Delhi में सबसे गोल-मटोल कुत्ते के खिताब के लिए Gola और Gugu के बीच फाइनल मुकाबला
दिल्ली का सबसे अनोखा चुनाव अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है। दो ‘गोल-मटोल’ दावेदारों के समर्थकों ने सोशल मीडिया मंच पर मतदान से आगे बढ़कर कैफे में बने मतदान केंद्रों तक पहुंचकर अपने पसंदीदा कुत्ते को चुनने के लिए कतार लगाई। युवा, बुजुर्ग और इलाके के कुत्तों से प्रेम करने वाले लोगों ने दिवंगत गोला और गूगू के बीच चुनाव में मतदान किया।
‘निर्विवाद गोल-मटोल’ कुत्ता चुनने के लिए ऑफलाइन मतदान वसंत विहार, कमला नगर और पंजाबी बाग के कैफे में आयोजित किया गया। इससे यह पूरी तरह ऑनलाइन चल रही प्रतियोगिता एक सामान्य चुनावी प्रक्रिया जैसी नजर आई। लोगों ने कागजी मतपत्रों पर अपनी पसंद दर्ज की, उंगलियों पर स्याही लगवाई और कुछ मतदाताओं को मतदान के बाद स्टार स्टिकर भी मिले।
अंतिम मुकाबले में दो अलग-अलग स्वभाव वाले कुत्ते उम्मीदवार हैं -हौज खास का दिवंगत गोला, जिसे कबाब या राजपाल सिंह के नाम से भी जाना जाता है, और साकेत का गूगू। गोला की ओर से उसकी मृत्यु के बाद भी मुकाबला जारी है, जबकि गूगू ने बड़ी संख्या में ऑनलाइन समर्थक जुटाकर फाइनल में जगह बनाई है। प्रतियोगिता के दौरान गोला एक खास लोकप्रियता हासिल कर चुका है।
‘फैट डॉग्स ऑफ दिल्ली’ पेज के अनुसार, गोला के समर्थकों ने उसकी मौत के बाद भी उसके लिए प्रचार जारी रखा। उसने 69,638 वोटों से हीरो को हराकर फाइनल में प्रवेश किया। वहीं, गूगू का सफर भी काफी अनोखा रहा है।
भूरे और सफेद रंग के इस मिश्रित नस्ल के कुत्ते ने शहर के सबसे ‘गोल-मटोल’ कुत्ते के खिताब के लिए मुकाबला करते हुए अपना वजन कम करने पर भी काम किया है। पेज के अनुसार, गूगू ने तारा को 4,873 वोटों से हराकर फाइनल में जगह बनाई, जिससे अंतिम मुकाबला और दिलचस्प हो गया। ‘फैट डॉग्स ऑफ दिल्ली’ पेज पर 64 कुत्तों के साथ सोशल मीडिया से शुरू हुई यह प्रतियोगिता अब एक बड़े अभियान का रूप ले चुकी है।
समर्थकों ने पोस्टर बनाए, रील और मीम साझा किए तथा अपने-अपने इलाकों के कुत्तों के समर्थन में लोगों को जोड़ा। कमला नगर के एक कैफे में यह अभियान सोशल मीडिया मतदान के बजाय एक छोटे सामुदायिक आयोजन जैसा नजर आया। कतारों में ज्यादातर युवा मतदाता थे, लेकिन बुजुर्गों ने भी इसमें हिस्सा लिया, जिससे पता चला कि यह अनोखी प्रतियोगिता पीढ़ियों के अंतर को भी पार कर रही है।
कैफे में मतदान करने वाली श्रेया ने कहा, ‘‘यह माहौल खासा अच्छा है और कुत्तों के बीच चुनाव कराने का विचार बेहद अनोखा है।’’ इस प्रतियोगिता से जुड़ी तनीशा ने कहा कि इस उत्साह ने पशु कल्याण को लेकर एक नयी चर्चा शुरू कर दी है। तनीशा ने कहा, ‘‘यह शानदार है कि जेन-जी पशु कल्याण के समर्थन के लिए इतने अनोखे तरीके खोज रही है।’’ यह प्रतियोगिता 24 सितंबर को शुरू हुई थी, जब ‘फैट डॉग्स ऑफ दिल्ली’ पेज ने लोगों से अपने इलाकों के ‘गोल-मटोल’ कुत्तों को नामांकित करने के लिए कहा था। इसके बाद यह मुकाबला सार्वजनिक मतदान के आधार पर नॉकआउट दौर से गुजरता हुआ बुधवार को ग्रैंड फिनाले तक पहुंचा।
परिणाम बृहस्पतिवार को घोषित किए जाएंगे। एक अन्य मतदाता अमित ने कहा, ‘‘इस चुनाव को खास बनाने वाली बात यह है कि इसने लोगों का ध्यान उन कुत्तों की ओर आकर्षित किया है, जिन्हें वे रोज देखते हैं लेकिन अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। सामुदायिक कुत्ते हमारे इलाकों का हिस्सा हैं और इस तरह का ध्यान उनमें सहानुभूति बढ़ाने और उनकी देखभाल के लिए लोगों को प्रेरित करने में मदद कर सकता है।’’ बुजुर्ग मतदाता रूपा ने कहा कि इस प्रतियोगिता ने गैर सरकारी संगठनों और पशु कल्याण समूहों को लोगों से जुड़ने का नया अवसर भी दिया है।
Explainer: अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद इराक की सुरक्षा में क्या बदलाव आएगा? वॉशिंगटन का अब क्या रोल बचेगा
US forces: इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद देश की सुरक्षा व्यवस्था एक नए दौर में पहुंच गई है. दशकों तक चली विदेशी सैन्य मौजूदगी के बाद इराक अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी ज्यादा मजबूती से खुद संभालने की तैयारी कर रहा है. इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड द लेवेंट (ISIL) या इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड सीरिया (ISIS) के खिलाफ बने अंतरराष्ट्रीय गठबंधन का मिशन खत्म होने के साथ अमेरिकी सेना ने इराक में बचे अपने ठिकानों से भी वापसी कर ली है.
