ये 4 बड़ी IT कंपनियां बांटेंगी डिविडेंड, जानें रिकॉर्ड डेट और किसे मिलेगा मुनाफा
List of Upcoming Dividend Stocks in October: अक्टूबर का महीना वह समय है जब भारत की बड़ी IT कंपनियां सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करना शुरू करती हैं. इस बार निवेशक न केवल नतीजों पर बल्कि इन नतीजों के साथ आने वाले डिविडेंड के ऐलान पर भी नजर रखेंगे. डिविडेंड तभी मायने रखता है जब आपके पास पहले से शेयर हों, या आप रिकॉर्ड डेट से पहले उन्हें खरीदने पर विचार कर रहे हों. यहां हम उन कंपनियों पर नजर डाल रहे हैं जिनके डिविडेंड के फैसले अभी आने बाकी हैं, और यह भी देखेंगे कि उन्होंने पहले कितना डिविडेंड दिया था और इसके पीछे कंपनी की वित्तीय स्थिति कैसी रही है. एक और बात, 5 में से 3 कंपनियों के डिविडेंड की रकम अभी तय नहीं हुई है. यह फैसला संबंधित बोर्ड मीटिंग के दौरान ही लिया जाएगा. जहां अक्टूबर में होने वाले भुगतान का ऐलान नहीं किया गया है, वहां हमने जानकारी के लिए पिछले समान डिविडेंड का जिक्र किया है.
1. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS)
रेवेन्यू के मामले में TCS भारत की सबसे बड़ी IT सर्विसेज कंपनी है. इसके बोर्ड की बैठक 8 अक्टूबर को होनी है, जिसमें 30 सितंबर, 2026 को समाप्त होने वाली तिमाही और छमाही के नतीजों को मंजूरी दी जाएगी. इस दौरान, वित्तीय वर्ष के दूसरे अंतरिम डिविडेंड पर भी विचार किया जाएगा. रिकॉर्ड डेट 14 अक्टूबर 2026 तय की गई है. कंपनी ने अभी तक डिविडेंड की रकम का ऐलान नहीं किया है. इससे पहले, जुलाई में दिया गया अंतरिम डिविडेंड ₹12 प्रति शेयर था. TCS ऐतिहासिक रूप से कैश बनाने वाला मजबूत बिजनेस रहा है. इसका 3 साल का रिटर्न ऑन इक्विटी लगभग 52% है, जबकि पेआउट रेशियो लगभग 78% है. लगभग ₹2,100 की शेयर कीमत पर, डिविडेंड यील्ड लगभग 3% है.
फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि आगे कमाई कैसी होगी. TCS ने जून तिमाही के मुनाफे में 2.7% की गिरावट की जानकारी दी है, जिससे मुनाफा ₹13,349 करोड़ (₹133.5 अरब) हो गया है. इस साल अब तक इसके शेयर में भी लगभग 35% की गिरावट आई है. IT खर्च पर दबाव बना हुआ है, खासकर उन प्रोजेक्ट्स पर जो जरूरी नहीं हैं (discretionary projects). इसके अलावा, AI को लेकर एक बड़ा लॉन्ग-टर्म सवाल भी है कि यह पारंपरिक बिल-योग्य काम (billable work) की कितनी जगह ले लेगा. डिविडेंड इन्वेस्टर्स के लिए सिर्फ पेआउट ही सब कुछ नहीं है. यह भी उतना ही जरूरी है कि कंपनी लगातार कैश बनाती रहे और कंपनी कमाई बढ़ाती रहे.
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2. HCL टेक्नोलॉजीज
HCL टेक्नोलॉजीज की बोर्ड मीटिंग TCS के चार दिन बाद, 12 अक्टूबर को होगी. कंपनी सितंबर तिमाही के नतीजों के साथ-साथ इस साल के अपने तीसरे अंतरिम डिविडेंड (interim dividend) पर भी विचार करेगी. कंपनी पहले ही अप्रैल में ₹24 प्रति शेयर और जुलाई में ₹12 प्रति शेयर का भुगतान कर चुकी है. अक्टूबर के डिविडेंड के लिए रिकॉर्ड डेट अभी घोषित नहीं की गई है. कंपनी लगभग कर्जमुक्त है और लगातार 7 सालों से अपना डिविडेंड बढ़ा रही है. एक दिलचस्प आंकड़ा जरूर ध्यान देने लायक है. इसका पेआउट रेशियो लगभग 91% है. पहली नजर में यह आंकड़ा ज्यादा लग सकता है. लेकिन एसेट-लाइट IT सर्विस कंपनी के मामले में, इसे सही नजरिए से देखना जरूरी है.
