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भारत में हर मौत का मेडिकल सर्टिफिकेट क्यों जरूरी? जानिए MCCD कैसे बचा सकता है लाखों जानें

भारत में साल 2024 में 20.66 लाख मौतों का मेडिकल सर्टिफिकेट ऑफ कॉज ऑफ डेथ (MCCD) जारी हुआ था. महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 3,27,174 मेडिकल प्रमाणित मौतें दर्ज हुई हैं. आइए जानते हैं कि भारत में हर मौत का मेडिकल सर्टिफिकेट इसलिए जरूरी क्यों है और इससे लाखों जानें कैसे बच सकती है.

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Asha Dashami Vrat 2026: आशा दशमी व्रत से होते हैं सभी मनोरथ पूरे

धर्मग्रंथों में प्राप्त आशा दशमी के माहात्म्य से यह सिद्ध होता है कि दुर्लभ से दुर्लभ मनोरथों की पूर्ति के लिए आशा दशमी व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए। यह व्रत विशेष रूप से स्त्रियों के लिए अत्यंत फलदायी, आरोग्यप्रद और श्रेयस्कर माना गया है।

जानें आशा दशमी व्रत के बारे में 

हिंदू धर्म में व्रत और त्यौहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये जीवन में सकारात्मकता, आशा और उमंग का संचार करते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत कल्याणकारी पर्व है 'आशा दशमी व्रत' (Asha Dashami Vrat)। मान्यता है कि इस व्रत को सच्चे मन से करने से व्यक्ति की अधूरी आशाएं पूरी होती हैं और जीवन में कभी निराशा का सामना नहीं करना पड़ता। सनातन परंपरा में आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है क्योंकि इसी पावन तिथि पर आशा दशमी व्रत रखा जाता है. अपने नाम के अनुरूप इस व्रत को आशाओं या फिर कामनाओं की पूर्ति की लिए विशेष रूप से रखा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन 10 आशा देवियों की विशेष रूप से साधना-आराधना और व्रत किया जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हुए माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना करती है।

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सनातन धर्म की विशाल आध्यात्मिक विरासत में 'आशा दशमी' का व्रत एक ऐसा प्रकाशपुंज है जो मनुष्य को घोर हताशा, अवसाद और संकट के अंधकार से बाहर निकालकर 'उम्मीद' की नई ऊर्जा से भर देता है। 'आशा' शब्द का अर्थ केवल इच्छा नहीं, बल्कि वह अटूट विश्वास है जो असंभव को संभव बनाने की शक्ति रखता है। 'दशमी' तिथि पूर्णता का प्रतीक है, जो यह सुनिश्चित करती है कि साधक को दसों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, आग्नेय, आकाश और पाताल) से शुभ फल प्राप्त हों। यह महापर्व मूलतः जगदंबा माता पार्वती और दसों दिशाओं की अधिष्ठात्री 'आशा देवियों' की आराधना का संगम है।

आशा दशमी व्रत का शुभ मुहूर्त 

पंचांग के अनुसार जिस आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि पर दसों दिशाओं की देवियों की पूजा पूजा और आशा दशमी व्रत रखा जाता है, वह 23 जुलाई 2026, बृहस्पतिवार को प्रात:काल 7:03 बजे प्रारंभ होकर अगले दिन 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को प्रात:काल 09:12 बजे समाप्त होगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार आशा दशमी का व्रत 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।

आशा दशमी व्रत 2026

आशा दशमी व्रत हिंदू धर्म में श्रद्धा, विश्वास और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। "आशा" का अर्थ है उम्मीद, विश्वास और सकारात्मक अपेक्षा। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

आशा दशमी व्रत का धार्मिक महत्व

आशा दशमी व्रत सकारात्मक सोच, धैर्य और ईश्वर में अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा और व्रत करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है।
इस दिन पूजा करने से मान्यता है कि—

- मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
- परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
- मानसिक तनाव कम होता है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

आशा दशमी व्रत कथा

धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में एक धर्मपरायण परिवार अनेक कठिनाइयों से गुजर रहा था। उन्होंने श्रद्धा और विश्वास के साथ आशा दशमी व्रत रखा और भगवान की आराधना की। उनकी निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके सभी संकट दूर किए तथा उन्हें सुख, समृद्धि और संतोष का आशीर्वाद दिया।

यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और सकारात्मक विश्वास से कठिन परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।

आशा दशमी व्रत पूजा विधि

यदि आप आशा दशमी का व्रत कर रहे हैं, तो यह पूजा विधि अपनाएं—

- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें।
- भगवान विष्णु या अपने इष्ट देव की प्रतिमा स्थापित करें।
- दीपक और धूप जलाएं।
- फल, फूल, तुलसी और नैवेद्य अर्पित करें।
- विष्णु सहस्रनाम या अपने इष्ट मंत्र का जाप करें।
- व्रत कथा का पाठ करें।
- आरती कर परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

आशा दशमी व्रत के नियम

- सात्विक भोजन करें या फलाहार रखें।
- क्रोध, झूठ और विवाद से बचें।
- मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का त्याग करें।
- जरूरतमंदों की सहायता करें।
- दिनभर भगवान का स्मरण करें।

आशा दशमी पर क्या करें?

- भगवान की विधि-विधान से पूजा करें।
- गरीबों को भोजन और वस्त्र दान करें।
- धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें।
- परिवार के साथ भजन-कीर्तन करें।
- सकारात्मक विचार रखें।

क्या नहीं करना चाहिए?

- किसी का अपमान न करें।
- क्रोध और नकारात्मकता से बचें।
- असत्य और छल-कपट से दूर रहें।
- नशे और तामसिक भोजन का सेवन न करें।

आशा दशमी व्रत के नियम 

हिंदू मान्यता के अनुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाले आशा दशमी व्रत को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष से प्रारंभ करके कम से कम 6 महीने या फिर 1 या 2 साल तक रखना चाहिए. यदि आप किसी कारणवश आषाढ़ मास में इस व्रत को न प्रारंभ कर पाएं तो आप इसे किसी भी मास के शुक्लपक्ष से प्रारंभ कर सकते हैं. व्रत के पूर्ण होने पर विधि-विधान से उद्यापन करें और सुहागिन स्त्रियों के साथ मिलकर रात्रि जागरण करें. व्रत के पूर्ण होने पर अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी मंदिर के पुजारी को अन्न, वस्त्र और धन आदि का दान करना चाहिए।

आशा दशमी से जुड़ी पौराणिक कथा 

1. सती दमयंती और राजा नल की गाथा: बिछोह से मिलन तक

प्राचीन काल में निषध देश के धर्मात्मा राजा नल अपने भाई से द्यूत (जुए) में सर्वस्व हार गए। विपत्ति के समय वे अपनी पत्नी दमयंती के साथ निर्जन वनों में भटकने लगे। एक समय ऐसा आया जब राजा नल के पास स्वयं को ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र भी नहीं रहे। घोर मानसिक पीड़ा और लज्जा के वश में, राजा नल अपनी सोती हुई पत्नी दमयंती को अकेले वन में छोड़कर चले गए।

जब दमयंती की आँख खुली, तो अपने प्रियतम को न पाकर वह विलाप करने लगी। भटकते हुए वह चेदि देश की राजमाता की शरण में पहुँची। वहाँ एक तपस्वी ब्राह्मण ने उसे 'आशा दशमी' व्रत की महिमा बताई। दमयंती ने पूर्ण निष्ठा और अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह व्रत किया। इस व्रत के दिव्य प्रभाव से राजा नल के हृदय में अपनी पत्नी के प्रति विरह और कर्तव्य बोध जागा। अंततः दोनों का पुनर्मिलन हुआ और खोया हुआ राज्य व वैभव पुनः प्राप्त हुआ। यह कथा सिखाती है कि यह व्रत टूटे हुए रिश्तों और खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस लाने में सक्षम है।

आशा दशमी व्रत के लाभ 

हिंदू मान्यता के अनुसार जिस आशा दशमी का व्रत महाभारत काल से होता चला आ रहा है, उसे करने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं और उसे सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मान्यता यह भी है कि जिस स्त्री का पति रूठ कर चला गया हो या फिर विदेश में फंसा हो तो वह इस व्रत के पुण्य प्रभाव से शीघ्र ही उसके पास वापस लौट आता है। आशा देवी के आशीर्वाद से उसे सुखी दांपत्य जीवन का सुख प्राप्त होता है।

- प्रज्ञा पांडेय

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