बगदाद इस मौके को 'संप्रभुता दिवस' के रूप में मना रहा है. 30 सितंबर से 3 अक्टूबर तक राष्ट्रीय अवकाश रखा गया है. हालांकि, अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद यह सवाल अहम हो गया है कि इराक अब अपनी सुरक्षा चुनौतियों से किस तरह निपटेगा.
30 सितंबर को क्या खत्म हुआ?
30 सितंबर को इराक से अमेरिकी सैनिकों की दो साल से चल रही चरणबद्ध वापसी पूरी हो गई. सितंबर 2024 में अमेरिका और इराक ने संयुक्त रूप से घोषणा की थी कि ISIL के खिलाफ बने अंतरराष्ट्रीय गठबंधन का मिशन दो चरणों में खत्म किया जाएगा. पहले चरण के तहत इराक के अंदर गठबंधन के सैन्य अभियान सितंबर 2025 तक खत्म किए जाने थे. इसके बाद दूसरे चरण में सितंबर 2026 तक सीरिया में ISIL के खिलाफ अभियानों को समर्थन दिया जाना था.
12 साल पहले शुरू हुआ था अभियान
अब अमेरिकी सैनिकों की अंतिम वापसी के साथ 2014 में शुरू हुआ अमेरिका का 12 साल लंबा सैन्य अभियान भी खत्म हो गया. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य इराकी सेना को आईएसआईएल के खिलाफ लड़ाई में मदद देना था. हाल के वर्षों में इराक में करीब 2,500 अमेरिकी सैनिक तैनात थे. इनकी मौजूदगी मुख्य रूप से उत्तरी इराक में रही. इससे पहले 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद 2007 में अमेरिकी सैनिकों की संख्या करीब 1.70 लाख तक पहुंच गई थी. 2011 में राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिकी सैनिकों को इराक से वापस बुला लिया गया था. लेकिन 2014 में आईएसआईएल के तेजी से बढ़ने के बाद अमेरिकी सैनिकों को फिर इराक बुलाया गया. इस बार उनकी भूमिका मुख्य रूप से इराकी सेना को ट्रेनिंग देने और हवाई सहायता उपलब्ध कराने की थी.
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अमेरिकी सेना अपने साथ क्या ले गई?
अमेरिका की वापसी सिर्फ सैनिकों तक सीमित नहीं है. कुछ महत्वपूर्ण सैन्य उपकरण और हवाई रक्षा प्रणालियां भी इराक से हटाई जा रही हैं. हाल के संघर्षों में एरबिल में तैनात अमेरिकी हवाई रक्षा प्रणालियों ने ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से बचाव में भूमिका निभाई थी. कुर्द सैन्य कमांडर सिरवान बरजानी ने रॉयटर्स को बताया कि अमेरिकी वापसी के बाद इराक को खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक सहायता और ड्रोन जैसी क्षमताओं की कमी महसूस हो सकती है. इसका असर इराक के अर्ध-स्वायत्त कुर्द क्षेत्र में ज्यादा महसूस किया जा सकता है. इस क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार (KRG) के पास है.
केआरजी के पेशमर्गा मामलों के मंत्रालय के मुताबिक, 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से कुर्द क्षेत्र में 1,000 से ज्यादा ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमले हो चुके हैं. केआरजी के प्रधानमंत्री मसूर बरजानी ने भी चिंता जताई है कि अगर कुर्दिस्तान क्षेत्र को पर्याप्त हवाई रक्षा प्रणाली नहीं मिलती है तो उसकी सुरक्षा चुनौती बढ़ सकती है. पिछले महीने उनके कार्यालय को भी ड्रोन हमले में निशाना बनाया गया था. अधिकारियों ने दावा किया था कि यह ड्रोन ईरान से लॉन्च किया गया था.
क्या इराक अब अपनी सुरक्षा खुद संभाल सकता है?
