Opposition के हमलों के बीच क्या हटेंगे CEC Gyanesh Kumar? जानिए क्या है प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर फिलहाल विपक्ष का हल्ला बोल जारी है। जब से इंडियन एक्सप्रेस में चुनाव आयोग को लेकर रिपोर्ट आई थी, उसके बाद से विपक्ष को सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ बड़ा मौका मिल गया है। विपक्ष लगातार सड़क पर प्रदर्शन कर रहा है। इतना ही नहीं, कॉकरोच जनता पार्टी ने भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 10 अक्टूबर को दिल्ली में जंतर मंतर पर धरने की धमकी दी है। साथ ही साथ लगातार पिछले दो दिनों से राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरा विपक्ष सड़क पर है और प्रदर्शन कर रहा है। विपक्ष साफ तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर बीजेपी की मदद करने का आरोप लगा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर के जरिए लोगों के नाम काटे जा रहे हैं और भाजपा को जीतने में मदद की जा रही है।
इसे भी पढ़ें: CEC Gyanesh Kumar के खिलाफ Delhi में बड़े आंदोलन का कॉजपा ने किया आह्वान
दिल्ली में जून जुलाई में जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के हुए प्रदर्शन के बाद केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ था। उसके बाद से विपक्ष सहित सरकार विरोधी खेमे को इस बात की उम्मीद हो गई है कि प्रदर्शनों के जरिए हम सरकार पर दबाव बनाकर इस्तीफा ले सकते हैं। शायद यही वजह है कि विपक्ष फिलहाल चुनाव आयोग पर ही जबरदस्त तरीके से हमलावर है। हालांकि, पहले भी विपक्ष चुनाव आयोग पर वोट चोरी के आरोप लगाता रहा है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद विपक्ष को बड़ा मौका मिल गया है और उसे फिलहाल भुनाने की कोशिश उसकी ओर से की जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मोदी सरकार दबाव में आएगी? क्या इन प्रदर्शनों का असर हमें देखने को मिलेगा और मुख्य चुनाव आयुक्त अपना इस्तीफा देंगे क्योंकि लगातार यही मांग की जा रही है। क्या सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटा सकती है? मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया क्या है?
CEC को हटाने के लिए असल में क्या करना पड़ता है?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को पद से उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को। यह कानूनी प्रक्रिया 'जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968' के तहत आती है और इसमें ये कड़े चरण शामिल हैं:
1. केवल वैध आधार
लोकप्रिय न होने वाले नीतिगत फैसलों या राजनीतिक मतभेदों के कारण CEC को पद से नहीं हटाया जा सकता।
संविधान इन आधारों को सख्ती से दो खास आरोपों तक सीमित करता है:
- साबित हुआ दुर्व्यवहार
- असमर्थता
2. संसद में शुरुआत
इस प्रक्रिया की शुरुआत संसद के सदस्यों (MP) की एक बड़ी संख्या के हस्ताक्षर वाले औपचारिक प्रस्ताव से होनी चाहिए:
लोकसभा: नोटिस पर कम से कम 100 MP के हस्ताक्षर ज़रूरी हैं।
राज्यसभा: नोटिस पर कम से कम 50 MP के हस्ताक्षर ज़रूरी हैं।
प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए; उनके पास इसे स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार होता है।
3. स्वतंत्र न्यायिक जांच
एक बार स्वीकार हो जाने पर, आरोपों पर तुरंत वोटिंग नहीं होती है। आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों वाली एक न्यायिक समिति बनाई जाती है।
3. स्वतंत्र न्यायिक जांच
एक बार आरोप स्वीकार कर लिए जाने के बाद, उन पर तुरंत मतदान नहीं किया जाता है। आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों वाली एक न्यायिक समिति बनाई जाती है।
इस समिति में ये सदस्य होते हैं:
सुप्रीम कोर्ट के एक जज
हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस
एक जाने-माने कानून विशेषज्ञ
यह कमिटी औपचारिक जांच करती है और एक रिपोर्ट सौंपती है जिसमें CEC को लगाए गए आरोपों के लिए दोषी या निर्दोष पाया जाता है। अगर कमिटी को गलत व्यवहार या अक्षमता का कोई सबूत नहीं मिलता है, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह से खत्म हो जाती है।
4. "स्पेशल मेजॉरिटी" (विशेष बहुमत) से वोटिंग की चुनौती
अगर कमिटी CEC को दोषी पाती है, तो इस प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों में वोटिंग होती है। इसे पास करने के लिए हर सदन में अलग-अलग 'स्पेशल मेजॉरिटी' की ज़रूरत होती है:
एब्सोल्यूट मेजॉरिटी (पूर्ण बहुमत): सदन के कुल सदस्यों में से 50% से ज़्यादा का समर्थन।
दो-तिहाई बहुमत: मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई का समर्थन।
5. राष्ट्रपति का आदेश
जब दोनों सदन एक ही सत्र में स्पेशल मेजॉरिटी के साथ प्रस्ताव पास कर देते हैं, तभी यह प्रस्ताव भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, जो फिर पद से हटाने का आधिकारिक आदेश जारी करते हैं।
इसे भी पढ़ें: 'सामान बांध लें, लंबी लड़ाई होगी': CEC के खिलाफ CJP का 10 अक्टूबर को Mega Protest का ऐलान
धारा 16 के तहत सुरक्षा
