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कौन हैं युमनाम खेमचंद सिंह? खेल के मैदान से राजनीति के शिखर तक…जानिए मणिपुर के नए सीएम की प्रोफाइल

हिंसाग्रस्त मणिपुर में करीब एक साल से राष्ट्रपति शासन लागू था, लेकिन अब नई सरकार जल्द बनने वाली है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक युमनाम खेमचंद सिंह को पार्टी की विधायक दल की नेता चुना गया है. इसका साफ मतलब यह है कि वो मणिपुर के अगले मुख्यमंत्री बनने वाले हैं. मंगलवार (3 फरवरी) को दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में आयोजित बैठक में उन्हें पार्टी नेता के रूप में चुना गया. इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ सदस्य तरुण चुघ, मणिपुर के भाजपा अध्यक्ष और नॉर्थ ईस्ट के इन-चार्ज संबित पात्रा ने उन्हें विधायक दल का नेता चुनकर बधाई दी और मिठाई खिलाई. इस मौके पर पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह भी मौजूद थे.

आपको बता दें कि मणिपुर में वर्तमान राष्ट्रपति शासन 12 फरवरी को समाप्त होगा और उसके बाद युमनाम खेमचंद सिंह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं. खेमचंद सिंह मैतेई समुदाय से हैं और भाजपा के बीच एक विवाद-रहित, शांत नेतृत्व के रूप में जाने जाते हैं. मणिपुर की राजनीति में उनका नाम एन. बीरेन सिंह का प्रमुख प्रतिद्वंदी भी रहा है, खासकर तब जब बीरेन सिंह मुख्यमंत्री थे और राज्य में समुदायों के बीच हिंसा फैल गई थी. उस समय भाजपा के सहयोगी नेता भी बीरेन सिंह के खिलाफ हो गए थे, जिससे उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और राष्ट्रपति शासन लागू हुआ. तो आइए यहां जानते हैं मणिपुर के होने वाले मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह से जुड़ी सारी बातें.

युमनाम खेमचंद सिंह कौन हैं?

युमनाम खेमचंद सिंह मणिपुर के एक अनुभवी और सम्मानित राजनेता हैं. वे वर्तमान में इंफाल पश्चिम की सिंगजामेई विधानसभा सीट से विधायक हैं और दो बार लगातार इसी सीट से जीते हैं. 2017 से 2022 तक वे मणिपुर विधानसभा के स्पीकर (प्रमुख) रहे. इसके बाद 2022 में जब भाजपा-नेता एन. बीरेन सिंह की सरकार बनी, तब खेमचंद सिंह मंत्री भी बने. उन्होंने नगर प्रशासन और आवास विकास, ग्रामीण विकास और पंचायती राज तथा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व किया. उनकी उम्र लगभग 62 साल है और वे मणिपुर में लंबे समय से राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हैं. उनके शांत स्वभाव, अनुशासन और संगठनात्मक क्षमता को पार्टी में खूब सराहा जाता है. यही वजह है कि पार्टी ने राजनीतिक संक्रमण और सामाजिक तनाव के बीच उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुना.

खेल से राजनीति तक की यात्रा

राजनीति में आने से पहले युमनाम खेमचंद सिंह खेल जगत में नाम कमाने वाले खिलाड़ी थे. वे ताइक्वांडो (एक मार्शल आर्ट्स), में सक्रिय रहे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया. उन्होंने दक्षिण कोरिया से ताइक्वांडो की ट्रेनिंग ली और भारतीय ताइक्वांडो टीम के कप्तान भी रहे. अपने खेल-जीवन में उन्हें ब्लैक बेल्ट जैसी उच्च उपाधियां भी मिलीं.

खेमचंद सिंह ताइक्वांडो खिलाड़ी के रूप में ही नहीं बल्कि खेल प्रशासक के रूप में भी जाने जाते हैं. उन्होंने ताइक्वांडो फेडरेशन ऑफ इंडिया में उपाध्यक्ष पद संभाला और पूर्वोत्तर भारत में इस खेल के विकास में योगदान दिया. 2012 में उन्होंने राजनीति में पहला कदम रखा. उस साल उन्होंने सिंगजामेई सीट से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन कम वोटों से हार गए. इसके बाद उन्होंने भाजपा का दामन थामा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के करीब भी आए.

क्यों चुना गया मुख्यमंत्री पद के लिए?

युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री पद के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि वे पार्टी के सभी गुटों के लिए स्वीकार्य, शांत और विवाद-रहित नेता माने जाते हैं. उनकी नेतृत्व शैली में जनता को जोड़ने के बजाय संगठन और अनुशासन पर जोर है, जो आज के राजनीतिक माहौल में बहुत अहम माना जा रहा है. हिंसा से प्रभावित मणिपुर में अब उम्मीद जताई जा रही है कि उनका नेतृत्व स्थिरता और विश्वास बहाली में मदद करेगा.

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बदल गई मणिपुर की सियासत, बीरेन सिंह की विदाई, खुद अपनी पसंद बताकर खेमचंद को सौंपी सीएम की कुर्सी

मणिपुर में करीब एक साल से चला आ रहा सस्पेंस अब खत्म हो गया है. दिल्ली में हुई बड़ी बैठकों के बाद बीजेपी ने राज्य में फिर से अपनी सरकार बनाने का रास्ता साफ कर दिया है. पूर्व मंत्री युमनाम खेमचंद सिंह सिंह को राज्य की कमान सौंपी जा रही है. दिलचस्प बात यह है कि उनके नाम का एलान खुद पूर्व सीएम एन बीरेन सिंह ने किया, जिनके खेमचंद धुर विरोधी माने जाते रहे हैं. खास बात यह है कि खुद पूर्व सीएम एन बीरेन सिंह ने दिल्ली में हुई मीटिंग के बाद खेमचंद के नाम का एलान किया.

पूर्व सीएम बीरेन सिंह की कुर्सी कैसे गई?

मणिपुर में मई 2023 में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा भड़की थी. इसके बाद से ही हालात काफी खराब हो गए थे. घाटी में मैतेई और पहाड़ों में कुकी लोग बंट गए. धीरे-धीरे खुद बीजेपी के अंदर भी बीरेन सिंह के खिलाफ आवाजें उठने लगीं. 19 बीजेपी विधायकों ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर साफ कह दिया था कि बीरेन सिंह के रहते शांति बहाल होना मुश्किल है.

दबाव तब और बढ़ गया जब सहयोगी पार्टी NPP ने समर्थन वापस ले लिया. आखिरकार, फरवरी 2025 में जब विपक्षी दल कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में था, तो बीरेन सिंह ने इस्तीफा दे दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

विधायकों ने क्यों की 'अपनी सरकार' की मांग?

राष्ट्रपति शासन लगने के कुछ महीनों बाद ही विधायकों ने मांग शुरू कर दी कि राज्य में फिर से सरकार बनाई जाए. उनका कहना था कि पुलिस और सुरक्षा बल व्यवस्था तो संभाल सकते हैं, लेकिन लोगों का भरोसा जीतने के लिए नेताओं का जमीन पर होना जरूरी है.

विधायकों को यह डर भी था कि अगर वे चुप बैठे रहे, तो अगले चुनाव में जनता को क्या जवाब देंगे. इसी दबाव के चलते 21 विधायकों ने फिर से केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी और सरकार बनाने का दावा पेश किया.

केंद्र सरकार की हिचकिचाहट और फिर आया फैसला

शुरुआत में केंद्रीय सरकार उलझन में थी. उन्हें लग रहा था कि अभी हालात पूरी तरह काबू में नहीं हैं और नई सरकार आने से शांति की कोशिशें बिगड़ सकती हैं. लेकिन पिछले कुछ महीनों में हालात थोड़े सुधरे, पीएम मोदी ने भी मणिपुर का दौरा किया और बातचीत का रास्ता खुला.

दूसरा बड़ा कारण यह भी था कि नियम के मुताबिक राष्ट्रपति शासन को एक साल से ज्यादा खींचने के लिए कई कानूनी अड़चनें आती हैं. इसलिए, अब केंद्र ने तय किया कि राज्य की कमान फिर से स्थानीय नेताओं को सौंप दी जाए.

खेमचंद सिंह के सामने क्या हैं चुनौतियां?

नए मुख्यमंत्री के रूप में खेमचंद सिंह के पास कांटों भरा ताज होगा. उनके सामने आपस में लड़ रहे समुदायों के बीच फिर से भरोसा पैदा करना होगा. राहत शिविरों (Relief Camps) में रह रहे लोगों को उनके घर वापस भेजना. बंद पड़े रास्तों को खुलवाना ताकि सामान की आवाजाही सामान्य हो सके. अगले एक साल में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करना.

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