Responsive Scrollable Menu

सुप्रीम कोर्ट में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुनवाई आज:एकतरफा फैसले लेने का आरोप; मांग- फैसला आने तक कामकाज से अलग रखा जाए

सुप्रीम कोर्ट 5 अक्टूबर को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। ये याचिकाएं स्पेशल इंटेन्सिव रिवीजन (SIR) से जुड़े फैसलों को लेकर दाखिल की गई हैं। आरोप है कि SIR से जुड़े करीब 14 फैसले दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। याचिकाकर्ताओं ने इन फैसलों को पलटने, ज्ञानेश कुमार पर मुकदमा चलाने और SIR में मतदाताओं के नाम हटाने की SIT जांच की मांग की है। साथ ही CEC को अंतिम फैसला आने तक पद के कामकाज से अलग रखने की भी मांग की गई है। CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच मामले की सुनवाई करेगी। याचिकाओं में कहा गया है कि SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ नाम हटाए गए। पहली याचिका की मांगें दूसरी याचिका की मांगें ज्ञानेश कुमार के अलावा बाकी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग याचिका में सक्षम प्राधिकरण को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज करने और मुकदमा शुरू करने का निर्देश देने की मांग की गई है। यह कार्रवाई ज्ञानेश कुमार, सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग, डायरेक्टर जनरल (IT) सीमा खन्ना और जिम्मेदार पाए जाने वाले अन्य अधिकारियों के खिलाफ मांगी गई है। याचिका में धारा 32 का हवाला दिया गया है। इस प्रावधान में मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन या सुधार से जुड़े सरकारी कर्तव्य के उल्लंघन पर सजा का प्रावधान है। फॉर्म 6 और वोटर डेटा को लेकर भी आरोप याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि Form 6 में बिना अनुमति बदलाव किया गया। इसके अलावा, वोटर लिस्ट के डेटाबेस को सेंट्रलाइज करने का भी आरोप लगाया गया है। याचिका में कहा गया है कि ECINet सिस्टम के जरिए पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा बहाल नहीं किए गए। इसमें ECI के नाम पर बताए गए मतदाताओं को शामिल करने को चुनौती देते हुए पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख अपीलें दाखिल किए जाने का भी जिक्र है। एक मीडिया रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ ज्ञानेश कुमार पर विवाद इस पूरे मामले की शुरुआत इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से हुई थी, जिसमें SIR को लेकर चुनाव आयोग के अधिकारियों के बीच मतभेदों का जिक्र था। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव पैनल के भीतर SIR प्रक्रिया को लेकर बार-बार चिंता जताई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, SIR प्रक्रिया की देखरेख तीनों अधिकारियों ने की है, लेकिन संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्तियां दर्ज कराईं। इनमें से 4 आपत्तियां एक ही दिन में दर्ज की गईं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ये आपत्तियां उन फैसलों और आदेशों को लेकर थीं, जिन्हें संधू और जोशी की जानकारी के बिना जारी किया गया था। विपक्ष अगले सत्र में महाभियोग लाने की तैयारी में विपक्ष एक बार फिर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है। अप्रैल 2026 में भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था लेकिन लोकसभा में वह प्रस्ताव खारिज हो गया था, जबकि राज्यसभा में अभी भी लंबित है। सूत्रों के मुताबिक, इस बार भी महाभियोग प्रस्ताव को कांग्रेस ही लीड कर रही है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर विपक्षी दलों से बात की है। संभावना है कि इसे अगले 2 हफ्तों के भीतर पेश किया जाएगा। एक और मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा है, जहां एक वकील ने भारत के अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना कार्रवाई चलाने की मांग की है। ज्ञानेश कुमार पर एक्शन होगा या नहीं, 3 संभावनाएं 1. कार्यकाल के फैसलों पर पुलिस एक्शन नहीं हो सकता: ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 के तहत सुरक्षा मिली है। यानी, धारा 16 उन्हें सुरक्षा देती है कि "अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए किसी भी कार्य या निर्णय" के लिए उनके खिलाफ कोई दीवानी या आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक यह प्रावधान मौजूद है, उन्हें केवल पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी के जरिए हटाना, उन पर केस चलाना कानूनी रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण है। 2. भाजपा ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया: ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है, यानी अभी 2 साल कम से कम ज्ञानेश अपने पद पर रहेंगे। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी का मानना है कि ये आरोप आधारहीन हैं। संधू और जोशी की आपत्तियां किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है, बल्कि कार्यशील लोकतंत्र का संकेत है। यानी वह उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेने के मूड में है। 3. आखिरी रास्ता महाभियोग, लेकिन विपक्ष के पास बहुमत संभव नहीं: अनुच्छेद 324 (5) के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के तहत ही हटाया जा सकता है। महाभियोग प्रस्ताव को पेश करने के लिए लोकसभा में 100 तो राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति को यह तय करना होता है कि इसे स्वीकार किया जाए या नहीं। मौजूदा हालात में विपक्ष को महाभियोग प्रस्ताव को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में 2/3 की जरूरत होगी। यानी लोकसभा में 362 सांसदों और राज्यसभा में 164 सांसदों का समर्थन हो। विपक्ष के पास संसद में इस वक्त इतना बड़ा समर्थन नहीं है। ---------------------- मुख्य चुनाव आयुक्त विवाद से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें…

