Explainer: भारत में प्रदर्शन करने के क्या हैं नियम? लुटियंस दिल्ली और बाकी राज्यों में ऐसे बदल जाते हैं रूल, क्या कहता है संविधान
Protest Rule: सड़क से संसद तक विरोध की आवाज लोकतंत्र का अहम हिस्सा है. भारत में सरकार के फैसलों के खिलाफ विपक्ष और दूसरे संगठन लगातार प्रदर्शन करते रहे हैं. लेकिन क्या प्रदर्शन करने का अधिकार पूरी तरह बेलगाम है? क्या कोई भी संगठन कहीं भी, कितने भी लोगों के साथ और कितनी भी देर तक प्रदर्शन कर सकता है?
संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार देता है, लेकिन इसके साथ कुछ जरूरी शर्तें और कानूनी सीमाएं भी जुड़ी हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि भारत में प्रदर्शन करने के क्या नियम हैं, पुलिस की क्या भूमिका होती है और किन परिस्थितियों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.
भारत में विरोध प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार
भारत में नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत मिला है. हालांकि, यह अधिकार पूरी तरह निरंकुश नहीं है. सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार इस पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है.
यह भी पढ़ें: क्या AI आपकी नौकरी छीन लेगा या बनेगा करियर में सबसे बड़ा सहारा, जानें कैसे बदल रही है वर्कप्लेस की तस्वीर
प्रदर्शन शांतिपूर्ण होना जरूरी
किसी भी विरोध प्रदर्शन में हिंसा या हथियारों की अनुमति नहीं है. संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है. प्रदर्शन के दौरान हिंसा या किसी तरह की आपराधिक गतिविधि होने पर प्रशासन कानूनी कार्रवाई कर सकता है.
पुलिस-प्रशासन की अनुमति जरूरी
रैली, जुलूस या बड़े सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थानीय प्रशासन या पुलिस से अनुमति लेने की जरूरत पड़ सकती है. अनुमति की शर्तें जगह, भीड़, यातायात और कानून-व्यवस्था जैसी परिस्थितियों के आधार पर तय की जाती हैं. आयोजकों को स्थानीय प्रशासन के नियमों का पालन करना होता है.
नई दिल्ली और बाकी हिस्सों के नियमों में अंतर
भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है, लेकिन लुटियंस दिल्ली यानी नई दिल्ली जिले में प्रदर्शन के नियम देश के दूसरे हिस्सों की तुलना में काफी सख्त हैं. इसकी वजह यहां संसद, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, केंद्रीय सचिवालय और कई अन्य महत्वपूर्ण सरकारी व राजनयिक प्रतिष्ठानों की मौजूदगी है. लुटियंस दिल्ली में प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर का निर्धारित क्षेत्र प्रमुख स्थान है, जबकि वीवीआईपी इलाकों, प्रमुख सड़कों और संवेदनशील रूट पर प्रदर्शन या मार्च की अनुमति आमतौर पर नहीं दी जाती. जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शनकारियों की संख्या और अन्य गतिविधियों को लेकर प्रशासन की तय शर्तें लागू होती हैं.
दिल्ली में कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए BNSS की धारा 163 के तहत भीड़ जुटाने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. हालांकि, देश के बाकी हिस्सों में भी प्रदर्शन के लिए स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेना जरूरी होता है और कई शहरों में इसके लिए अलग-अलग मैदान या निर्धारित स्थान तय किए गए हैं. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार देते हैं, लेकिन ये अधिकार पूरी तरह निरंकुश नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट भी साफ कर चुका है कि सार्वजनिक रास्तों को अनिश्चितकाल तक बंद करके प्रदर्शन नहीं किया जा सकता. यानी विरोध करने का अधिकार संविधान देता है, लेकिन जगह, समय, भीड़, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों का पालन करना भी जरूरी है.
