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UP Election 2027: कन्नौज की किन सीटों पर जीत के लिए दम लगाएंगी पार्टियां, जानें क्या होगी रणनीति

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी तैयारियां तेज हो चुकी हैं। समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी समेत प्रमुख दल संगठन को मजबूत करने और विधानसभा स्तर पर समीकरण साधने में जुटे हैं। कन्नौज जिला इस चुनाव में खास राजनीतिक महत्व रखता है। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि कन्नौज समाजवादी पार्टी  का पारंपरिक राजनीतिक गढ़ माना जाता है, बल्कि 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां की तीनों सीटों पर भाजपा  ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदली और कन्नौज लोकसभा क्षेत्र की तीनों विधानसभा सीटों में सपा के अखिलेश यादव को बढ़त मिली। ऐसे में 2027 में इन तीन सीटों पर मुकाबला खास  तौर पर अहम रहेगा।

कन्नौज जिले में छिबरामऊ, तिर्वा और कन्नौज (एससी) तीन विधानसभा सीटें हैं। जिला प्रशासन की चुनाव संबंधी वेबसाइट पर भी इन्हीं तीन विधानसभा क्षेत्रों को सूचीबद्ध किया गया है।

2022 में भाजपा का प्रदर्शन 

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कन्नौज जिले की तीनों सीटों पर जीत दर्ज की थी। छिबरामऊ से अर्चना पांडेय, तिर्वा से कैलाश सिंह राजपूत और कन्नौज सदर (एससी) से असीम अरुण चुनाव विजयी हुए। छिबरामऊ में मुकाबला काफी करीबी रहा। भाजपा की अर्चना पांडेय को 1,24,773 वोट मिले, जबकि सपा के अरविंद सिंह यादव को 1,23,662 वोट मिले। 

दोनों के बीच सिर्फ 1,111 वोट का अंतर था। तिर्वा में भाजपा के कैलाश सिंह राजपूत ने सपा के अनिल कुमार  पाल को 4,608 वोट से हराया था। वहीं कन्नौज (एससी) सीट पर भाजपा के असीम अरुण ने सपा के अनिल कुमार दोहरे को 6,090 वोट से हारा। 2027 के लिए भाजपा के सामने 2022 में जीती तीनों सीटों को बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि सपा के लिए 2022 की हार के बाद इन सीटों पर वापसी का सवाल रहेगा।

छिबरामऊ: सबसे करीबी मुकाबले वाली सीट

कन्नौज की तीनों विधानसभा सीटों में छिबरामऊ 2027 के लिहाज से खास चर्चा में रहेगी। 2022 में भाजपा ने यह सीट केवल 1,111 वोट के अंतर से जीती थी। इस आंकड़े से साफ है कि यहां मुकाबला काफी करीबी था।
इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी विधानसभा क्षेत्र में सपा के अखिलेश यादव को 1,61,107 वोट मिले, वहीं भाजपा के सुब्रत पाठक को 1,09,631 वोट मिले। लोकसभा चुनाव में सपा को इस विधानसभा से 51,476  वोट की बढ़त मिली।

ऐसे में 2027 में दोनों प्रमुख दलों की रणनीति का एक बड़ा आधार बूथ स्तर पर मतदाताओं को अपने पक्ष में  बनाए रखना होगा। भाजपा के लिए 2022 की विधानसभा जीत और 2024 के लोकसभा परिणाम के बीच आए अंतर को समझना महत्वपूर्ण होगा। वहीं सपा 2024 में मिली बढ़त को विधानसभा चुनाव के लिए स्थायी समर्थन में बदलने की कोशिश कर सकती है। उम्मीदवार चयन भी यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 2022 में भाजपा और सपा के बीच वोटों का अंतर बहुत कम था, इसलिए प्रत्याशी की स्थानीय पकड़, संगठन की सक्रियता और मतदान के दिन बूथ प्रबंधन जैसे मुद्दे अहम रहेंगे।

तिर्वा: भाजपा की बढ़त, लेकिन 2024 ने बदला समीकरण

तिर्वा विधानसभा सीट पर 2022 में भाजपा के कैलाश सिंह राजपूत ने जीत हासिल की थी। उन्हें 1,06,089 वोट मिले थे, जबकि सपा के अनिल कुमार पाल को 1,01,481 वोट मिले। जीत का अंतर 4,608 वोट रहा था।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तिर्वा विधानसभा क्षेत्र में सपा के अखिलेश यादव को 1,27,185 वोट मिले और भाजपा के सुब्रत पाठक को 92,827 वोट। इस तरह सपा को यहां 34,358 वोट की बढ़त मिली।

2027 के चुनाव में दोनों दलों के लिए यह आंकड़ा महत्वपूर्ण रहेगा। भाजपा अपनी विधानसभा जीत के आधार पर संगठन और सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाने पर जोर दे सकती है। दूसरी ओर सपा 2024 में मिले समर्थन को आधार बनाकर विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों के साथ अपना अभियान आगे बढ़ा सकती है।