HCL टेक्नोलॉजीज को फैक्टरियों या फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च नहीं करना पड़ता है. अगर कोई बिजनेस अपनी जरूरत से ज्यादा कैश बना रहा है, तो उसका एक बड़ा हिस्सा शेयरहोल्डर्स को वापस करना कोई असामान्य बात नहीं है. असली मुद्दा ग्रोथ का है. HCL टेक्नोलॉजीज ने पिछले 3 सालों में लगभग 11.5% की सेल्स ग्रोथ दिखाई है. लगभग ₹3.4 लाख करोड़ के मार्केट कैप पर, यह स्टॉक अभी लगभग 4.3% की डिविडेंड यील्ड दे रहा है. इसका मतलब है कि ज्यादा पेआउट रेशियो जरूरी नहीं कि कोई समस्या हो. असली सवाल यह है कि क्या आगे भी कंपनी की कमाई बढ़ती रह सकती है?
3. इंफोसिस (Infosys)
अक्टूबर में नतीजे जारी करने वाली भारत की 3 बड़ी IT कंपनियों में इंफोसिस आखिरी होगी. इसकी बोर्ड मीटिंग 23 अक्टूबर को तय है, जिसमें फाइनेंशियल ईयर के पहले अंतरिम डिविडेंड पर विचार किया जाएगा. पिछले 12 महीनों में, इंफोसिस ने प्रति शेयर ₹48 का डिविडेंड दिया है और शेयर बायबैक भी किया है. कंपनी का 3 साल का रिटर्न ऑन इक्विटी लगभग 31% है और पेआउट रेशियो लगभग 68.5% है. यह कर्ज-मुक्त है, जबकि वर्किंग कैपिटल डेज 42 से बेहतर होकर 32.7 हो गए हैं. यह सुधार ध्यान देने लायक है. वर्किंग कैपिटल डेज कम होने का मतलब आमतौर पर यह होता है कि कंपनी कामकाज से कैश को ज्यादा कुशलता से बदल पा रही है.
निकट भविष्य के लिए कामकाज की स्थिति उतनी उत्साहजनक नहीं है. इंफोसिस ने अपने FY27 के लिए कॉन्स्टेंट-करेंसी रेवेन्यू ग्रोथ गाइडेंस के ऊपरी स्तर को पहले के 3.5% से घटाकर 3% कर दिया है. इसका ऑपरेटिंग मार्जिन गाइडेंस 20-22% पर बना हुआ है. कंपनी का मार्केट कैप लगभग ₹4.1 लाख करोड़ है और स्टॉक अभी लगभग 4.7% यील्ड दे रहा है. इसलिए, भले ही इसकी डिविडेंड यील्ड कुछ दूसरी बड़ी IT कंपनियों की तुलना में आकर्षक लग रही हो, फिर भी निवेशकों को ग्रोथ आउटलुक पर नजर रखनी होगी.
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4. CRISIL
CRISIL इस IT-हैवी लिस्ट में थोड़ी विविधता लाती है. यह रेटिंग्स और रिसर्च कंपनी है, जिसमें बहुमत हिस्सेदारी S&P Global की है, और यह भारत के अप्रैल-मार्च फाइनेंशियल ईयर की बजाय कैलेंडर ईयर फॉलो करती है. अभी तक अक्टूबर डिविडेंड की कोई डेट घोषित नहीं हुई है. लेकिन एक पैटर्न जरूर ध्यान देने लायक है. CRISIL पिछले 3 सालों से अपनी सितंबर तिमाही नतीजों के साथ तीसरे अंतरिम डिविडेंड का ऐलान करती आई है. 2025 में डिविडेंड ₹16 प्रति शेयर था और इसका ऐलान 17 अक्टूबर को हुआ था. एक साल पहले पेआउट ₹15 था. इस साल की शुरुआत में कंपनी ने अप्रैल में ₹9 प्रति शेयर और जुलाई में ₹10 प्रति शेयर का भुगतान किया.
