Old Door Frame Cleaning: बिना पेंट के पुरानी चौखट चमकेगी नई जैसी, नवरात्रि-दिवाली से पहलें ऐसे चमकाएं
Old Door Frame Cleaning: पुरानी चौखट को बिना पेंट कराए नई जैसी चमक दें! नवरात्रि-दिवाली से पहले जानें चौखट साफ करने के आसान घरेलू तरीके, जिद्दी दाग हटाने की ट्रिक्स और लकड़ी की चमक बरकरार रखने के जरूरी टिप्स।
राजाओं को लड़ने के लिए देवियों ने दी तलवारें, NCERT Book के नये अध्याय में भारतीय प्रतिरोध की कहानी ने बदल डाली तस्वीर!
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानि एनसीईआरटी एक बार फिर से सुर्खियों में है। दरअसल कक्षा नौ की सामाजिक विज्ञान पुस्तक ने भारतीय मध्यकालीन इतिहास को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। मंगलवार को जारी ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड—भाग दो’ में ‘रेजिस्टेंस एंड रेजिलिएंस’ यानी प्रतिरोध और दृढ़ता नामक अध्याय के जरिए सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में हुए लगातार आक्रमणों और उनके खिलाफ हुए प्रतिरोध को प्रमुखता दी गई है। पुस्तक में युद्ध और धार्मिक परंपराओं के संबंध का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सातवीं शताब्दी से अनेक राजा और राजकुमार संघर्ष के समय काली, दुर्गा, भवानी और शक्ति के अन्य रूपों को रक्षक के रूप में मानते थे।
सबसे चर्चित हिस्सा उन देवी-प्रदत्त तलवारों का है, जिनका उल्लेख पुस्तक ऐतिहासिक परंपराओं के संदर्भ में करती है। पुस्तक के अनुसार, बस्तर के शासक अन्नमरजा के बारे में मान्यता है कि उन्हें माणिक्यदेवी यानी दंतेश्वरी से तलवार प्राप्त हुई थी। इसी तरह विजयनगर के कुमार कम्पण के बारे में कहा गया है कि उन्होंने मदुरै में सल्तनत की सेनाओं के खिलाफ देवी से प्राप्त तलवार का इस्तेमाल किया। मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के बारे में भी पारंपरिक मान्यता का उल्लेख है कि उन्हें तुलजा भवानी से तलवार मिली थी।
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हम आपको बता दें कि पुस्तक मध्यकालीन भारत को केवल राजवंशों के उत्थान-पतन के रूप में नहीं, बल्कि आक्रमण, संघर्ष और प्रतिरोध के लंबे दौर के रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें कहा गया है कि सातवीं शताब्दी के बाद उपमहाद्वीप में लगातार आक्रमण हुए, जिनके पीछे क्षेत्रीय विस्तार के साथ धार्मिक उद्देश्य भी रहे। पुस्तक अरब, तुर्क, मुगल और यूरोपीय शक्तियों के खिलाफ भारतीय शासकों और समुदायों के प्रतिरोध को दर्ज करती है। राजपूतों, अहोमों, विजयनगर, मराठों, सिखों और जाटों के संघर्षों को भी इसमें स्थान दिया गया है।
अध्याय में यह भी कहा गया है कि भारतीय समाज ने बाहरी चुनौतियों का सामना केवल सैन्य स्तर पर नहीं किया, बल्कि अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को भी बनाए रखा। महाराणा प्रताप का अकबर के खिलाफ संघर्ष, अहोमों द्वारा मुगल विस्तार का प्रतिरोध और सरायघाट का युद्ध, विजयनगर की भूमिका तथा मराठों की स्वराज्य की अवधारणा को इसी संदर्भ में रखा गया है। हालांकि पुस्तक में मुगलों के साथ कछवाहों जैसे कुछ राजपूत समूहों के सहयोग का भी उल्लेख है, लेकिन समग्र प्रस्तुति में प्रतिरोध को अपेक्षाकृत अधिक प्रमुखता मिली है।
वहीं सिख इतिहास के हिस्से में मुगल शासन के दौरान गुरु अर्जन देव, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोबिंद सिंह से जुड़े संघर्ष और बलिदान का उल्लेख करते हुए पुस्तक मुगल राज्य की सिख गुरुओं के प्रति क्रूरता को इतिहास में दुर्लभ उदाहरणों वाला बताती है। मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण, काशी विश्वनाथ मंदिर, भक्ति परंपरा और सूफी परंपरा का भी अध्याय में उल्लेख है।
इस पूरी तस्वीर के बीच एनसीईआरटी प्रमुख दिनेश सकलानी ने कहा है कि माध्यमिक स्तर पर सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई का उद्देश्य विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक क्षमता, आलोचनात्मक जिज्ञासा, संवाद की क्षमता और विभिन्न संस्कृतियों को समझने की क्षमता विकसित करना है। उनके अनुसार, नई पुस्तक इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। देखा जाये तो नई किताब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल इतिहास के कुछ नए प्रसंग नहीं जोड़ती, बल्कि विद्यार्थियों के सामने मध्यकालीन भारत को देखने का एक अलग ढांचा रखती है, जहां आक्रमण के साथ प्रतिरोध, युद्ध के साथ आस्था और सत्ता के साथ सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई को केंद्रीय स्थान दिया गया है।
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