GST अधिकारियों की गिरफ्तारी शक्ति खत्म करने की तैयारी, अपराध साबित होने पर ही होगी कार्रवाई
नयी दिल्ली, छह अक्टूबर माल एवं सेवा कर परिषद के समक्ष जीएसटी अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्तियां खत्म करने का प्रस्ताव ‘करदाता पर भरोसे’ के सिद्धांत पर आधारित है। राज्यों को भी इस शक्ति को समाप्त करने का औचित्य नजर आएगा क्योंकि उत्पाद शुल्क को छोड़कर किसी अन्य कर कानून में यह शक्ति कभी नहीं थी। आधिकारिक सूत्रों ने मंगलवार को यह जानकारी दी।
उन्होंने कहा, “एक-दो राज्य जीएसटी अधिकारियों से गिरफ्तारी की शक्ति वापस लिए जाने के प्रस्ताव को लेकर संवेदनशील हो सकते हैं। प्रस्ताव जीएसटी कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधान को पूरी तरह खत्म नहीं करता। प्रस्ताव में कहा गया है कि अपराध साबित होने के बाद ही संबंधित अधिकारी किसी आरोपी को गिरफ्तार कर सकता है।’’ केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में राज्यों के वित्त मंत्रियों वाली जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक आठ अक्टूबर को होगी।
बैठक में जीएसटी अनुपालन व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलावों पर विचार किया जाएगा। इसमें जीएसटी अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्तियां खत्म करना भी शामिल है। अपराध को गैर-दंडनीय बनाने की प्रक्रिया के तहत अभियोजन चलाने की सीमा को एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव है।
जीएसटी कानून में ये बदलाव 2027 की शुरुआत में लागू किए जाने की संभावना है। जीएसटी अधिकारी को गिरफ्तारी की शक्ति उत्पाद शुल्क कानून से मिली थी। इसे 2017 में जीएसटी लागू होने के समय इसमें समाहित कर दिया गया था।
मूल्य वर्धित कर (वैट), सेवा कर या अन्य कर कानूनों के तहत कर अधिकारियों के पास गिरफ्तारी की शक्ति नहीं थी। जब जीएसटी लागू किया गया था, तब फर्जी बिल जारी करने के मामलों में गिरफ्तारी की शक्ति कुछ उपलब्ध उपायों में से एक थी। इसका कारण ऐसे मामलों का पता लगाने के साधन सीमित थे और बिलों का मिलान नहीं हो पाता था।
उस समय गड़बड़ियों का पता लगाने की व्यवस्था उतनी दक्ष नहीं थी। ऐसे में रोकथाम के लिए कड़ी कार्रवाई के प्रावधान से करनी पड़ती थी। एक अन्य सूत्र ने कहा, “इसीलिए जीएसटी अधिकारियों को गिरफ्तारी की शक्ति कानून में दी गई थी।
हालांकि, आज बेहतर तकनीकी व्यवस्था से बिलों का मिलान संभव है। गिरफ्तारी से जो सुरक्षा देने का उद्देश्य था, वह अब प्रणाली के जरिये मिल रहा है।” सूत्रों ने कहा कि कर अधिकारी का मुख्य काम कर संग्रह करना होना चाहिए, जबकि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का जिम्मा कानून प्रवर्तन एजेंसियों को दिया जाना चाहिए। जीएसटी परिषद के समक्ष रखे गए प्रस्ताव में अभियोजन शुरू होने से पहले की गिरफ्तारी को खत्म करने की बात कही गई है।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर कोई कर बकाया है, तो उसे वसूलने का प्रयास होना चाहिए। अगर अपराध हुआ है और अभियोजन शुरू किया गया है, तो अदालत के आदेश के आधार पर गिरफ्तारी की जा सकती है।’’ इन बदलावों से ईमानदार कारोबारियों को जीएसटी अधिकारी द्वारा गिरफ्तारी की आशंका के बिना अपना काम जारी रखने में मदद मिलेगी। सूत्र ने कहा, “प्रस्ताव कर विभाग के ‘करदाता पर भरोसे’ के सिद्धांत को बताता है।
एक-दो राज्य गिरफ्तारी की शक्ति बरकरार रखना चाहते हैं, लेकिन हमें उम्मीद है कि वे इस प्रस्ताव पर सहमत होंगे।
भारतीय Insurance Brokers संघ ने नए Commission नियमों पर PM और Finance Minister से लगाई गुहार
