Indira Ekadashi 2026: राजा इंद्रसेन की वजह से पड़ा ‘इंदिरा एकादशी’ नाम? जानें पितरों से जुड़ी पूरी पौराणिक कथा
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को इंदिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 6 अक्टूबर, मंगलवार को रखा जाएगा। यह एकादशी पितृ पक्ष के दौरान आती है, इसलिए धार्मिक परंपरा में इसे पितरों से जुड़ी महत्वपूर्ण एकादशी माना जाता है।
मान्यता के अनुसार, इंदिरा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना और पितरों की मुक्ति की कामना से किया जाता है। लेकिन इस एकादशी का नाम ‘इंदिरा’ कैसे पड़ा, इसके पीछे राजा इंद्रसेन से जुड़ी एक पौराणिक कथा बताई जाती है।
राजा इंद्रसेन को क्यों करना पड़ा एकादशी व्रत?
पौराणिक कथा के अनुसार, सत्ययुग में महिष्मती नगरी में राजा इंद्रसेन का शासन था। वे धर्मपरायण और भगवान विष्णु के भक्त माने जाते थे।
एक दिन उनके दरबार में देवर्षि नारद मुनि पहुंचे। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया। इसके बाद नारद जी ने राजा को बताया कि वे यमलोक गए थे, जहां उन्होंने उनके पिता को देखा।
नारद जी के अनुसार, राजा के पिता अपने पूर्व जन्म के किसी कर्म के कारण यमलोक में कष्ट भोग रहे थे। उन्होंने नारद मुनि के माध्यम से अपने पुत्र राजा इंद्रसेन तक संदेश पहुंचाया कि यदि उनका पुत्र आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करे, तो उन्हें यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिल सकती है।
राजा ने रखा इंदिरा एकादशी का व्रत
पिता की मुक्ति की कामना से राजा इंद्रसेन ने नारद मुनि से इस व्रत की विधि जानी और आश्विन कृष्ण एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखा।
उन्होंने भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की और एकादशी व्रत का पालन किया। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा के इस पुण्य कर्म और भगवान विष्णु की कृपा से उनके पिता को यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिली और वे स्वर्ग लोक चले गए।
इसी कथा के आधार पर धार्मिक मान्यता में कहा जाता है कि इस एकादशी का संबंध राजा इंद्रसेन से है और इसे इंदिरा एकादशी कहा जाने लगा। परंपरा में यह भी माना जाता है कि इंदिरा एकादशी का व्रत करने से पूर्वजों को सद्गति प्राप्त होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
इंदिरा एकादशी पर कैसे करें पूजा?
इंदिरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा और पितरों के निमित्त धार्मिक कर्म करने की परंपरा है।
भगवान विष्णु की पूजा: सुबह स्नान करके स्वच्छ और सात्विक वस्त्र पहनें। भगवान विष्णु का ध्यान करें और श्रद्धापूर्वक व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा करें।
पितरों का तर्पण: धार्मिक परंपरा के अनुसार दोपहर के समय पितरों के निमित्त जल, तिल और कुश से तर्पण किया जाता है। तर्पण की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
विष्णु सहस्रनाम का पाठ: दिनभर सात्विक आचरण रखते हुए भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप, विष्णु सहस्रनाम या भगवद्गीता का पाठ किया जा सकता है।
दान-पुण्य: जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को अपनी सामर्थ्य के अनुसार फल, अन्न, वस्त्र या तिल का दान करने की परंपरा है।
दीप प्रज्वलित करें: शाम के समय घर के पूजा स्थान और परंपरा के अनुसार पीपल के पेड़ के नीचे पितरों के निमित्त दीप जलाया जाता है।
इंदिरा एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन कुछ चीजों से परहेज करने की सलाह दी जाती है।
तामसिक भोजन से बचें: प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और अंडे आदि का सेवन न करने की परंपरा है।
चावल न खाने की मान्यता: एकादशी के दिन चावल का सेवन न करने की धार्मिक परंपरा है। कई वैष्णव परंपराओं में एकादशी पर चावल से पूरी तरह परहेज किया जाता है।
क्रोध और विवाद से बचें: इस दिन मन को शांत रखने, किसी का अनादर न करने और वाद-विवाद से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
तर्पण के समय का ध्यान रखें: पितृ कर्म और तर्पण की विधि में समय का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए सूर्यास्त के बाद तर्पण करने से पहले अपनी क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पंडित या स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि करना उचित है।
पितृ पक्ष में इंदिरा एकादशी का विशेष महत्व
इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के दौरान आती है। यही वजह है कि धार्मिक परंपरा में इसे भगवान विष्णु की भक्ति के साथ पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
राजा इंद्रसेन की कथा भी इसी संदेश से जुड़ी है कि संतान द्वारा किए गए धार्मिक कर्मों को पितरों की सद्गति की कामना से जोड़ा गया है। हालांकि, ये सभी बातें धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक परंपराओं पर आधारित हैं।
डिस्क्लेमर: इस खबर में बताए गए धार्मिक लाभ, पूजा-विधि और मान्यताएं धार्मिक ग्रंथों, लोकपरंपराओं और आस्था से जुड़ी हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। तर्पण और पारण आदि के समय के लिए अपने स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
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