कंपनी ने जून तिमाही में प्रॉफिट बिफोर टैक्स में 24% की बढ़ोतरी दर्ज की, जो ₹2.8 अरब पर पहुंच गया. इसके पास करीब ₹13.7 अरब की नेट कैश पोजिशन भी थी. इसका 3-साल का रिटर्न ऑन इक्विटी करीब 30% के करीब है, हालांकि यह दो साल पहले देखे गए मिड-30% लेवल से थोड़ा घटा है. करीब 1.3% की डिविडेंड यील्ड इस लिस्ट की IT कंपनियों के मुकाबले काफी कम है. इसकी एक वजह सिर्फ वैल्यूएशन है. स्टॉक करीब ₹4,800 प्रति शेयर के भाव पर ट्रेड करता है. ऐतिहासिक रूप से CRISIL का पेआउट रेशियो 51-67% के बीच रहा है. इससे कंपनी के पास डिविडेंड देने के बाद भी अपनी कमाई का एक अच्छा हिस्सा बिजनेस में दोबारा निवेश करने के लिए बच जाता है.
5. Wipro
कंपनी द्वारा जारी किए गए फाइनेंशियल कैलेंडर के मुताबिक, विप्रो अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में अपने सितंबर तिमाही नतीजे जारी कर सकती है. इन नतीजों के साथ अगला क्वार्टरली डिविडेंड का फैसला भी आना चाहिए. Wipro ने जुलाई में ₹2 प्रति शेयर का भुगतान किया था. इस पेआउट की रिकॉर्ड डेट 27 जुलाई थी, वहीं कंपनी का डिविडेंड पेआउट रेशियो करीब 47% है. क्वार्टरली डिविडेंड पॉलिसी अपनाने के बाद से यह हर तिमाही डिविडेंड देती आ रही है. लेकिन डिविडेंड यील्ड को बिजनेस में हो रहे बदलावों के साथ ही देखना जरूरी है.
विप्रो के शेयर इस साल अब तक करीब 30% गिर चुके हैं. कंपनी 30 सितंबर से निफ्टी 50 से बाहर भी हो जाएगी, जिसकी जगह BSE लेगी. यह बदलाव विप्रो के रिलेटिव फ्री-फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन से जुड़ा है, न कि किसी एक तिमाही के नतीजों से. फिर भी बड़े आंकड़े ध्यान देने लायक हैं. विप्रो का रिटर्न ऑन इक्विटी करीब 15% है, जो TCS और Infosys के मुकाबले काफी कम है. डिविडेंड स्टॉक्स देखने वाले निवेशकों के लिए यह फर्क मायने रखता है, क्योंकि ऊपर से देखने पर एक ऊंचा पेआउट आकर्षक लग सकता है, जबकि अंडरलाइंग बिजनेस उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा होता.
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Desclaimer: यह जानकारी अलग-अलग एनालिस्ट और ब्रोकरेज फर्मों की राय पर आधारित है. इसे निवेश की सलाह न माना जाए. शेयर बाजार में निवेश जोखिम भरा होता है, इसलिए निवेश करने से पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह जरूर लें.
Uncovered With Manoj Gairola: यूपी में अखिलेश यादव को क्यों आंख दिखा रही कांग्रेस? क्या है दोनों के बीच विवाद की वजह
Uncovered With Manoj Gairola: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब सिर्फ चार-पांच महीने का समय बचा है. सभी राजनीतिक दलों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं. ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्षी दल भी अपने-अपने सहयोगियों के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चा करने लगे हैं. ऐसे में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच तनातनी शुरू हो गई है. क्योंकि यूपी में दोनों के बीच गठबंधन को लेकर कांग्रेस के नेता जिस तरह से बयान दे रहे हैं. उसका जवाब अखिलेश यादव ने रायबरेली से अपनी पीडीए रथ यात्रा शुरू करके दिया.
