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जरूरत की खबर- मुफ्त की धूप के 7 हेल्थ बेनिफिट्स:उम्र बढ़ेगी, बुढ़ापा देर से आएगा, डॉक्टर से समझें मॉर्निंग सनलाइट के 7 रूल्स

अगर मैं आपसे पूछूं कि लंबी उम्र का सबसे बड़ा राज क्या है तो शायद आपका जवाब होगा- अच्छा खाना, रोज एक्सरसाइज करना और भरपूर नींद लेना। लेकिन स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट एंड्रयू ह्यूबरमैन कहते हैं कि इस लिस्ट में एक चीज और जोड़े दें– सुबह की धूप। उनके मुताबिक, सुबह की धूप सिर्फ आपको जगाती नहीं, बल्कि शरीर की बायलॉजिकल क्लॉक में भी चाभी भरती है। दिलचस्प बात यह है कि आज हममें से ज्यादातर लोग सुबह आंख खुलते ही सनलाइट की बजाय मोबाइल स्क्रीन देखते हैं। दिन की शुरुआत नोटिफिकेशन और सोशल मीडिया से होती है। जबकि सुबह की धूप बॉडी क्लॉक को सेट करने और शरीर को पूरे दिन के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाती है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में सुबह की धूप के हेल्थ बेनिफिट्स पर बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट- डॉ. अतुल अरोड़ा, सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, धर्मशिला नारायणा हॉस्पिटल, दिल्ली सवाल- दुनिया भर में सनलाइट (धूप) पर हो रही रिसर्च कहती है कि सूरज की रोशनी से लॉन्जिविटी बढ़ती है। क्या ये बात सही है? जवाब- हां, ये बात सही है। कई रिसर्च बताती हैं कि जो लोग नियमित रूप से सुबह की धूप लेते हैं, उनके शरीर की कई प्रक्रियाएं बेहतर तरीके से काम करती हैं, जो हेल्दी एजिंग को सपोर्ट करती हैं। लेकिन इसे ऐसे समझना होगा कि धूप कोई जादुई दवा नहीं है, जो सीधे आपकी उम्र बढ़ा देती है। यह हेल्दी लिविंग का हिस्सा है। सवाल- क्या किसी भी समय धूप में रहना सेहत के लिए अच्छा है? जवाब- नहीं, सुबह की धूप शरीर को बताती है कि दिन शुरू हो गया है। इससे– सवाल- सुबह की धूप से शरीर में क्या बदलाव होता है? जवाब- सुबह की धूप कई हार्मोन्स की टाइमिंग तय करने में मदद करती है। इसका असर भूख, पाचन, ऊर्जा के इस्तेमाल, मूड और रात की नींद पर पड़ता है। यही वजह है कि जो लोग रेगुलर सुबह धूप लेते हैं, उनमें नींद का पैटर्न, दिनभर की एनर्जी और मेंटल परफॉर्मेंस बेहतर होता है। सुबह की धूप से शरीर में होने वाले सभी बदलाव ग्राफिक में देखिए- सवाल- सुबह की धूप हमारी बॉडी क्लॉक को कैसे रीसेट करती है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- वो कौन-से संकेत हैं, जो बताते हैं कि बॉडी क्लॉक बिगड़ रही है? जवाब- इसके संकेत अक्सर धीरे-धीरे दिखते हैं। इसलिए लोग इन्हें सामान्य थकान या खराब दिनचर्या का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। अगर सोने-जागने, भूख लगने या एनर्जी लेवल से जुड़ी दिक्कतें हो रही हैं, तो यह बॉडी क्लॉक के गड़बड़ाने का संकेत हो सकता है। ग्राफिक में ऐसे सभी संकेत देखिए- सवाल- बॉडी क्लॉक को ठीक करने के लिए क्या करें? जवाब- शरीर की इंटरनल क्लॉक को रीसेट करने का सबसे असरदार तरीका है कि उसे रोज एक जैसे संकेत मिलें। इसमें सुबह की धूप सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। रेगुलर रूटीन अपनाने से शरीर धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक लय (सर्केडियन रिद्म) में लौट सकता है। ग्राफिक में सभी टिप्स देखिए- सवाल- सुबह