ईरान और अमेरिका के बीच तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के लिए सहमति की खबरों के बीच, ईरानी अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए तेहरान अपना परमाणु कार्यक्रम निलंबित या बंद कर सकता है। यह वाशिंगटन के साथ किसी भी समझौते में यूरेनियम संवर्धन को रोकने से इनकार करने के ईरान के निरंतर रुख के बिल्कुल विपरीत है। अधिकारियों ने न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवाईटी) को बताया कि ट्रंप द्वारा हमले की धमकियों के मद्देनजर अमेरिका के साथ तनाव कम करने के लिए तेहरान अपने मौजूदा रुख से पीछे हटने को तैयार है। हालांकि, उन्होंने कहा कि पिछले साल अमेरिका द्वारा इजरायल के साथ 12 दिनों के युद्ध और वाशिंगटन द्वारा उसके परमाणु संयंत्रों पर हमले से पहले पेश किया गया वैकल्पिक प्रस्ताव कहीं अधिक व्यवहार्य विकल्प होगा। इस प्रस्ताव के अनुसार, परमाणु ऊर्जा का उपयोग करके बिजली उत्पादन के लिए एक संघ बनाया जाएगा, जिसमें यूरेनियम संवर्धन ईरान के बाहर किया जाएगा।
बीते कुछ हफ्तों से वह ईरानी जनता को चेतावनी दे रहे थे कि देश में हालात उनके नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। यह बयान इस बात का भी संकेत देता है कि उन्हें अमेरिका के साथ बातचीत के लिए ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खोमेनेई का समर्थन मिला है, जिन्होंने पहले ऐसे किसी भी संवाद को खारिज कर दिया था। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान और अमेरिका किसी समझौते तक पहुंच पाएंगे या नहीं, खासकर इसलिए क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत की किसी भी प्रक्रिया में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी प्रमुख मांगों में शामिल कर रखा है।
ट्रंप ने जून में इजराइल द्वारा शुरू किए गए 12 दिवसीय युद्ध के दौरान ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर बमबारी के आदेश दिए थे। पेजेशकियान ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर अंग्रेजी और फ़ारसी में लिखा कि यह फैसला ‘‘क्षेत्र के मित्र देशों की ओर से अमेरिका के राष्ट्रपति के बातचीत के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देने के अनुरोध’’ पर लिया गया है। उन्होंने कहा कि मैंने अपने विदेश मंत्री को निर्देश दिया है कि यदि उपयुक्त माहौल हो यानी धमकियों और अनुचित अपेक्षाओं से मुक्त वातावरण, तो वह गरिमा, विवेक और दूरदर्शिता के सिद्धांतों के अनुरूप तर्कसंगत और न्यायसंगत बातचीत को आगे बढ़ाएं।’अमेरिका ने अभी यह स्वीकार नहीं किया है कि इस तरह की कोई बातचीत होने जा रही है।
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भारत के आर्थिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि कुछ ही दिनों में देश ने दो बड़े-बड़े व्यापारिक समझौते कर लिए हैं। पूरे साल की बात करें तो भारत ने कुल पांच प्रमुख ट्रेड डील साइन की हैं, और इन समझौतों वाले देशों की मिली-जुली जीडीपी दुनिया की कुल जीडीपी का 50% से भी ज्यादा है। सबसे नई और ताजा डील अमेरिका के साथ हुई है, जो पिछले कुछ महीनों से दोनों देशों के बीच तनाव और टैरिफ की वजह से चर्चा में बनी हुई थी। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है, जहां पिछले वित्त वर्ष (2025) में भारत के कुल निर्यात का करीब 20% माल गया और हमारे आयात में उनकी हिस्सेदारी 6.3% रही। वर्ष 2014 से अब तक भारत ने आठ व्यापार समझौतों को अंतिम रूप दिया है।
भारत ने पिछले कुछ वर्ष में 37 विकसित देशों के साथ आठ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को अंतिम रूप दिया है। दूसरी तरफ भारत चिली, पेरू और कनाडा सहित कई देशों के साथ इसी तरह के समझौतों के लिए सक्रिय रूप से बातचीत कर रहा है। चिली के साथ व्यापार वार्ता लगभग अंतिम चरण में है जहां भारत के महत्वपूर्ण खनिजों में हित हैं। पश्चिम एशिया क्षेत्र के छह देशों के समूह जीसीसी (खाड़ी सहयोग परिषदने) भी भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के लिए बातचीत शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की है।
हर कोई भारत के साथ बिजनेस क्यों करना चाहता है?
दुनिया में कई बड़े देश आजकल मंदी या परेशानी में हैं, लेकिन भारत लगातार 7% की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। यहाँ सब कुछ काफी स्थिर और भरोसेमंद है। भारत में 140 करोड़ लोग हैं और इनमें से बहुत सारे लोग अब मध्यम वर्ग के हैं – यानी उनके पास पैसे हैं, वे सामान खरीदते हैं। दुनिया की हर बड़ी कंपनी के लिए यह सबसे अच्छा ग्राहक आधार है। कई कंपनियां अब चीन में फैक्ट्री चलाने की जगह दूसरा देश ढूंढ रही हैं। भारत अपनी PLI स्कीम (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) के जरिए उन्हें अच्छी सुविधाएं और मदद दे रहा है। भारत के पास दुनिया की सबसे ज्यादा युवा आबादी है। साथ ही डिजिटल पेमेंट, इंटरनेट और टेक्नोलॉजी में भारत बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसीलिए आजकल लगभग हर देश और हर बड़ी कंपनी भारत से जुड़ना चाहती है।
और भी गुड न्यूज आ सकती है
आने वाले वर्ष में भारत के लिए निश्चित रूप से और भी कई अच्छी खबरें सुनने को मिलेंगी। भारत एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी, एक महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी बनेगा। व्यापार समझौतों के तहत, दो या दो से अधिक राष्ट्र अपने बीच व्यापार की जाने वाली वस्तुओं की अधिकतम संख्या पर आयात शुल्क या तो समाप्त कर देते हैं या कम कर देते हैं। वे सेवाओं में व्यापार को बढ़ावा देने और निवेश आकर्षित करने के लिए नियमों में ढील भी देते हैं।
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