कांग्रेस को क्या मैसेज देना चाहते हैं अखिलेश?
दरअसल, अखिलेश यादव कांग्रेस को यह मैसेज देना चाहते हैं कि यूपी में योगी के खिलाफ सबसे बड़े नेता वही है. वहीं कांग्रेस का कहना है कि पीडीए यात्रा योगी के खिलाफ कम और कांग्रेस के खिलाफ ज्यादा है. वैसे पिछले कुछ दिनों से सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी की इकरा हसन के बीच भी जुबानी जंग चल रही है. दोनों ही पश्चिम यूपी में मुसलमानों के बड़े चेहरे हैं.
मुस्लिम इलाकों में ज्यादा सीटें चाहती है कांग्रेस
दरअसल कांग्रेस और सपा दोनों ही मुस्लिम बहुल इलाकों में ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती हैं क्योंकि यह योगी के खिलाफ सेफ सीटें हैं और यह दोनों के बीच सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. बता दें कि यूपी में मुस्लिम वोट बैंक को समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक माना जाता है, लेकिन अब इस पर कांग्रेस ने भी दावा करना शुरू कर दिया है. यूपी में समाजवादी पार्टी और मुस्लिम वोटर्स का रिश्ता कितना मजबूत है उसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा.
आजादी के बाद से कांग्रेस के पारंपरिक वोटर रहे मुस्लिम
दरअसल आजादी के बाद मुसलमान कांग्रेस के ट्रेडिशनल वोटर बन गए. ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित समीकरण के चलते कांग्रेस ने लंबे वक्त तक यूपी में शासन किया. लेकिन जब यूपी में राम मंदिर आंदोलन ने जोर पकड़ा तब परिस्थितियां बदलने लगी. 1990 में मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे. अयोध्या में कार सेवा हो रही थी और बाबरी ढांचे को बचाने के लिए पुलिस ने कार सेवकों पर गोलियां चला दी. इसमें काफी कार सेवक मारे गए. इस घटना के बाद मुलायम सिंह यादव ने खुद को मुसलमानों के रहनुमा के तौर पर पेश किया और मुस्लिम वोटर समाजवादी पार्टी की तरफ आने लगे.
90 के दशक में ओबीसी के बड़े नेता बन गए मुलायम सिंह
यह वही दौर था जब देश में मंडल कमीशन लागू कर दिया गया. ओबीसी जातियां गोलबंद हुई और मुलायम सिंह यादव एक बड़े ओबीसी नेता बन गए. इस तरह मुस्लिम और यादवों का एक ऐसा समीकरण बन गया जो कि सत्ता की चाबी था. 1990 से लेकर अब तक यूपी में एक दो अफवादों को छोड़कर मुसलमान हमेशा समाजवादी पार्टी के साथ रहे. उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोटर्स की कितनी हैसियत है? यह हम इन आंकड़ों से समझ सकते हैं.
इन जिलों में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी
2011 की जनगणना के अनुसार यूपी में मुसलमानों की संख्या 19.26 फीसदी है. लेकिन कुछ जिलों में इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि हार जीत का फैसला इन्हीं के वोट से होता है. यह जिले हैं रामपुर में 50.57 प्रतिशत, मुरादाबाद में 50.80 फीसदी, बिजनौर में 43.04%, सहारनपुर में 41.95% मुजफ्फरनगर में 41%, अमरोहा में 40.78% और संभल 40 फीसदी मुस्लिम हैं. इसके अलावा बरेली में 34.54 प्रतिशत और मेरठ में 34.40 फीसदी मुस्लिम हैं. यह तो बात हो गई पश्चिम यूपी की. अगर हम पूर्वांचल को देखें और तराई में मुस्लिम बहुल जिले हैं. इनमें बलरामपुर में 37.51% श्रावस्ती में 30.79% बहराइच 33.53% और सिद्धार्थ नगर में 29.23% मुस्लिम हैं.
