनाव चिह्न विवाद के निपटारे के लिए आयोग द्वारा फैसला किए जाने के समय समेत कई मुद्दों पर दलील दीं।
उन्होंने कहा कि आयोग ने अपने दो आदेशों में दर्ज किया था कि उसके पास उपलब्ध पार्टी का एकमात्र संविधान 2011 का था, जिसे आयोग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया गया था। उन्होंने कहा कि विवाद बाद में तब पैदा हुआ, जब पार्टी के संविधान में बदलाव करने का प्रयास किया गया और दावा किया गया कि संशोधित दस्तावेज आयोग को सौंप दिया गया था। कौल ने कहा कि आयोग के अनुसार उसे ऐसा कोई दस्तावेज कभी प्राप्त नहीं हुआ और उसके समक्ष भेजे गए पत्रों में भी संशोधित संविधान संलग्न नहीं था।
उन्होंने कहा कि शिंदे का समर्थन करने वाले 40 विधायक 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के 55 विजयी विधायकों को मिले कुल मतों में से 76 प्रतिशत मतों का प्रतिनिधित्व करते थे। इसी तरह, शिंदे समर्थक 13 सांसद, पार्टी के 18 निर्वाचित सांसदों को मिले कुल मतों में से 73 प्रतिशत मतों का प्रतिनिधित्व करते थे। मामले की अगली सुनवाई बृहस्पतिवार को होगी।
उद्धव ठाकरे गुट के सुनील प्रभु की मुख्य याचिका में महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के 10 जनवरी 2024 के फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट के विधायकों को दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराने से इनकार किया गया था।
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