Explainer: कौन हैं धनराज नथवानी और क्यों दांव पर लगा रही सपा? क्या है अखिलेश की रणनीति
Explainer: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा चुनाव ने नई हलचल पैदा कर दी है. समाजवादी पार्टी ने यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के लिए अपने दो उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव और गुजरात के कारोबारी एवं रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े धनराज परिमल नथवानी. नथवानी का नाम सामने आते ही सियासी चर्चा तेज हो गई , क्योंकि वह सपा के पारंपरिक राजनीतिक चेहरे नहीं है.
धनराज नथवानी की पहचान राजनीति से ज्यादा कॉरपोरेट और खेल प्रशासन से रही है. ऐसे में सवाल है कि अखिलेश यादव ने उ्हें यूपी से राज्यसभा भेजने का फैसला क्यों किया? क्या इसके पीछे सिर्फ राज्यसभा का गणित है या 2027 की बड़ी राजनीतिक रणनीति भी?
कौन हैं धनराज परिमल नथवानी?
धनराज परिमल नथवानी गुजरात से आते हैं और रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े वरिष्ठ कॉरपोरेट अधिकारी हैं. वे राज्यसभा सांसद परिमल थवानी के बेटे हैं. परिमल नथवानी लंबे समय से रिलायंस समूह से जुड़े रहे हैं और कॉरपोरेट अफेयर्स से संबंधित जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं. जून 2026 में वे झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए.
धनराज की अपनी पहचान भी सिर्फ पारिवारिक पृष्ठभमि तक सीमित नहीं है. इन्होंने कॉरपोरेट क्षेत्र में काम करने के साथ-साथ खेल प्रशासन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं.
क्रिकेट से भी रहा है गहरा जुड़ाव
धनराज नथवानी का नाम गुजरात क्रिकेट से भी जुड़ा रहा है. नवंबर 2022 में उन्हें गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन यानी GCA का अध्यक्ष चुना गया है. इससे पहले वे एसोसिएशन में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके थे.
GCA अध्यक्ष बनने के बाद उनका नाम नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम के विकास से भी जुड़ा. उस समय भारतीय क्रिकेट प्रशासन में गुजरात का महत्व लगातार बढ़ रहा था. नथवानी का खेल प्रशासन में अनुभव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्यसभा में उनकी संभावित भूमिका सिर्फ राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि खेल और कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़े विषयों पर भी उनकी विशेषज्ञता सामने आ सकती है.
सपा ने अचानक नथवानी पर क्यों लगाया दांव?
सबसे बड़ा सवाल यही है जो राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर समाजवादी पार्टी ने नथवानी पर क्यों दांव लगाया. आखिर इसके पीछे अखिलेश यादव की क्या रणनीति है. यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू है.
धनराज नथवानी सपा के संगठन में सक्रिय नेता के तौर पर नजर नहीं आते और ही उनकी राजनीतिक
पहचान उत्तर प्रदेश से जुड़ी रही है. इसके बावजूद अखिलेश यादव ने उन्हें उम्ममीदवार बनाया.
इसके लेकर कई तरह की राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ रही हैं. भारतीय एक्सप्रेस ने नथवानी की उम्मीदवारी को सपा की पारंपरिक पसंद से अलग बताते हुए उनके कॉरपोरेट बैकग्राउंड और यूपी से सीमित राजनीतिक जुड़ाव की ओर ध्यान दिलाया है.
दूसरी तरफ, मीडिया रिपोर्टों में उनकी उम्मीदवारी को कॉरपोरेट और नए सामाजिक-व्यावसायिक वर्गों तक पहुंच बढ़ाने की संभावित रणनीति से भी जोड़कर देखा गया है. हालांकि सपा की ओर से अभी ऐसा कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है कि नथवानी को चुनने के पीछे कौन-से विशेष राजनीतिक या संगठनात्मक कारण रहे.
इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनकी उम्मीदवारी के पीछे निश्चित तौर पर कोई एक खास राजनीतिक सौदा या रणनीति है. इतना जरूर है कि यह फैसला सपा के सामान्य उम्मीदवार चयन से अलग दिखाई देता
है.