इसके अलावा कई जिले ऐसे हैं जहां कि अगर मुस्लिम्स की संख्या थोड़ी कम है तो वहां वहां यादव उस कमी को पूरा कर देते हैं. इस तरह मुस्लिम यादव समीकरण एक तगड़ा विनिंग कॉम्बिनेशन बन जाता है. जैसे कि आजमगढ़ जहां मुसलमान 15% के करीब है. लेकिन यादवों की संख्या करीब 25% है. इसलिए आजमगढ़ समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत किला बन गया है. यानी अब आप समझ गए होंगे कि यूपी में मुसलमान कितनी बड़ी चुनावी ताकत है. और यह ताकत कमोबेश अभी तक अखिलेश यादव के ही साथ थी. लेकिन अब कांग्रेस भी मजबूती के साथ मुस्लिम वोटर पर दावेदारी ठोक रही और इसमें सेंध लगाने के लिए हैदराबाद से ओवैसी आ गए हैं.
पिछले दो चुनावों में ओवैसी को नकार चुके हैं यूपी के मुस्लिम वोटर
ओवैसी ने यूपी में पिछले दो विधानसभा चुनाव भी लड़े लेकिन मुसलमानों ने उन्हें सीरियसली नहीं लिया. उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली. लेकिन इस बार ओवैसी की रणनीति अलग है. वो मुसलमानों के जेहन में यह बात बिठा देना चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी में मुसलमानों की हैसियत सिर्फ दरी बिछाने की है और सारी मलाईदार पोस्ट यादवों के लिए हैं. अगर इसमें वह थोड़े भी कामयाब हो गए तो मुसलमान समाजवादी पार्टी के अलावा दूसरे विकल्प के बारे में सोच सकते हैं.
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस को मिली बंपर जीत
यह बात अखिलेश भी समझ रहे हैं और कांग्रेस भी. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने 2024 का लोकसभा चुनाव एक साथ लड़ा और उन्हें बंपर जीत भी मिली. कांग्रेस का मानना है कि मुस्लिम और दलित वोट राहुल गांधी की वजह से गठबंधन के हिस्से में आया. जबकि अखिलेश इसे अपने पीडीएफ फार्मूले का नतीजा मानते हैं. अब कांग्रेस अखिलेश को यह जताना चाहती है कि मुसलमान वोटर्स पर समाजवादी पार्टी का एकाधिकार नहीं है.
ओवैसी की पार्टी छोड़ कांग्रेस में आए असीम वकार
हाल ही में कांग्रेस ने यूपी में ओवैसी की पार्टी के असीम वकार को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया. वो ओवैसी की पार्टी का चेहरा थे. अब कांग्रेस चाहती है कि यूपी चुनाव के लिए जल्द से जल्द गठबंधन का एलान हो और उसे 125 के करीब सीटें मिले और वह ऐसी सीट हो जहां जीतने के चांस ज्यादा हो और इनमें भी मुस्लिम बहुल सीटें ज्यादा हो. शायद अखिलेश यादव पर दबाव बनाने की जिम्मेवारी राहुल ने इमरान मसूद को दे दी.
इमरान मसूद और इकरा हसन के बीच जुबानी जंग
शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब कांग्रेस की तरफ से इमरान मसूद अखिलेश यादव पर अटैक ना करते. अखिलेश ने भी कैराना से समाजवादी पार्टी सांसद इकरा हसन को जवाब देने के लिए मैदान पर उतार दिया. हाल ही में दोनों के बीच जमकर बयानबाजी हुई. और फिर असीम वकार भी इसमें कूद पड़े. अखिलेश यादव ने भी अपने मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करना शुरू कर दिया.
एक तरफ तो उन्होंने विधान परिषद में मोहम्मद जासमीर अंसारी को नेता विपक्ष बना दिया ताकि मुसलमानों से दरी बिछवाने का इल्जाम हल्का पड़ जाए. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस को जवाब देने के लिए अपनी पीडीए रथ यात्रा रायबरेली से शुरू की. वो रायबरेली जो यूपी
में कांग्रेस का इकलौता गढ़ है और जहां के सांसद खुद राहुल गांधी हैं.
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