Continue reading on the app

42 सांसद, 8 मंत्री…फिर भी बिहार हाथ खाली क्यों:466 गांव डूबे, एक पैसा नहीं मिला; गुजरात को ₹1,278 करोड़, 'पाली' का सेंटर फॉर एक्सीलेंस ओडिशा में

केंद्र सरकार क्या बिहार के साथ नाइंसाफी कर रही? हालिया दो बड़े फैसलों ने इस सवाल को बल दिया है। दोनों फैसले क्या हैं, क्या वाकई बिहार की हकमारी हो रही, सांसद-मंत्री क्या कर रहे, जानेंगे; बूझे की नाही में…। फैसला-1ः 466 गांव डूबे, फूटी कौड़ी नहीं मिली, गुजरात को 1,277 करोड़ नेपाल में मूसलाधार बारिश के बाद बिहार की गंडक उफना गई हैं। इससे कई जगह तटबंध, जमींदारी बांध और सुरक्षात्मक तटबंध टूट गए हैं। नासा ने सैलेटाइल तस्वीरों और रिपोर्ट में भी विकराल बाढ़ की पुष्टि की है। नासा ने 20 सितंबर और 29 सितंबर 2026 को ली गई सैटेलाइट तस्वीरों के अध्ययन से बाढ़ के विस्तार का स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण मिला है। इन सबके बावजूद केंद्र सरकार ने 4 अक्टूबर तक बिहार के लिए किसी राहत पैकेज का ऐलान नहीं किया है। यहां तक कि केंद्र ने SDRF (राज्य आपदा मोचन निधि) के तहत अलॉट अपने हिस्से के 1971 करोड़ रुपए में से एक रुपए भी बिहार को नहीं दिया है। 16 सितंबर 2026 को केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान बाढ़ का मुआयना करने आए। गए। लेकिन केंद्र ने अब तक आर्थिक मदद नहीं की है। जबकि… PIB की प्रेस रिलीज के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 1 अगस्त 2026 को अरुणाचल प्रदेश को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए SDRF के केंद्रीय हिस्से की पहली किस्त 44.55 करोड़, असम को 379.35 करोड़ और गुजरात को 500 करोड़ रुपए जारी किए। महाराष्ट्र को 500 करोड़ और ओडिशा को दूसरी किस्त के दौर पर 500 करोड़ देने का ऐलान किया। फैसला-2ः बिहार की ‘पाली’ भाषा, ओडिशा में सेंटर फॉर एक्सीलेंस खुलेगा 1 अक्टूबर 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने पांच शास्त्रीय भाषाओं- असमिया, बंगाली, पाली, मराठी और प्राकृत के संरक्षण के लिए 'सेंटर फॉर एक्सीलेंस' बनाने की मंजूरी दी। इसका मकसद इसका संरक्षण, रिसर्च और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना। मंत्रालय के नोटिफिकेशन के मुताबिक, असम की तेजपुर यूनिवर्सिटी में असमिया, बंगाल के विश्व भारती विश्वविद्यालय में बंगाली, ओडिशा सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पाली, गुजरात सेंट्रल यूनिवर्सिटी में प्राकृत और महाराष्ट्र के पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में मराठी भाषा का सेंटर फॉर एक्सीलेंस खुलेगा। जबकि… सर्वविदित है कि भगवान बुद्ध बिहार के बोधगया से पाली भाषा में उपदेश देते थे। पाली भाषा की उत्पत्ति बिहार के मगध से मानी जाती है। इसका उल्लेख इतिहास की किताबों के साथ-साथ भारत सरकार के डॉक्यूमेंट में भी है। मोदी सरकार ने 3 अक्टूबर 2024 में मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषा की मान्यता दी। 4 अक्टूबर 2024 को भारत सरकार के जारी डॉक्यूमेंट और प्रेस रिलीज में कहा है... 3 अक्टूबर 2024 को जारी भारत सरकार के प्रेस रिलीज में साफ कहा गया है कि बिहार सरकार ने पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने का प्रस्ताव दिया था। इस मांग को लेकर कमेटी बनाई गई थी। 42 सांसद, 8 मंत्री, फिर कर क्या रहे हैं? इस वक्त केंद्र की मोदी सरकार में बिहार के 42 सांसद (30 लोकसभा, 12 राज्यसभा) और 8 मंत्री शामिल हैं। 14 सांसद (10 लोकसभा, 4 राज्यसभा) विपक्ष में हैं। इसके बावजूद बिहार में अब तक कोई बड़ा निवेश नहीं आया है। इसके 2 बड़े कारण हैं… 1. ना विजन, ना एरिया में खास पकड़, सिर्फ सामाजिक समीकरण पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं, ‘बिहार के सांसदों में विजन की साफ कमी झलकती है। यहां के सांसद दिल्ली में अपने राज्य के लिए लॉबी नहीं कर पाते हैं। जबकि, साउथ के सांसद दिल्ली-नोएडा में डेरा डाले रहते हैं। वह किसी ना किसी तरह अपने एरिया में बड़ा प्रोजेक्ट ले जाने की कोशिश करते हैं।’ ताजा उदाहरण ही देख लीजिए, सितंबर में दिल्ली में सेमीकंडक्टर 2.0 मिशन शुरू हुआ। इसमें साउथ के सांसदों ने जमकर लॉबिंग की। अपने यहां प्रोजेक्ट लेकर गए। बिहार के सांसद बयानबाजी और जातीय समीकरण साधने में रह गए। 2. अधिकतर सांसद अपने अधिकार को ही नहीं जानते PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के 80% से अधिक सांसद अपने पूरे 5 साल के कार्यकाल में एक भी प्राइवेट मेंबर बिल पेश नहीं करते। अधिकतर सांसद या तो इसकी जटिल प्रक्रिया/ड्राफ्टिंग की जानकारी न होने के कारण बिल पेश नहीं कर पाते, या इसे अपनी प्राथमिकता में शामिल ही नहीं करते। केवल 2-3 अपवाद सांसद (जैसे नालंदा या नवादा के सांसद) ही ऐसे रहे हैं जिन्होंने कई बिल पेश किए। पॉलिटिकल एनालिस्ट केके लाल कहते हैं, ‘हकीकत तो है कि यहां के सांसदों को अपने पूरे अधिकार का पता ही नहीं है। उनको हॉस्पिटलों में मरीज को एडमिट करा देना, रेलवे टिकट कंफर्म करा देना, पर्व-त्योहार में स्पेशल ट्रेन चलवा देना बड़ा काम लगता है।’

Continue reading on the app

  Sports

रोनाल्डो को देखकर सीखा फुटबॉल, राज्य-स्तरीय फुटबॉल प्रतियोगिता में छतरपुर की बेटी ने पाई तीसरी रैंक

Chhatarpur News: अंत्रा जैन ने लोकल 18 से कहा कि वह टीवी पर रोनाल्डो और मेसी को फुटबॉल खेलते देखती थीं, तो उनका भी फुटबॉल खेलने में इंट्रेस्ट बढ़ने लगा. उन्होंने ठान लिया कि खेल की दुनिया में कुछ करके दिखाना है. अभी तो राज्यस्तरीय फुटबॉल प्रतियोगिता में तीसरा स्थान हासिल किया है, वह आगे राष्ट्रीय स्तर पर खेलना चाहती हैं. Mon, 5 Oct 2026 07:39:23 +0530

  Videos
See all

Hindi News | Breaking News: पंजाब में आतंकी साजिश पर, सुरक्षाबलों का प्रहार | Pakistan | CM Mann #tmktech #vivo #v29pro
2026-10-05T03:16:39+00:00

CEC Gyanesh Kumar पर जांच के आदेश, क्या है मामला? | Vigilance Probe | Kerala State Transport Project #tmktech #vivo #v29pro
2026-10-05T03:14:29+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers