Explainer: मणिपुर में 'तायकोंडो किक' से राजनीतिक कमबैक, बिरेन का 'राउंड' खत्म; खेमचंद सिंह आज लेंगे CM की शपथ
Manipur new CM: मणिपुर पूर्वोत्तर भारत का एक छोटा सा राज्य है. लेकिन इन दिनों ये बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है. लगभग एक साल तक चले प्रेसिडेंट रूल के बाद अब यहां युमनाम खेमचंद सिंह नए मुख्यमंत्री पद बनने जा रहे हैं. उम्मीद है कि अब राज्य में राजनीतिक स्थिरता आएगी. बता दें मणिपुर की जटिल सामाजिक-जातीय संरचना देश की बड़ी तस्वीर को प्रभावित करती है. आइए आपको मणिपुर की राजनीति को समझने की कोशिश करते हैं. इस खबर में आपको राज्य के इतिहास से लेकर वर्तमान नेताओं तक और मणिपुर क्यों देश के लिए अहम है इस बारे में डिटेल में बताने की कोशिश करते हैं.
मणिपुर की राजनीतिक जड़ें, इतिहास पर एक नजर
मणिपुर की कहानी सदियों पुरानी है. पहले यह एक शक्तिशाली राज्य था, जिसने अपने पड़ोसी क्षेत्रों से संघर्ष किया और अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान बनाई. फिर 19वीं सदी में ब्रिटिश साम्राज्य ने इसे अपने कंट्रोल में ले लिया. लेकिन 1947 में भारत की आजादी के बाद यह एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजरा. इसके बाद 1949 में महाराजा बोधचंद्र सिंह ने भारत के साथ विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके बाद मणिपुर को यूनियन टेरिटरी का दर्जा दिया गया. 1972 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला लेकिन इस प्रक्रिया में स्थानीय लोगों में असंतोष की जड़ें गहरी होती गई, दरअसल, कुछ लोग विलय के खिलाफ थे.
#WATCH | Manipur | Independent MLA from Keishamthong, Nishikant Singh Sapam says,"...A Manipuri Kuki lady, Nemcha Kipgen, has been made the Deputy CM...Let's hope Manipur will prosper." pic.twitter.com/1h0UNI6HLa
— ANI (@ANI) February 4, 2026
देश की राजनीति में मणिपुर क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
देश की राजनीति में मणिपुर काफी महत्वपूर्ण है. जानकारी के अनुसार राज्य की आबादी मुख्य रूप से 3 समुदायों में बंटी हुई है. पहली मीटेई जो यहां बहुसंख्यक करीब 53% हैं. दूसरे कुकी जो पहाड़ी इलाकों में रहते हैं) और तीसरे नागा जो राज्य के उत्तर और पूर्वी हिस्सों में बसे हुए हैं. यह विभाजन राजनीति को प्रभावित करता है. घाटी वाले इलाके आर्थिक रूप से मजबूत हैं जबकि पहाड़ी क्षेत्र के लोग अक्सर संसाधनों की कमी से जूझते आए हैं. बता दें 1930-40 के दशक में यहां महिलाओं की अगुवाई में 'नूपी लाल' आंदोलन जैसे विद्रोह हुए तो से विद्रोह चावल की कीमतों के खिलाफ शुरू हुए थे जिन्होंने बाद में राजनीतिक सुधारों की मांग का रंग ले लिया. आजादी के बाद कांग्रेस और फिर बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियां यहां मजबूत हुईं लेकिन स्थानीय मुद्दे जैसे स्वायत्तता की मांग और जातीय संघर्ष हमेशा राज्य की राजनीति में हावी रहे.
वायलेंस से प्रेसिडेंट रूल तक, हाल की उथल-पुथल की जानें पूरी कहानी
पिछले कुछ सालों में मणिपुर की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ है. 2022 में यहां बीजेपी ने चुनाव जीते और एन. बिरेन सिंह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने. लेकिन 2023 से मीटेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय हिंसा भड़क उठी जिसकी वजहें भूमि अधिकार ट्राइबल स्टेटस और ड्रग ट्रेड से जुड़ी रहीं. इस हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों विस्थापित हुए और राज्य में अस्थिरता फैल गई. 2025 में बिरेन सिंह ने इस्तीफा दे दिया जिसके बाद यहां फरवरी में प्रेसिडेंट रूल लगा दिया गया. यह दौर मणिपुर के लिए कठिन रहा इस बीच यहां सुरक्षा बलों ने बफर जोन बनाए रखे लेकिन समुदायों के बीच अविश्वास भी गहराता गया. अब एक साल बाद बीजेपी-नीत एनडीए सरकार बन रही है जो जातीय संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है.