इराक सरकार का कहना है कि अमेरिकी वापसी से पहले ही सुरक्षा से जुड़े कई काम इराकी सेना को सौंपे जा चुके थे. इराकी वायु सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल खालिद अल-तमीमी ने बताया कि 2026 की शुरुआत से गठबंधन सेना ने इराक के अंदर कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की है. उनके मुताबिक, इराकी ड्रोन अब निगरानी के काम में गठबंधन के विमानों की जगह ले रहे हैं और इराकी वायु सेना रोजाना हवाई निगरानी कर रही है. उन्होंने यह भी बताया कि इराक अपने एफ-16 लड़ाकू विमानों को खुद संचालित और मेंटेन करने की क्षमता विकसित कर चुका है. उनके मुताबिक, इन विमानों ने बिना बाहरी मदद के लगातार 10 दिनों तक मिशन किए.
हालांकि, हवाई सुरक्षा अभी भी इराक के सामने बड़ी चुनौती है. सितंबर के मध्य में इराकी सैन्य प्रवक्ता सबाह अल-नुमान ने बताया था कि इराक दक्षिण कोरिया, तुर्की और अमेरिका से हवाई रक्षा प्रणालियां खरीदने के करीब है. इन प्रणालियों को इराकी हवाई क्षेत्र और कुर्दिस्तान क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैनात करने की योजना है.
क्या आईएसआईएल को इसका फायदा मिल सकता है?
आईएसआईएल अब उस स्थिति में नहीं है, जैसी करीब एक दशक पहले थी. उस समय समूह ने इराक के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था. लगातार सैन्य कार्रवाई के बाद उसकी ताकत काफी कम हो गई है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इराकी सुरक्षा बलों के लगातार दबाव के कारण आईएसआईएल फिलहाल अपनी सबसे कमजोर स्थिति में है और उसके पास कुछ सौ लड़ाके ही बचे हैं.
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने भी आईएसआईएल के खिलाफ 12 साल चले अभियान को सफल बताया और कहा कि अब सुरक्षा की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन से इराक के नेतृत्व वाली व्यवस्था को सौंप दी गई है. फिर भी इराक में आईएसआईएल के गुट पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं. इराकी सुरक्षा और सेना के अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि संगठन अमेरिकी सैनिकों की वापसी के दौरान हमले करने की योजना बना रहा था. इससे यह संकेत मिलता है कि आईएसआईएल अभी भी सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है.
इराक के दूसरे सशस्त्र समूहों का क्या होगा?
इराक में मौजूद कुछ गैर-सरकारी सशस्त्र समूह, खासकर ईरान से जुड़े मिलिशिया, अमेरिकी सैनिकों की वापसी को अपनी जीत के तौर पर देख रहे हैं. ईरान समर्थित समूहों के संगठन 'इराक में इस्लामी प्रतिरोध' के कमांडर अबू मोजतबा अल-यासिरी ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी इराकी सशस्त्र समूहों के लिए बड़ी जीत है. हालांकि, अमेरिकी सेना की वापसी का मतलब यह नहीं है कि ये समूह अपने हथियार छोड़ देंगे. इराक सरकार ने पहले 30 सितंबर को सभी सशस्त्र समूहों के लिए हथियार छोड़ने की समय सीमा तय की थी. लेकिन कई समूहों ने इसे मानने से इनकार कर दिया. इसके बाद बगदाद ने यह समय सीमा बढ़ाकर जून 2027 कर दी है.
अब इराक में अमेरिका की क्या भूमिका होगी?
अमेरिकी सैनिकों और सैन्य ठिकानों की वापसी का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका इराक के सुरक्षा मामलों से पूरी तरह अलग हो गया है. 2024 में अमेरिका और इराक के बीच हुए समझौते में सैन्य गठबंधन से द्विपक्षीय सुरक्षा संबंधों की ओर बढ़ने की बात कही गई थी. जुलाई 2024 में हुई सुरक्षा वार्ता में दोनों देशों ने संपर्क अधिकारियों, ट्रेनिंग और सुरक्षा सहयोग से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी.
इसके अलावा अमेरिका सैन्य सहायता, हथियारों की बिक्री और वित्तीय मदद के जरिए इराकी सुरक्षा बलों को मजबूत करने में भूमिका निभा सकता है. दोनों देशों ने अमेरिकी हथियारों और सैन्य उपकरणों के रखरखाव, सैन्य शिक्षा और ट्रेनिंग को जारी रखने के महत्व पर भी जोर दिया था.
सोमवार को इराक ने बगदाद एयरपोर्ट स्थित अमेरिकी मुख्यालय का नियंत्रण अपने हाथ में लिया. इराकी लेफ्टिनेंट जनरल साद मान ने कहा कि इसका मतलब अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ सुरक्षा सहयोग खत्म होना नहीं है. उनके मुताबिक, आगे का लक्ष्य आपसी सम्मान और इराक की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता पर आधारित संबंध बनाना है. इस तरह 30 सितंबर को अमेरिकी सैनिकों की वापसी को अमेरिका-इराक सुरक्षा संबंधों का अंत नहीं, बल्कि एक नए चरण की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है.
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