सड़क या सार्वजनिक रास्ता नहीं रोका जा सकता
प्रदर्शन के नाम पर सड़कों, हाईवे या अन्य सार्वजनिक रास्तों को लंबे समय तक बंद रखने का अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रदर्शन के अधिकार के साथ आम लोगों के आवागमन के अधिकार का भी ध्यान रखना जरूरी है. प्रदर्शन ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे लंबे समय तक आम जनता को परेशानी हो.
यह भी पढ़ें: साइबेरिया में लैब टेक्नीशियन की मौत से प्लेग का डर: कितना खतरनाक है न्यूमोनिक प्लेग और क्या भारत को चिंता करनी चाहिए?
प्रशासन लगा सकता है प्रतिबंध
अगर किसी इलाके में कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो तो प्रशासन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू कर सकता है. ऐसी स्थिति में एक जगह पर लोगों के जमा होने या सभा करने पर रोक लगाई जा सकती है. प्रतिबंध लागू होने के दौरान उसके उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.
सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना अपराध
विरोध प्रदर्शन के दौरान सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं है. तोड़फोड़, आगजनी या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी गतिविधियों पर संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है. नुकसान होने की स्थिति में जिम्मेदार लोगों से हर्जाना वसूलने की कार्रवाई भी हो सकती है.
अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र में अपनी मांग और असहमति जाहिर करने का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन इसके साथ कानून और सार्वजनिक व्यवस्था का पालन करना भी जरूरी है. यानी नागरिकों को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन शांतिपूर्ण हो और उससे दूसरे लोगों के अधिकार प्रभावित न हों, यह भी सुनिश्चित करना होता है.
हाल में हुए बड़े आंदोलन
भारत में हाल के वर्षों में कई बड़े और व्यापक आंदोलन हुए हैं, जिन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर देश को हिलाकर रख दिया. इन आंदोलनों के पीछे मुख्य रूप से सरकारी नीतियां, युवाओं की परीक्षाएं और सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दे रहे हैं.
नीट पेपर लीक और CEC के खिलाफ
NEET पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ आंदोलन: 2026 में NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर देशभर में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया. छात्रों ने परीक्षा की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए दोबारा परीक्षा कराने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की. दिल्ली के जंतर-मंतर समेत कई जगहों पर छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए. आंदोलन ने परीक्षा व्यवस्था और छात्रों के भविष्य को लेकर देशभर में बड़ी बहस छेड़ दी.
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध प्रदर्शन: 2026 में मतदाता सूचियों के संशोधन और चुनावी प्रक्रिया को लेकर भी बड़े विरोध प्रदर्शन देखने को मिले. विपक्षी दलों और कई संगठनों ने चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में गड़बड़ियों के आरोप लगाए. दिल्ली और मुंबई समेत कई शहरों में प्रदर्शन हुए. आंदोलनकारियों ने चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की.
किसान आंदोलन
2020-21 का किसान आंदोलन: केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध में 2020 में किसानों ने बड़ा आंदोलन शुरू किया. पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किसान दिल्ली की सीमाओं पर पहुंच गए. किसानों को आशंका थी कि नए कानूनों से MSP की व्यवस्था कमजोर होगी और मंडियों पर निजी कंपनियों का दबदबा बढ़ जाएगा. दिल्ली की सीमाओं पर यह आंदोलन करीब एक साल तक चला. आखिरकार सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने का फैसला किया.
2024-25 का किसान आंदोलन: 2024 में किसानों ने एक बार फिर दिल्ली कूच का ऐलान किया. इस बार उनकी प्रमुख मांगों में फसलों के लिए MSP की कानूनी गारंटी, किसानों की कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना शामिल था. किसानों ने पंजाब-हरियाणा सीमा के शंभू बॉर्डर समेत कई जगहों पर प्रदर्शन किया. सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद कई मांगों पर सहमति नहीं बन सकी और आंदोलन लंबे समय तक जारी रहा.
यह भी पढ़ें: Explainer: सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी तो Form-6 में कैसे हुआ बदलाव? SC और चुनाव आयोग में किस बात पर विवाद?