धूप लेने से क्या हेल्थ बेनिफिट्स होते हैं? जवाब- हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे बेहतर नींद, मेंटल हेल्थ, मेटाबॉलिक हेल्थ और हेल्दी एजिंग से जुड़ी जरूरी हैबिट मानते हैं। ग्राफिक में सुबह धूप लेने के सभी फायदे देखिए- सवाल- सुबह धूप लेने से रात में अच्छी नींद कैसे आती है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- इसे ऐसे समझिए- सवाल- सुबह की धूप स्ट्रेस कम करने में कैसे मदद करती है? जवाब- सुबह की धूप शरीर में कोर्टिसोल के नेचुरल मॉर्निंग पीक को सपोर्ट करती है। कोर्टिसोल को यूं तो ‘स्ट्रेस हार्मोन’ कहा जाता है, लेकिन सही समय पर बढ़ने वाला कोर्टिसोल वास्तव में हमें जगाने, एनर्जी देने और दिन के लिए तैयार करने का काम करता है। समस्या तब होती है, जब कोर्टिसोल गलत समय पर बढ़ने लगे। ऐसे में बेचैनी, चिड़चिड़ापन, थकान और नींद की समस्याएं बढ़ सकती हैं। सुबह की प्राकृतिक रोशनी कोर्टिसोल के डेली रिदम को व्यवस्थित करती है। सवाल- सुबह की धूप फोकस और परफार्मेंस बढ़ाने में कैसे मदद करती है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- सनलाइट का एजिंग से क्या कनेक्शन है? जवाब- अगर नींद, मेटाबॉलिज्म, हार्मोन, इम्यून सिस्टम और हार्ट हेल्थ लंबे समय तक ठीक रहे, तो उम्र बढ़ने के कुछ असर धीमे पड़ सकते हैं। सुबह की धूप इन सभी सिस्टम्स की टाइमिंग को बेहतर बनाए रखने में मदद करती है। जिन लोगों की सर्केडियन रिद्म (बॉडी क्लॉक) मजबूत रहती है, उनमें उम्र बढ़ने से जुड़ी कई समस्याओं का रिस्क कम होता है। सवाल- सुबह धूप लेने का सही तरीका क्या है? क्या धूप देखने का मतलब सीधे सूरज को देखना है? जवाब- नहीं, सुबह धूप लेने का मतलब सीधे सूरज को घूरना नहीं है। ऐसा करना आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है। सुबह की धूप का फायदा लेने के लिए सिर्फ इतना जरूरी है कि प्राकृतिक रोशनी आपकी आंखों तक पहुंचे। इसके लिए घर से बाहर निकलें और खुले आसमान की ओर देखें। सूरज आपकी नजर के दायरे में हो सकता है, लेकिन उसे सीधे देखने की जरूरत नहीं है। दरअसल, ब्रेन को सिग्नल सूरज की डिस्क से नहीं, बल्कि पूरे आसमान में फैली प्राकृतिक रोशनी से मिलता है। सवाल- सुबह धूप लेते समय किन बातों का ध्यान रखें? जवाब- सुबह की धूप का फायदा तभी मिलता है, जब उसे सही तरीके से लिया जाए। इसका मतलब ज्यादा देर धूप में खड़े रहना या सूरज को सीधे देखना नहीं है। मकसद आंखों और शरीर को सुरक्षित तरीके से प्राकृतिक रोशनी देना है। धूप लेने का सही तरीका ग्राफिक में देखिए- धूप सिर्फ रोशनी नहीं देती, यह मूड भी बेहतर बना सकती है। इसलिए अगली बार जब सूरज बादलों के पीछे से निकलता दिखे, तो कुछ देर के लिए बाहर जरूर जाएं। हो सकता है यह सुनहरी रोशनी आपके मन को भी थोड़ा हल्का और खुश कर दे। …………………………… ग्राफिक्स- विपुल शर्मा ……………………….. ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- PM मोदी ने बताए आंवले के गुण:विटामिन C का पावरहाउस, विटामिन A का खजाना, डाइटीशियन से जानें खाने का सही तरीका हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' के 138वें एपिसोड में आंवले का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “यह फल भारतीय घरों की परंपरा का हिस्सा है और हमारे पूर्वज पीढ़ियों से इसके गुणों की चर्चा करते आए हैं।” पूरी खबर पढ़ें…

