कक्षा 7वीं के छात्र का कमाल, तैयार की हवा से पानी बनाने वाली मशीन, साउंड से बढ़ाई 117% पानी बनाने की क्षमता
अंकित का यह प्रोजेक्ट थर्मो फिशर साइंटिफिक जूनियर इनोवेटर्स चैलेंज 2026 के 30 राष्ट्रीय फाइनलिस्ट में चुना गया है। यह अमेरिका में मिडिल स्कूल के छात्रों के लिए होने वाली प्रमुख STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) प्रतियोगिताओं में शामिल है।
दिल्ली दंगे पर हाई कोर्ट की दो टूक, नहीं बनेगी कोई नई SIT; भड़काऊ भाषण और पुलिस पर कार्रवाई वाली याचिकाएं रद्द
Delhi Riots 2020: राजधानी दिल्ली में हुए दंगों और हिंसक घटनाओं की जांच को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा और निर्णायक फैसला सुनाया है. अदालत ने साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों और साल 2019 की जामिया नगर हिंसा की विशेष जांच टीम यानी SIT से जांच कराने की मांग वाली तमाम याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है. इसके साथ ही कोर्ट ने उन अर्जियों को भी पूरी तरह रद कर दिया है जिनमें कुछ राजनीतिक नेताओं पर कथित भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की गुहार लगाई गई थी. अदालत के इस कड़े रुख के बाद अब इस मामले में किसी नई या स्वतंत्र जांच एजेंसी के गठन की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है.
अदालत ने खारिज कीं तमाम पुरानी मांगें
दिल्ली हाई कोर्ट के सामने दाखिल इन याचिकाओं में कई अहम मुद्दे उठाए गए थे. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि दिल्ली पुलिस की अब तक की गई कार्रवाई निष्पक्ष नहीं रही है, इसलिए पूरे मामले की दोबारा स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए. याचिकाओं में यह मांग भी शामिल थी कि हिंसा भड़काने वाले बयानों के लिए नेताओं के खिलाफ तुरंत प्राथमिकी दर्ज की जाए. इसके अलावा ड्यूटी के दौरान कथित लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों पर भी सख्त कानूनी कार्रवाई की अपील की गई थी. हालांकि अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए साफ कह दिया कि SIT बनाने या मौजूदा जांच प्रक्रिया में इस तरह से दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता है.
नेताओं और पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर था विवाद
इन याचिकाओं में मुख्य रूप से दिल्ली पुलिस की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए गए थे. आरोप लगाया गया था कि पुलिस ने कुछ खास मामलों में ढिलाई बरती और जरूरी कदम उठाने में देरी की. याचिकाओं में कपिल मिश्रा और प्रवेश वर्मा जैसे नेताओं के बयानों को आधार बनाकर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने का दबाव बनाया गया था. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इन नेताओं के बयानों से माहौल बिगड़ा और हिंसा की शुरुआत हुई. वहीं दूसरी तरफ पुलिस अधिकारियों पर भी पक्षपात और लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए गए थे, लेकिन हाई कोर्ट ने इन सभी मांगों को विचार के लायक नहीं माना और राहत देने से इनकार कर दिया.
साल 2020 का वह काला दौर
इस पूरे कानूनी विवाद को समझने के लिए साल 2020 के घटनाक्रम को जानना जरूरी है. फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सड़कें उस समय जल उठी थीं जब नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के समर्थन और विरोध में लोग आमने-सामने आ गए थे. जाफराबाद और मौजपुर जैसे घनी आबादी वाले इलाकों से शुरू हुआ यह विवाद देखते ही देखते एक भीषण सांप्रदायिक टकराव में बदल गया. कई दिनों तक सड़कों पर जमकर पथराव हुआ, पेट्रोल बम चले और सैकड़ों दुकानों, मकानों और गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया. इस खौफनाक दौर में खुफिया ब्यूरो यानी IB के कर्मचारी अंकित शर्मा समेत 53 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी, जबकि 200 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. इस दौरान भारी मात्रा में निजी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था.
जामिया हिंसा और कैंपस में पुलिस का एक्शन
दिल्ली दंगों की इस कड़ी में साल 2019 के जामिया इलाके का घटनाक्रम भी शामिल था. दिसंबर 2019 में जामिया मिलिया इस्लामिया के आसपास सीएए कानून के विरोध में जोरदार प्रदर्शन चल रहे थे. 15 दिसंबर को जब प्रदर्शनकारियों ने संसद की तरफ आगे बढ़ने का प्रयास किया, तो पुलिस ने उन्हें मथुरा रोड के पास बैरिकेड लगाकर रोक दिया. इसके बाद हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए और प्रदर्शन अचानक हिंसक रूप ले बैठा. सड़कों पर बसों में आग लगा दी गई, कई निजी गाड़ियों में तोड़फोड़ हुई और जमकर पत्थरबाजी की गई. स्थिति पर काबू पाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. इसी दौरान पुलिस बल जामिया यूनिवर्सिटी कैंपस और लाइब्रेरी के भीतर तक पहुंच गया था, जहां छात्रों पर बल प्रयोग को लेकर देश भर में बड़ा विवाद छिड़ा था.
हाई कोर्ट के फैसले के मायने
दिल्ली हाई कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि दंगों और हिंसा से जुड़े मामलों की जांच उसी प्रक्रिया से आगे बढ़ेगी जैसी अब तक चलती आई है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पुराने मामलों को नए सिरे से किसी स्वतंत्र आयोग या विशेष दल को सौंपने की कोई जरूरत नहीं है. अदालत के इस आदेश से जहां दिल्ली पुलिस ने राहत की सांस ली है, वहीं नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज कराने की उम्मीद लगाए बैठे पक्षकारों को बड़ा झटका लगा है. राजधानी की शांति व्यवस्था को हिला देने वाले इन संवेदनशील मामलों में अदालत का यह रुख कानूनी रूप से बेहद अहम माना जा रहा है.
यह भी पढ़ें: दिल्ली में घोषित अपराधियों पर पुलिस की कार्रवाई, 19 मामलों में शामिल आरोपी गिरफ्तार
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Hindustan
News Nation