असली कहानी राज्यसभा के गणित में छिपी है
यूपी में राज्यसभा की 10 सीट के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है. चुनाव में जनता सीधे वोट नहीं देती है. यहां यूपी विधानसभा के निर्वाचित विधायक मतदान करते हैं और सिंगल ट्रांसफरेबल वोट प्रणाली के तहत एक सीट के लिए मौजूद गणित में 37 प्रथम वरीयता वोट का कोटा बनता है.
यूपी विधानसभा का क्या है गणित
बता दें कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस समय 396-397 के आसपास प्रभावी विधायक संख्या बताई जा रही है, अलग-अलग रिपोर्टों में रिक्त सीटों की संख्या को लेकर तारीख के हिसाब से अंतर है. मौजूदा राजनीतिक संख्या बल में सपा-कांग्रेस खेमे के पास दो राज्यसभा सीटें निकालने के लिए पर्याप्त समर्थन माना जा रहा है.
यही कारण है कि रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी की उम्मीदवारी का गणित अपेक्षाकृत स्पष्ट है. लेकिन असली दिलचस्पी इस बात में है कि क्या समाजवादी पार्टी तीसरा उम्मीदवार भी उतारेगी?
तीसरे उम्मीदवार पर क्यों बढ़ी नजर?
30 सितंबर तक सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक सपा दो प्रत्याशियों रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी का नाम घोषित कर चुकी है. पार्टी तीसरे प्रत्याशी को लेकर विचार कर रही है, लेकिन उस समय तक नाम घोषित नहीं किया गया था.
दरअसल सपा के पास अपने दो प्रत्याशियों को जिताने के बाद कुछ एक्स्ट्रा वोट बचते हैं. तीसरी सीट के लिए उसे और ज्यादा विधायकों की जरूरत होगी. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी और उसके सहयोगियों के पास अपनी सीटों के बाद एक्सट्रा वोट बचने की स्थिति है और आठवीं सीट के लिए ज्यादा समर्थन जुटाने की कोशिश की चर्चा है.
यही वह जगह है जहां क्रॉस-वोटिंग और निर्दलीय विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. राज्यसभा चुनाव में विधायक उम्मीदवारों को वरीयता के आधार पर वोट देते हैं. इसलिए संख्या बल से बाहर की सीट के लिए पार्टियों को अतिरिक्त समर्थन जुटाना पड़ता है.
क्या बीजेपी के विधायक टूटेंगे?
यह सवाल अभी राजनीतिक अटकल के दायरे में है. केवल सपा की ओर से तीसरा उम्मीदवार उतारने की तैयारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बीजेपी के विधायक निश्चित रूप से क्रॉस-वोटिंग करेंगे.
हालांकि गणित बताता है कि यदि मुकाबला 10वीं सीट पर पहुंचता है तो दोनों खेमों को अपने अतिरिक्त वोटों के साथ दूसरे दलों या स्वतंत्र विधायकों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करनी होगी. मौजूदा रिपोर्टों में भी 10वीं सीट को सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी सीट बताया गया है.
16 अक्टूबर को होगा फैसला
चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान होगा और शाम 5 बजे मतगणना शुरू होगी. नामांकन की अंति तारीख 6 अक्टूबर, नामांकन पत्रों की जांच 7 अक्टूबर और नाम वापसी की अंतिम तारीख 9 अक्टूबर है.
इस चुनाव में धनराज नथवानी की उम्मीदवारी इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ एक चेहरे का राज्यसभा प्रवेश नहीं है. यह सपा के प्रत्याशी चयन और उसके संभावित विस्तार की दिशा का भी संकेत देती है. वहीं, तीसरे उम्मीदवार का फैसला और उसके बाद बनने वाला वोटों का समीकरण तय करेगा कि मुकाबला केवल संख्या बल तक सीमित रहता है या 2027 से पहले यूपी की राजनीति में क्रॉस-वोटिंग और नए राजनीतिक समीकरणों की एक और कहानी लिखी जाती है.
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