बीमा क्षेत्र में प्रस्तावित नए कमीशन नियमों को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। देश के बीमा ब्रोकरों के संगठन ने अब सीधे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के सामने अपनी आपत्ति रखी है। संगठन का कहना है कि बीमा नियामक के प्रस्तावित बदलावों से रोजगार पर असर पड़ सकता है, गलत तरीके अपनाने का खतरा बढ़ सकता है और विदेशी निवेशकों के बीच भी चिंता पैदा हो सकती है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, भारतीय बीमा ब्रोकर संघ ने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को भेजे पत्रों में भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के प्रस्तावों पर चिंता जताई है। नियामक ने सितंबर के अंत में जारी चर्चा पत्र में बीमा बेचने पर मिलने वाले कमीशन के तरीके में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है। इसमें बैंकों, बीमा ब्रोकरों और एजेंटों को दिए जाने वाले कमीशन पर सीमा लगाने की बात शामिल है।
बता दें कि नियामक का प्रस्ताव बीमा उत्पाद की जटिलता और उसे बेचने में लगने वाली मेहनत के आधार पर कमीशन तय करने पर केंद्रित है। अनिवार्य बीमा जैसे तीसरे पक्ष के वाहन बीमा पर बहुत कम या कोई कमीशन नहीं देने का सुझाव है। नियामक का कहना है कि इस बदलाव का मकसद बीमा की लागत को कम करना और इसका फायदा सीधे ग्राहकों तक पहुंचाना है।
लेकिन बीमा ब्रोकर संघ इस सोच से सहमत नहीं है। संगठन का तर्क है कि अगर कमीशन पर सख्त सीमा लगा दी गई तो इसका पैसा ग्राहकों तक पहुंचने के बजाय बीमा कंपनियों के मालिकों के पास जा सकता है। संघ का कहना है कि प्रस्ताव में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो बीमा कंपनियों को कमीशन से होने वाली बचत का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए बाध्य करे।
रोजगार को लेकर भी संगठन ने गंभीर चिंता जताई है। भारतीय बीमा ब्रोकर संघ का अनुमान है कि प्रस्तावित नियमों के कारण अगले 5 वर्षों में कम से कम 1 मिलियन नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। खास बात यह है कि इस अनुमान में बीमा कंपनियों के सीधे वेतन पाने वाले कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया है। यानी असर ब्रोकरों, एजेंटों और वितरण व्यवस्था से जुड़े दूसरे लोगों पर ज्यादा पड़ने की आशंका जताई गई है।
गौरतलब है कि संगठन को एक और खतरा कमीशन की सीमा से बचने के लिए नए रास्ते अपनाए जाने का है। उसका कहना है कि अगर कंपनियों पर बहुत सख्त सीमा लगाई गई तो कुछ बीमा कंपनियां अतिरिक्त कमीशन को दूसरे खर्चों के नाम पर दिखा सकती हैं। उदाहरण के तौर पर अधिक भुगतान को प्रचार शुल्क के रूप में दिखाकर नियमों से बचने की कोशिश हो सकती है। इससे पारदर्शिता बढ़ने के बजाय व्यवस्था में गलत तरीकों को बढ़ावा मिलने का खतरा पैदा हो सकता है।
विदेशी निवेश को लेकर भी संघ ने समय को महत्वपूर्ण बताया है। बीमा क्षेत्र में हाल ही में 100% विदेशी निवेश की अनुमति दिए जाने के कुछ ही महीनों बाद वितरण व्यवस्था में इतना बड़ा बदलाव विदेशी कंपनियों को नियामकीय अनिश्चितता का संकेत दे सकता है। संघ का मानना है कि इससे भारत में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों के फैसलों पर असर पड़ सकता है।
भारतीय बीमा ब्रोकर संघ ने मांग की है कि कमीशन पर कोई सख्त सीमा लगाने से पहले इसके प्रभाव का सार्वजनिक अध्ययन कराया जाए। इसमें ग्राहकों, रोजगार, सरकारी बीमा कंपनियों और विदेशी निवेश पर पड़ने वाले असर को शामिल करने की मांग की गई है।
संगठन ने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से मुलाकात का समय भी मांगा है। साथ ही उसने मौजूदा कमीशन व्यवस्था को 2028 में होने वाली निर्धारित समीक्षा तक जारी रखने की मांग की है। नियामक ने चर्चा पत्र पर सभी संबंधित पक्षों से 25 अक्टूबर तक सुझाव मांगे हैं। अब आगे की प्रक्रिया में बीमा कंपनियों, ब्रोकरों, एजेंटों और अन्य पक्षों की राय के आधार पर यह तय होगा कि प्रस्तावित बदलाव किस रूप में लागू किए जाते हैं।
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