Pitru Paksha 2026: षष्ठी श्राद्ध आज, जानें तर्पण का शुभ समय और कौन सी 3 गलतियां नहीं करनी चाहिए
पितृपक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दौरान पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन कर्मों के जरिए पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
पंचांग के अनुसार, 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार को षष्ठी श्राद्ध किया जा रहा है। इस दिन उन पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है, जिनका निधन षष्ठी तिथि को हुआ था। 2026 के पितृपक्ष कैलेंडर में भी षष्ठी श्राद्ध की तिथि 1 अक्टूबर दी गई है।
षष्ठी तिथि कब से कब तक रहेगी?
पंचांग के अनुसार, षष्ठी तिथि 1 अक्टूबर को दोपहर 12:35 बजे शुरू होगी और 2 अक्टूबर को सुबह 10:15 बजे समाप्त होगी। श्राद्ध कर्म में केवल तिथि ही नहीं, बल्कि उचित काल का भी महत्व माना जाता है। पितृ कर्म के लिए अपराह्न काल को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार श्राद्ध के मुहूर्त में कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार सटीक समय देखना उचित रहेगा।
षष्ठी श्राद्ध पर क्या करें?
षष्ठी श्राद्ध के दिन पितरों का स्मरण करते हुए श्रद्धा के साथ तर्पण करने की परंपरा है। जल में काला तिल मिलाकर पितरों के निमित्त तर्पण किया जाता है। इसके अलावा अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन, वस्त्र या जरूरत की अन्य वस्तुओं का दान करने की परंपरा भी बताई गई है।
पितृपक्ष के दौरान किए जाने वाले श्राद्ध कर्म में परिवार की परंपरा और स्थानीय रीति का भी महत्व होता है।
षष्ठी श्राद्ध पर भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां
1. बिना श्रद्धा और जल्दबाजी में श्राद्ध न करें
श्राद्ध शब्द ही श्रद्धा से जुड़ा है। इसलिए इस दिन पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्म को केवल औपचारिकता या जल्दबाजी में पूरा करने के बजाय श्रद्धा और शांत मन से करने की परंपरा है।
तर्पण और अन्य कर्म के दौरान पितरों का स्मरण करने तथा पूजा स्थल पर शांत वातावरण बनाए रखने को महत्वपूर्ण माना जाता है।
2. श्राद्ध के समय विवाद और अपमान से बचें
धार्मिक परंपराओं में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति सम्मान से जोड़ा जाता है। इसलिए इस दौरान घर में अनावश्यक विवाद, क्रोध और किसी के अपमान से बचने की सलाह दी जाती है।
खासकर श्राद्ध कर्म के दौरान वातावरण को शांत और श्रद्धापूर्ण रखना बेहतर माना जाता है।
3. दिखावे के लिए क्षमता से अधिक खर्च न करें
श्राद्ध में दान और भोजन कराने की परंपरा है, लेकिन इसके लिए अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करना जरूरी नहीं माना जाता। धार्मिक परंपरा में श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करने पर जोर दिया जाता है।
जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना या उपयोगी वस्तु का दान करना भी पितृपक्ष के दौरान किए जाने वाले सेवा कार्यों में शामिल माना जाता है।
षष्ठी श्राद्ध का क्या है धार्मिक महत्व?
पितृपक्ष में सामान्यतः जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करने की परंपरा है। इसी क्रम में षष्ठी तिथि को उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध किया जाता है, जिनका निधन षष्ठी तिथि को हुआ था।
श्राद्ध कर्म का प्रमुख उद्देश्य पूर्वजों का स्मरण, उनके प्रति सम्मान और परिवार की परंपरा के अनुसार तर्पण करना माना जाता है। इसलिए षष्ठी श्राद्ध के दिन भी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ पितरों का स्मरण किया जाता है।
कब होगा पितृपक्ष का समापन?
2026 में पितृपक्ष का मुख्य श्राद्ध क्रम 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलेगा। 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन होगा। इस दिन उन पूर्वजों के लिए भी श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष केवल कर्मकांड का समय नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, स्मरण और सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी है।
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