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पेरेंटिंग- हमारे दोनों बच्चे बहुत लड़ते हैं:डांटने-समझाने का कोई असर नहीं, उन्हें विवाद सुलझाना, आपस में प्यार से रहना कैसे सिखाएं

सवाल- मैं 42 साल का हूं। मेरे दो बच्चे हैं- 13 साल का बेटा और 9 साल की बेटी। दोनों की आपस में बिल्कुल नहीं बनती। सुबह स्कूल जाने से लेकर रात सोने तक दोनों में किसी-न-किसी बात पर बहस, लड़ाई होती रहती है। अब तो वे साथ बैठकर खाना तक नहीं खाना चाहते। घर में हर समय तनाव का माहौल रहता है और हम पति-पत्नी भी इस वजह से परेशान रहने लगे हैं। कई बार गुस्से में हम बच्चों को डांट देते हैं, लेकिन उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या भाई-बहनों के बीच झगड़ा नॉर्मल है? क्या ये झगड़े भविष्य में भी उनके रिश्ते को भी प्रभावित कर सकते हैं? बतौर पेरेंट्स हमें क्या करना चाहिए, ताकि उनके बीच सहयोग और अपनापन बढ़ सके? एक्सपर्ट- डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- अगर घर में दो बच्चे हैं तो उनके बीच कभी-कभार झगड़ा, नोकझोंक होना बिल्कुल सामान्य है। खिलौने, टीवी का रिमोट, पसंदीदा खाना, कमरे की बेस्ट जगह या माता-पिता का अटेंशन, इन छोटी-छोटी बातों के लिए भाई-बहन के बीच बहस होना सामान्य भी है और स्वाभाविक भी। यह उनके डेवलपमेंट का ही हिस्सा है। इससे वे अपनी बात रखना, समझौते करना और आपसी मतभेद सुलझाना सीखते हैं। लेकिन जैसाकि आपने लिखा है कि अब दोनों के बीच यह सामान्य झगड़ा नहीं रह गया है। आपने लिखा है- ऐसी स्थिति में इसे सिर्फ ‘भाई-बहन की सामान्य लड़ाई’ कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सिबलिंग्स के बीच झगड़े के मुख्य कारण आपके बच्चों की उम्र 13 और 9 साल है। दोनों अलग-अलग डेवलपमेंटल स्टेज में हैं। बड़े बेटे में किशोरावस्था की शुरुआत हो रही है, जहां वह अपनी पहचान और पर्सनल स्पेस चाहता है। वहीं 9 साल की बेटी अभी भी परिवार के साथ ज्यादा जुड़ाव और अटेंशन चाहती है। इन अलग-अलग जरूरतों की वजह से टकराव बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन अगर यह टकराव लगातार हो रहा है तो पेरेंट्स को बीच में सिर्फ ‘जज’ नहीं, बल्कि इमोशनल कोच की भूमिका निभानी होगी। आपको यह समझने की कोशिश करनी होगी कि इस केस में दोनों के बीच टकराव की वजह क्या है। किस कारण से दोनों के बीच दूरियां बढ़ी हैं। साथ ही भाई-बहनों के बीच लड़ाई के सभी संभावित कारणों का एक ओवरव्यू जरूरी है। इसे ग्राफिक में देखिए- सिबलिंग फाइट का रिश्ते पर प्रभाव अगर दोनों के बीच लंबे समय तक लगातार अपमान, कटुता और दुश्मनी का माहौल बना रहे तो इसका असर भविष्य के रिश्ते पर भी पड़ सकता है। अगर बचपन में ही बहुत ज्यादा दूरियां बन जाएं तो कई बार एडल्ट होने के बाद भी वो दूरियां खत्म नहीं होती हैं। चाइल्ड साइकोलॉजी कहती है कि बचपन में भाई–बहन के बीच अगर सहयोग और विश्वास का रिश्ता हो तो आगे चलकर यह चीज उनके कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट स्किल को प्रभावित करता है। भाई-बहन के झगड़े में पेरेंट्स क्या करें? अगर झगड़ा छोटा है तो बच्चों को खुद उसे सुलझाने और ठीक करने का मौका देना चाहिए। लेकिन अगर- तो माता-पिता को हस्तक्षेप करना चाहिए। ध्यान रखें, हस्तक्षेप का मतलब फैसला सुनाना नहीं, बल्कि समाधान सिखाना है। इन संकेतों को गंभीरता से लें और ऐसा होने पर तुरंत पेरेंटल हस्तक्षेप करें– पेरेंट्स की कॉमन गलतियां कई माता-पिता अनजाने में कुछ ऐसी बातें कह देते हैं, जो झगड़े को और बढ़ा सकती हैं, जैसेकि- ऐसे वाक्य बच्चों को समस्या का हल नहीं सिखाते, बल्कि उन्हें एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बना सकते हैं। इसलिए अगर बच्चे झगड़ें तो कभी भी उनके बीच तुलना न करें। बच्चों की भावनाओं को समझें ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि बच्चों के बीच झगड़ा खिलौने, टीवी या कमरे को लेकर हुआ है, लेकिन असली वजह कुछ और होती है, जैसेकि- इसलिए सिर्फ व्यवहार नहीं, उसके पीछे की भावना को समझना जरूरी है। भाई-बहन का झगड़ा खत्म होने के बाद पेरेंट्स को कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए- भाई-बहन में अपनापन कैसे बढ़ाएं? इस समस्या को हल करने और बच्चों के बीच अपनापन बढ़ाने के लिए पेरेंट्स को ही समझदारी और मैच्योरिटी के साथ कुछ कदम उठाने होंगे। मैं यहां आपको 5 बुनियादी चीजें बता रही हूं। 1. तुलना पूरी तरह बंद करें 2. दोनों के साथ अलग-अलग समय बिताएं 3. टीमवर्क वाले काम दें बच्चों को ऐसे काम दें, जो दोनों साथ मिलकर करें, जैसेकि- जब बच्चे साथ मिलकर किसी लक्ष्य पर काम करते हैं तो उनके बीच सहयोग बढ़ता है। 4. विवाद सुलझाने की भाषा सिखाएं बच्चों को कॉन्फ्लिक्ट को सुलझाने वाली भाषा सिखाएं। उन्हें अपने इमोशंस को व्यक्त करने और अपनी भावनाओं को शब्द देने की कला सिखाएं। जैसेकि दूसरे पर आरोप लगाने की बजाय अपनी तकलीफ को कैसे एक्सप्रेस करना है। कुछ उदाहरण: ये न कहें: “तुम हमेशा मेरी चीजें छीन लेते हो।” इसकी जगह कहें: “मुझे बुरा लगा कि तुमने मेरी चीज बिना पूछे ले ली।” ये न कहें: “तुम कभी मेरी बात नहीं सुनते।” इसकी जगह कहें: “मुझे अच्छा लगेगा, अगर तुम मेरी बात पूरी सुनो।” ये न कहें: “तुम बहुत परेशान करते हो।” इसकी जगह कहें: “जब तुम ऐसा करते हो, तो मुझे गुस्सा आता है। हम इसे कैसे सुलझाएं?” ये न कहें: “तुमने मेरा गेम खराब कर दिया।” इसकी जगह कहें: “मुझे दुख हुआ कि मेरा गेम रुक गया। क्या हम फिर से शुरू कर सकते हैं?” यह इमोशनल कम्युनिकेशन की शुरुआत है। 5. सभी के लिए एक नियम बनाएं पूरे परिवार के साथ बैठकर कुछ नियम तय करें, जैसेकि- जब नियम पूरे परिवार के लिए हों, तो बच्चों को वे ज्यादा स्वीकार्य लगते हैं। बड़ा बच्चा किशोर है, इसलिए... कब एक्सपर्ट की मदद लें? अगर- तो चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट या फैमिली काउंसिलर से सलाह लेना उचित रहेगा। याद रखें भाई-बहनों के बीच मतभेद होना सामान्य है। लेकिन रिश्ते में सम्मान, भरोसा और सहयोग बनाए रखना सीखना भी उतना ही जरूरी है। माता-पिता का काम हर झगड़े का फैसला सुनाना नहीं, बल्कि बच्चों को यह सिखाना है कि असहमति के बावजूद एक-दूसरे की बात कैसे सुनी जाए, भावनाओं को कैसे व्यक्त किया जाए और समाधान कैसे खोजा जाए। ***************** ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा …………………. पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…

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श्रीलंका को सेमीफाइनल में हराने के साथ ही टीम इंडिया ने फाइनल का टिकट कटा लिया है. मतलब, अब भारतीय टीम गोल्ड मेडल मैच खेलेगी. Thu, 01 Oct 2026 12:32:26 +0530

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