गुजरात: 'राष्ट्रीय एकता दिवस' परेड में शामिल कर्मियों में डेंगू के मामले सामने आने पर नए उपाय लागू
गांधीनगर, 6 अक्टूबर (आईएएनएस)। गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया ने मंगलवार को अधिकारियों को निर्देश दिया कि राष्ट्रीय एकता दिवस परेड के लिए गांधीनगर पहुंचे कर्मियों के अस्थायी आवासों में डेंगू के मामले सामने आने के बाद फॉगिंग, बुखार की निगरानी और लार्वा-रोधी उपायों को तेज किया जाए।
मंत्री ने वेक्टर जनित रोगों पर एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान ये निर्देश जारी किए।
राष्ट्रीय एकता दिवस परेड के लिए 21 सितंबर से ही विभिन्न राज्यों से बीएसएफ, सीआरपीएफ और आईटीबीपी के जवान गांधीनगर पहुंच रहे हैं।
उनके लिए गांधीनगर के सेक्टर 28 और 29 में सरकारी आवासों में अस्थायी आवास की व्यवस्था की गई है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, नवनिर्मित सरकारी आवास में पानी जमा होने से मच्छरों की गतिविधि बढ़ गई, जिसके बाद कर्मियों में डेंगू के मामले सामने आए।
प्रभावित लोगों का गांधीनगर सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा है। यह घटनाक्रम हाल के दिनों में कई कर्मियों को नागरिक अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद सामने आया है।
2 अक्टूबर को अस्पताल ने बताया कि दो दिनों में 24 कर्मियों में डेंगू की पुष्टि हुई है, जबकि कई अन्य बुखार और बदन दर्द के साथ निगरानी में हैं।
अस्पताल ने बताया कि मरीजों की हालत स्थिर है और सार्वजनिक स्वास्थ्य दल द्वारा महामारी विज्ञान संबंधी आकलन किया जाएगा।
पांशरिया ने अधिकारियों को प्रभावित क्षेत्रों में युद्धस्तर पर गहन फॉगिंग, दवाइयों का छिड़काव और मरीजों की निगरानी करने का निर्देश दिया।
कर्मियों के आवास और परेड ग्राउंड में बुखार की निगरानी, लार्वा-रोधी अभियान और दैनिक फॉगिंग के आदेश भी दिए गए हैं।
उन्होंने विशेष रूप से विभाग को निर्देश दिया कि सरकारी आवास के प्रत्येक ब्लॉक में चार स्वास्थ्यकर्मी तैनात किए जाएं, जहां कर्मी ठहरे हुए हैं।
अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया कि परिसर के अंदर या आसपास कहीं भी पानी जमा न हो और जहां भी पानी जमा पाया जाए, उसे तुरंत हटाने की व्यवस्था की जाए।
मंत्री ने कहा कि पिछले दो महीनों में गुजरात में चंडीपुरा वायरस का कोई नया मामला सामने नहीं आया है।
उन्होंने कहा कि राज्य में पहला मामला सामने आने के बाद से ही स्वास्थ्य विभाग की टीमें वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लगातार काम कर रही हैं।
पानसेरिया ने यह भी कहा कि पिछले वर्ष की तुलना में 2026 में गुजरात में मलेरिया के मामलों में 39.6 प्रतिशत और डेंगू के मामलों में 20.6 प्रतिशत की कमी आई है। उन्होंने इस कमी का श्रेय स्वास्थ्य विभाग की निरंतर गतिविधियों और जागरूकता अभियानों को दिया।
उन्होंने कहा कि 2026 के 40वें सप्ताह तक, राज्य भर में 1.39 करोड़ से अधिक रक्त के नमूनों की जांच की गई, जिनमें 1,401 मलेरिया के मामले सामने आए।
डेंगू के निदान के लिए मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध 42 अस्पतालों में विशेष निदान केंद्र कार्यरत हैं।
--आईएएनएस
एमएस/
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation










