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Saptami Shradh 2026: पितृपक्ष का सप्तमी श्राद्ध आज, जानें तर्पण-पिंडदान की विधि
पितृपक्ष हिंदू धर्म में पितरों को समर्पित महत्वपूर्ण समय माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दौरान परिवार के दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना की जाती है।
इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026 से हुई है और इसका समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। शुक्रवार, 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध किया जा रहा है।
किन पूर्वजों के लिए किया जाता है सप्तमी श्राद्ध?
पितृपक्ष की प्रत्येक तिथि पर अलग-अलग पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सप्तमी श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनका निधन किसी महीने के शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ हो।
यदि परिवार में किसी व्यक्ति का निधन सप्तमी तिथि को हुआ था, तो उनके निमित्त इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है।
सप्तमी श्राद्ध की पूजा और तर्पण विधि
1. सुबह स्नान और पूजा स्थल की सफाई
श्राद्ध कर्म करने वाला व्यक्ति सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करे। धार्मिक परंपरा में इस दिन सफेद या हल्के रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनने की बात कही जाती है। इसके बाद घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह साफ-सफाई करें। श्राद्ध कर्म के लिए शांत और स्वच्छ स्थान का चयन करें।
श्राद्ध के मुख्य कर्म को परंपरा के अनुसार अपराह्न काल में किया जाता है। स्थानीय पंचांग में दिए गए श्राद्ध मुहूर्त को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।
2. तर्पण कैसे करें?
तर्पण के लिए कुशा, काले तिल और जल का उपयोग किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार पितरों की दिशा दक्षिण मानी जाती है, इसलिए तर्पण के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करने की परंपरा है।
अपने गोत्र और पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक उनका आह्वान करें। इसके बाद ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ मंत्र का उच्चारण करते हुए जल अर्पित करें।
तर्पण की विधि अलग-अलग परंपराओं और क्षेत्रों में कुछ भिन्न हो सकती है। इसलिए परिवार की परंपरा या स्थानीय आचार्य द्वारा बताई गई विधि का पालन करना उचित माना जाता है।
3. पिंडदान की विधि
पिंडदान के लिए परंपरा के अनुसार पके हुए चावल, जौ का आटा, काले तिल और घी से पिंड तैयार किए जाते हैं। इन्हें कुशा या पत्तल पर रखकर पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है। पिंडदान का उद्देश्य धार्मिक परंपरा में दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना माना जाता है।
पंचबलि में क्या करें?
श्राद्ध कर्म में पंचबलि की भी परंपरा बताई गई है। इसके तहत भोजन का कुछ अंश अलग-अलग जीवों के लिए निकाला जाता है।
गाय के लिए: गौ-ग्रास
कौवे के लिए: काक-बलि
कुत्ते के लिए: भोजन का अंश
चींटी के लिए: भोजन का अंश
पक्षियों के लिए: भोजन का अंश
धार्मिक मान्यता में कौवे को पितरों से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पंचबलि की परंपरा अलग हो सकती है।
ब्राह्मण भोज और दान की परंपरा
सप्तमी श्राद्ध पर योग्य ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भोजन सात्विक रखा जाता है। आम तौर पर खीर, पूरी, दाल और सब्जी जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं।
भोजन के बाद सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, वस्त्र और फल आदि देने की परंपरा है। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को दान करना भी श्राद्ध कर्म का हिस्सा माना जाता है।
भगवद्गीता का पाठ भी कर सकते हैं
पितृपक्ष के दौरान धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवद्गीता का पाठ, भगवान का स्मरण और जरूरतमंदों की सहायता करना शुभ माना जाता है। सप्तमी श्राद्ध के दिन भी श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार इन धार्मिक कार्यों को कर सकते हैं।
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