तिर्वा में ग्रामीण मतदाता, स्थानीय विकास, रोजगार, सड़क, कृषि और क्षेत्रीय समस्याएं चुनावी चर्चा का हिस्सा बन सकती हैं। हालांकि 2027 में वास्तविक मुद्दे और उम्मीदवारों की स्थिति चुनाव की घोषणा तथा टिकट वितरण के बाद ज्यादा स्पष्ट होगी।

कन्नौज सदर: एससी सीट पर भी होगी नजर

कन्नौज विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 2022 में यहां भाजपा के असीम अरुण ने 1,20,876 वोट हासिल किए थे। सपा के अनिल कुमार दोहरे को 1,14,786 वोट मिले। दोनों के बीच 6,090 वोट का अंतर था। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर भी सपा के अखिलेश यादव को बढ़त मिली। उन्हें 1,38,567 वोट मिले, जबकि भाजपा के सुब्रत पाठक को 1,04,323 वोट मिले। सपा की बढ़त 34,244 वोट रही।

इसलिए 2027 में भाजपा के लिए इस सीट पर 2022 की विधानसभा जीत को दोहराना एक प्रमुख संगठनात्मक चुनौती होगी। वहीं सपा लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को विधानसभा स्तर पर दोहराने की कोशिश कर सकती है। इस सीट पर अनुसूचित जाति मतदाताओं के साथ-साथ अन्य सामाजिक समूहों का समर्थन भी चुनावी समीकरण को प्रभावित करेगा। उम्मीदवार की सामाजिक स्वीकार्यता, स्थानीय संगठन और क्षेत्रीय मुद्दे परिणाम को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हो सकते हैं।

2027 में तीनों सीटों पर क्या होगी बड़ी रणनीति?

कन्नौज में भाजपा और सपा दोनों के लिए सबसे अहम चुनौती लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अलग-अलग मतदान पैटर्न को समझना होगी। 2022 में तीनों विधानसभा सीटें भाजपा के खाते में गईं, जबकि 2024 में तीनों सीटों पर अखिलेश यादव को बढ़त मिली। इन दो चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि मतदाताओं का चुनावी व्यवहार चुनाव के स्तर और राजनीतिक परिस्थितियों के साथ बदल सकता है।

भाजपा की रणनीति में संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना, स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करना, सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों को मुद्दा बनाना तथा उम्मीदवारों के चयन पर जोर शामिल हो सकता है। सितंबर 2026 में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी 2027 के लिए बड़े पैमाने पर नए चेहरों और ‘winnability’ यानी चुनावी क्षमता पर जोर देने की तैयारी कर रही है।

दूसरी तरफ सपा के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली तीनों विधानसभा क्षेत्रों की बढ़त को विधानसभा चुनाव तक बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। पार्टी की मौजूदा रणनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों को जोड़ने पर जोर दिखाई दे रहा है। हाल में अखिलेश यादव के PDA रथ अभियान और हर विधानसभा क्षेत्र में वोट बढ़ाने के लक्ष्य की रिपोर्टें सामने आई हैं।

इसके अलावा कांग्रेस और अन्य दलों की चुनावी स्थिति भी स्थानीय समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। सितंबर 2026 के अंत में सपा और कांग्रेस के बीच 2027 के लिए सीट बंटवारे को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। अभी अंतिम सीट समझौता स्पष्ट नहीं है, इसलिए कन्नौज में विपक्षी दलों की चुनावी व्यवस्था का अंतिम स्वरूप आगे तय होगा।

2027 में कन्नौज क्यों रहेगा खास?

कन्नौज का महत्व केवल तीन विधानसभा सीटों तक सीमित नहीं है। यह समाजवादी पार्टी के राजनीतिक इतिहास से जुड़ा प्रमुख क्षेत्र है और 2024 में अखिलेश यादव ने यहां से लोकसभा चुनाव जीतकर पार्टी के प्रभाव को फिर प्रदर्शित किया था। लोकसभा चुनाव में उन्हें कुल 6,42,292 वोट मिले और भाजपा के सुब्रत पाठक को 4,71,370 वोट मिले।

हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों के परिणामों की सीधी तुलना करते समय सावधानी जरूरी है। दोनों चुनावों में उम्मीदवार, मुद्दे और राजनीतिक माहौल अलग होते हैं। इसलिए 2024 की बढ़त को 2027 का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता। फिलहाल कन्नौज की तस्वीर यही बताती है कि छिबरामऊ, तिर्वा और कन्नौज सदर-तीनों सीटों पर मुकाबले के अलग-अलग आयाम हैं। छिबरामऊ में 2022 का बेहद कम जीत अंतर और 2024 की बड़ी सपा बढ़त खास ध्यान खींचती है। तिर्वा और कन्नौज सदर में भी 2022 की भाजपा जीत के बावजूद 2024 में सपा को उल्लेखनीय बढ़त मिली। ऐसे में 2027 में उम्मीदवार चयन, बूथ संगठन, सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे तीनों सीटों की चुनावी रणनीति के केंद्र में रहेंगे।

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