कौन हैं युमनाम खेमचंद सिंह? जो बनने जा रहे नए सीएम
मणिपुर की राजनीति में नेता अक्सर जातीय प्रतिनिधित्व पर आधारित रहे हैं जो राज्य की एकता और विभाजन दोनों को दर्शाते हैं. अब युमनाम खेमचंद सिंह यहां के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. बता दें 62 साल के खेमचंद मीटेई समुदाय से हैं और सिंगजामेई से 2 बार विधायक चुने जा चुके हैं. वह 2017-2022 तक विधानसभा स्पीकर रहे फिर बिरेन सिंह सरकार में मंत्री भी बने. जानकारी के अनुसार वह तायक्वोंडो के टीचर हैं और हाल ही में कुकी राहत कैंपों का दौरे कर वह मीडिया की सुर्खियां में छा गए थे. बीजेपी में वह एक संतुलित चेहरा माने जाते हैं जिन्होंने बिरेन सिंह के खिलाफ असंतोष जाहिर किया था.
मणिपुर पर क्यों पड़ोसी राज्यों की नजर?
मणिपुर सिर्फ एक छोटा राज्य नहीं बल्कि भारत की पूर्वोत्तर नीति का केंद्र भी है. दरअसल, राज्य की सीमा म्यांमार से लगी हुई हैं, जिससे यहां से ड्रग तस्करी, हथियारों की स्मगलिंग और उग्रवादी गतिविधियां देश की सुरक्षा के लिए हमेशा चुनौती रही हैं. 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत मणिपुर एशियाई बाजारों से जुड़ने का गेटवे है लेकिन जातीय संघर्ष इसे बाधित करते हैं. ड्रग ट्रेड ने राजनीति को भी प्रभावित किया है जहां कुछ ग्रुप्स इससे जुड़े हैं. राष्ट्रीय स्तर पर मणिपुर की अस्थिरता पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों को प्रभावित कर सकती है और केंद्र सरकार के लिए यह एक टेस्ट केस है कि कैसे जातीय विविधता को संभाला जाए. अगर यहां शांति बनी,तो यह देश की एकता का प्रतीक बनेगा वरना यह अलगाववाद की आग को भड़का सकता है.
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बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के खिलाफ अमेरिका के 25 शहरों में हुए प्रदर्शन
वाशिंगटन, 4 फरवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा के खिलाफ अमेरिका में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में अमेरिका के 25 शहरों में शांतिपूर्ण जागरूकता रैलियां आयोजित की गईं।
कड़ाके की ठंड, बर्फबारी और जमी हुई सड़कों के बावजूद इन रैलियों में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। उन्होंने बांग्लादेश में धार्मिक रूप से लक्षित हिंसा के पीड़ितों के प्रति एकजुटता दिखाई। प्रदर्शनकारियों ने सिटी हॉल और सिविक सेंटर्स पर एकजुट होकर प्रदर्शन करते हुए अपने प्रयासों को गैर-राजनीतिक और मानवीय बताया।
प्रदर्शनकारियों ने मौन रखा और प्रार्थनाएं की। एक मीडिया विज्ञप्ति के अनुसार, उन्होंने कमजोर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए शांतिपूर्ण अपील भी जारी की।
मिडवेस्ट से लेकर पूर्वी और पश्चिमी तटों तक प्रदर्शनकारियों ने लिंचिंग, आगजनी, यौन हिंसा और लक्षित हत्याओं की रिपोर्ट की गई घटनाओं के खिलाफ प्रदर्शन किए और लोगों को इनके बारे में बताया। इस राष्ट्रव्यापी अभियान का समन्वय दैपायन देब, दीप्ति महाजन, गीता सिकंद और दिव्या जैन ने किया।
दैपायन देब ने कहा, ये रैलियां शांतिपूर्ण, गरिमापूर्ण और मानवीय उद्देश्य वाली थीं।
दीप्ति महाजन ने कहा कि ये आयोजन राजनीति से नहीं, बल्कि करुणा से प्रेरित थे। उन्होंने कहा, यह मानवीय गरिमा के लिए खड़े होने की बात थी, न कि राजनीति की। जब निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जाता है, तो करुणा डर या असुविधा से ऊपर होनी चाहिए।
गीता सिकंद ने कहा कि रैलियों ने समुदायों और धर्मों के बीच एकता को दर्शाया है। गीता सिकंद ने कहा, रैलियों में बांग्लादेशी हिंदू अमेरिकियों ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने बांग्लादेश में जारी हिंसा के बीच हिंदुओं के अस्तित्व के बारे में गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश सरकार की उदासीनता चिंताजनक है, क्योंकि उसने हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं।
दिव्या जैन ने इन अभियानों को शांत लेकिन प्रभावशाली संकल्प का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, आज हमने जो देखा वह शांत शक्ति थी। यह दर्शाती है कि जागरूकता की शुरुआत सामने आने से होती है।
कई शहरों में आयोजित प्रदर्शनों में स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों और नागरिक नेताओं ने भी हिस्सा लिया। आयोजकों के अनुसार, इससे शांतिपूर्ण नागरिक अभिव्यक्ति और समुदाय-नेतृत्व वाले प्रयासों की अहमियत उजागर हुई, जो वैश्विक मानवाधिकार मुद्दों को सामने लाने में सहायक हैं।
--आईएएनएस
डीसीएच/
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