धारा 16 के तहत सुरक्षा का मतलब है 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023' की धारा 16 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) को दी गई कानूनी छूट। यह प्रावधान मौजूदा या पूर्व चुनाव आयुक्तों को नेक नीयत से किए गए किसी भी आधिकारिक काम के लिए सिविल या आपराधिक अदालती कार्यवाही से सुरक्षा देता है। कानून में साफ़ तौर पर कहा गया है कि किसी ऐसे व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई भी सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही शुरू या जारी नहीं की जाएगी, जो CEC या EC रहा हो या है, और जिसने अपने सरकारी काम के दौरान कोई काम किया हो, कोई बात कही हो या कोई शब्द बोला हो। यह सुरक्षा इसलिए अहम है क्योंकि यह पद छोड़ने के बाद भी कमिश्नरों को मिलती है। इसे चुनाव से जुड़े सरकारी कामों—जैसे वोटर लिस्ट तैयार करना, चुनाव क्षेत्र की सीमाएं तय करना या चुनाव का शेड्यूल बनाना—के लिए बनाया गया है, ताकि कमिश्नरों को फ़िज़ूल या राजनीतिक मक़सद से किए गए मुकदमों से बचाया जा सके।
विपक्षी MPs को बंदूक की नोक पर रोका गया, संजय राउत ने Election Commission पर साधा निशाना
(फाइल फोटो के साथ) मुंबई, सात अक्टूबर दिल्ली में विपक्षी दलों के नेताओं के सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करने के एक दिन बाद बुधवार को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने दावा किया कि सांसदों को ‘‘बंदूक की नोक पर’’ निर्वाचन आयोग के कार्यालय तक जाने से रोका गया जैसे ‘‘मानो वे आतंकवादी हों’’ और महिला सांसदों के साथ बुरा बर्ताव किया गया। राउत ने पत्रकारों से बातचीत में पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार पर शिवसेना का चुनाव चिह्न ‘‘चोरों’’ को सौंपने का आरोप भी लगाया और दावा किया कि उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के मामले में भी ऐसा ही किया था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में मंगलवार को दिल्ली में विपक्षी दलों के सांसदों ने ‘‘वोट चोरी’’ के आरोपों को लेकर मार्च का आयोजन किया और इस दौरान बेहद नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिले।
कई सांसदों को हिरासत में लिया गया और उन्हें निर्वाचन आयोग के कार्यालय तक पहुंचने से रोका गया। राउत ने कहा कि मंगलवार को विपक्षी दल के सांसदों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिलने से रोकने के लिए हजारों जवानों को तैनात किया गया था। उन्होंने कहा कि 275 निहत्थे विपक्षी सांसदों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों को तैनात किया गया था जैसे ‘‘मानो वे आतंकवादी हों।’’ राज्यसभा सदस्य ने आरोप लगाया, ‘‘उन्हें बंदूक की नोक पर रोका गया और हिरासत में लिया गया।
महिला सांसदों के साथ दुर्व्यवहार किया गया।’’ राउत ने सवाल किया कि अगर मुख्य निर्वाचन आयुक्त विपक्षी सांसदों से नहीं मिलते हैं तो क्या वह सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से ही मिलते हैं? शिवसेना (उबाठा) नेता ने कहा कि ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर आंदोलन नहीं रुकेगा। उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें (ज्ञानेश कुमार को) जाना ही होगा।’’ उन्होंने पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार पर भी निशाना साधा और आरोप लगाया कि पूर्व सीईसी ने शिवसेना और उसके चुनाव चिह्न को ‘‘चोरों के हाथों’’ में सौंप दिया।
उनका इशारा महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना की ओर था। राउत ने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने राकांपा के मामले में भी ऐसा ही किया। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली तत्कालीन शिवसेना जून 2022 में विभाजित हो गई थी।
निर्वाचन आयोग ने फरवरी 2023 में शिवसेना का नाम और ‘‘धनुष-बाण’’ चुनाव चिह्न एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को आवंटित कर दिया था। शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा में 2023 में फूट के बाद निर्वाचन आयोग ने 2024 में अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को वास्तविक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के रूप में मान्यता दी और उसे पार्टी का आधिकारिक नाम तथा ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न आवंटित किया। राउत ने कहा, ‘‘किसी की अपनी पार्टी को दूसरों को सौंपने की परंपरा राजीव कुमार ने शुरू की थी।
हमें पता है कि राजीव कुमार कहां हैं और यह भी पता है कि ज्ञानेश कुमार कहां जाएंगे।’’ शिवसेना (उबाठा) नेता ने आरोप लगाया कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) या मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए निर्वाचन आयोग पर ‘‘कब्जा’’ कर लिया गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में 25 साल पूरे होने के मौके पर विज्ञापनों पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने के लिए एकनाथ शिंदे और भाजपा नेताओं की भी आलोचना की। राउत ने कहा कि जो पैसा विज्ञापनों पर खर्च किया गया उसका इस्तेमाल सूखे से प्रभावित महाराष्ट्र के गरीब किसानों के लिए किया जा सकता था।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi










