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शाकाहारी कबाब का राजा! घर पर बनाएं क्रिस्पी सोया कबाब, नॉनवेज वाले भी मांगेंगे बार-बार, जानें रेसिपी

Darbhanga Soya Kebab Recipe : दरभंगा में सोया कबाब शाकाहारी लोगों की पसंदीदा डिश बन गई है. इसमें सोयाबीन, प्याज, टमाटर और मसाले मिलाकर स्वादिष्ट और पौष्टिक कबाब तैयार किए जाते हैं. आइये जानते हैं इसकी रेसिपी के बारे में.

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कच्छ में हुई थी 185 बच्चों, 20 टीचर्स की मौत:गणतंत्र दिवस की परेड निकाल रहे थे, तभी उन पर ढह गईं इमारतें

घटना 26 जनवरी 2001 की ही है। गुजरात में कच्छ के अंजार शहर में 20 स्कूलों के बच्चों की गणतंत्र दिवस की परेड निकल रही थी। बच्चे यूनिफॉर्म पहने, हाथों में तिरंगे लेकर भारत माता की जय के नारों के साथ आगे बढ़ रहे थे। टीचर्स सभी को लाइन में चलने की हिदायत दे रहे थे। नगरपालिका की 18 स्कूलों और 2 कन्या विद्यालयों, यानी कुल 20 स्कूलों के बच्चे और टीचर्स इस परेड का हिस्सा थे। रैली को टाउन हॉल तक जाना था। परेड संकरे रास्तों वाले खत्री चौक पहुंची ही थी कि तभी सुबह 8.40 बजे धरती कांप उठी। आसपास दो-तीन मंजिला इमारतें थीं। बच्चे-टीचर्स कुछ समझ पाते कि इससे पहले ही एक-के-बाद-एक इमारतें भरभराकर उन पर ढह गईं। इस भयानक आपदा में 185 बच्चों और 20 टीचर्स की मौत हो गई थी। परेड में मौजूद कुछ गिने-चुने छात्र और शिक्षक ही बच पाए थे, जिनसे भास्कर की टीम ने बात की। पेश हैं, इनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश… तीन–चार लोगों ने स्लैब काटकर बाहर निकाला: मित्तल ठक्कर केतनभाई के बाद हम परेड में शामिल रही छात्रा मित्तल ठक्कर से मिले। वे भी इस आपदा का शिकार हुईं थीं। मित्तल भूकंप के समय अंजार की स्कूल नंबर 4 में छठी कक्षा की छात्रा थीं। वे बताती हैं कि परेड शुरू हुए अभी कुछ ही समय हुआ था कि भूकंप आ गया। जब भूकंप आया तब हम अंजार के खत्री चौक इलाके में थे, जो उस भूकंप में सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र था। उस समय वहां के घर ताश के पत्तों की तरह पल भर में ढहने लगे। किसी को भागने तक का मौका नहीं मिला। भूकंप शुरू होने के एक मिनट से भी कम समय में मैं भी मलबे में दब गई। कुछ समय के लिए मैं बेहोश हो गई थी। जब होश आया, तो पता चला कि मैं दो मंजिला मकान के स्लैब के नीचे दबी हूं। हमारे ऊपर से लोग ठेले गुजर रहे थे अपने रेस्क्यू के बारे में मित्तल बताती हैं- मलबा हटाने के दौरान किसी को मेरी टी-शर्ट दिख गई थी। इसके बाद दो–तीन लोगों ने मेरे ऊपर पड़े स्लैब को हटाकर मुझे बाहर निकाला। मेरे बगल में ही एक बच्चा दबा हुआ है, लेकिन उसकी मौत हो चुकी थी। मेरी दोनों सहेलियां की मौत हो गई अपनी सहेलियों को याद करते हुए मित्तल कहती हैं- हमेशा की तरह रैली के लिए भी हम एक साथ ही घर से निकले थे। हम शुरुआत से एक-दूसरे का हाथ पकड़कर साथ चल रहे थे। मलबे में हम एक साथ ही दब गए थे। रेस्क्यू के बाद मुझे पता चला कि मेरी दोनों पक्की सहेलियों शिवानी और प्रियंका की मौत हो चुकी थीं। जब मुझे बाहर निकाला गया, तब मेरा एक पैर फ्रैक्चर था। रेस्क्यू टीम ने मुझे एक तरफ बिठाया। थोड़ी देर बाद मुझे ढूंढते हुए मेरे पिता वहां पहुंचे। मैंने उन्हें देखते ही जोर से आवाज दी। आज भी मैं उस मंजर को याद कर सिहर उठती हूं। मलबे की धूल में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था: जेठालाल ठक्कर मित्तल के पिता जेठालाल ठक्कर भी उस आपदा के प्रत्यक्षदर्शी हैं। जेठालाल उस समय अंजार की स्कूल नंबर 6 में प्रधानाचार्य थे। जेठालाल बताते हैं कि हर साल गणतंत्र दिवस की परेड सावरचंद नाके से शुरू होकर बाजार से गुजरती हुई टाउन हॉल तक जाती थी। परेड के बाद टाउन हॉल में ध्वजवंदन होता था। सभी स्कूलों के बच्चे नाके पर इकट्ठा हुए थे। हर बच्चे के हाथ में एक-एक झंडा था। बच्चों को तीन-तीन की कतार में खड़ा किया गया था। शिक्षक, दो पुलिसकर्मी और बच्चे तय रूट के अनुसार आगे बढ़ रहे थे। लेकिन बच्चे मुख्य सड़क तक पहुंचते, उससे पहले ही भूकंप ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। वे कहते हैं- एक के बाद एक इमारतें गिरती जा रही थीं और उनके मलबे से इतनी धूल उड़ रही थी कि पास का भी कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ देर बाद जब धूल बैठी तो थोड़ा दिखाई दिया। तब मुझे पता चला कि रैली में शामिल बच्चे इमारतों के मलबों में दब गए हैं। मेरी बेटी भी उसी रैली में थी। कुछ समय के लिए मेरा दिमाग बिल्कुल सुन्न हो गया था। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कहां जाऊं, क्या करूं। जहां नजर डालो, चारों तरफ मलबे के ढेर और दिल दहला देने वाले दृश्य थे। वे बताते हैं कि मलबा इस कदर फैला था कि रास्ते तक नजर नहीं आ रहे थे। कई लोग फंसे हुए दिख रहे थे, लेकिन बिना किसी उपकरण के मलबा हटाया नहीं जा सकता था। शुरुआती दिनों में यहां न बिजली थी और न ही कोई संचार सुविधा थी, जिससे पूरी जानकारी मिल सके। रैली 45 मिनट देर से शुरू हुई, इससे जानमाल का नुकसान बढ़ गया इस रैली का हिस्सा रहे और चार घंटे तक मलबे में दबे रहे शिक्षक विश्रामभाई मकवाणा से भास्कर ने बातचीत की। विश्रामभाई पिछले 36 वर्षों से अंजार के स्कूल नंबर 17 में टीचर हैं। वे बताते हैं- मैं 1991 से इस स्कूल में हूं। 26 जनवरी 2001 को भी हर साल की तरह टाउन हॉल तक रैली निकालकर वहां ध्वजवंदन कार्यक्रम रखा गया था। यह रैली लगभग 1.5 से 2 किलोमीटर लंबी होती है। इस रैली को सुबह 7:30 बजे शुरू होना था, लेकिन उस दिन 8:15 बजे तक रैली निकल पाई। अगर रैली समय पर निकल जाती, तो वह तय स्थान की खुली जगह पर पहुंच चुकी होती और इतनी बड़ी जनहानि नहीं होती। विश्रामभाई बताते हैं कि रैली में उनके स्कूल से तीन शिक्षक वे खुद, कासम साहब, गिरीशभाई चावड़ा और 15 से 20 बच्चे शामिल हुए थे। विश्रामभाई बताते हैं- भूकंप आने से पहले रैली का बड़ा हिस्सा खत्री चौक से गुजर चुका था। आखिरी के बच्चे वहीं गिरते मकानों के नीचे दब गए। उस समय बाजार की गलियां इतनी संकरी थीं कि मुश्किल से बड़ी गाड़ी निकल पाती थी। हालात ऐसे थे कि किसी को भागने या बचने का मौका ही नहीं मिला। हम तीन–चार शिक्षक साथ चल रहे थे। एक शिक्षक मुझसे सिर्फ 8–10 फीट की दूरी पर थे, वे भी वहीं दब गए। मैं भी पूरी तरह मलबे में दब गया था। मेरे ऊपर एक क्लर्क का शव पड़ा था। एक अन्य स्थानीय निवासी भी मेरे पास ही दबे हुए थे। सुबह 8.45 से दोपहर 1:30 बजे तक मैं मलबे में दबा रहा। एक बच गए शिक्षक ने इधर-उधर खबर दी, तब कुछ लोग आए और मुझे बाहर निकाला। मलबे में दबे हालात को याद करते हुए विश्रामभाई कहते हैं- मेरे पास स्कूल नंबर 2 के रफीकभाई भी दबे हुए थे। रफीकभाई का हाथ मेरे नाक के पास आ गया था। मैंने उनसे कहा- हाथ हटाइए, मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही है। लेकिन हालात ऐसे थे कि वे हाथ ही नहीं हिला पा रहे थे। लेकिन, हम दोनों एक साथ जिंदा बाहर निकाले गए। चार दिन तक मलबे में दबा रहा: केतन राठोड़ इनके बाद हम केतन राठोड़ से मिले। वे पेशे से इलेक्ट्रिशियन हैं। वर्ष 2001 में वे अंजार की स्कूल नंबर 14 में सातवीं कक्षा के छात्र थे। केतन रैली में शामिल नहीं हुए थे, क्योंकि रैली उनके घर के सामने से गुजरने वाली थी। उन्होंने सोचा था कि जब रैली घर के पास से निकलेगी, तब वे उसमें शामिल हो जाएंगे। तभी भूकंप में उनका घर ढह गया और वे मलबे में दब गए। चार दिन बाद वे सुरक्षित बाहर निकाल लिए गए। केतन आज भी अपनी स्कूल और खोए हुए सहपाठियों को भुला नहीं पाए हैं। केतन कहते हैं- मैं रोज अपने दो दोस्तों के साथ स्कूल जाता था। फिर भूकंप में जो हुआ, वह तो सबको पता है। आज भी जब 26 जनवरी आती है, तो सब कुछ याद आ जाता है… और यह भी कि मैं खुद मलबे में दब गया था। वे बताते हैं- मैं खेल रहा था। इसी बीच दादी ने मुझे बुलाया। मैं ऊपर से नीचे ही आ रहा था कि भूकंप आया और हमारा घर ढह गया। मैं और मेरी दादी दोनों मलबे में दब गए। मैं नीचे दबा था और मेरी दादी मेरी छाती के ऊपर आ गईं। वहीं मेरी दादी की मौत हो गई, लेकिन मेरी सांसें चल रही थीं। जहां भी देखता, चारों तरफ सिर्फ मलबा ही मलबा था। हिलने-डुलने या बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं थी। मलबे के अंदर दबे हुए मुझे बाहर के लोगों और JCB मशीनों के चलने की आवाजें भी सुनाई देती थीं। केतन आगे बताते हैं- मैं करीब 4 दिन तक मलबे में दबा रहा। आर्मी के एक जवान ने मुझे बाहर निकाला था। बाहर निकाले जाने के पांच-छह घंटे बाद मुझे होश आया। इसके बाद इलाज के लिए मुझे हेलिकॉप्टर से भुज ले जाया गया था। केतन कहते हैं- हर साल 26 जनवरी आते ही वह मंजर आंखों के सामने आ जाता है। मेरी आंखों के सामने ही मेरी दादी ने दम तोड़ दिया और मैं कुछ भी नहीं कर पाया। ------------------ कच्छ भूकंप से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… कलेक्टर के नाम पर भुज में बसा शहर, मलबे से कच्छ को खड़ा करने वाले 6 लोगों की कहानी 26 जनवरी, 2001 के दिन गुजरात के भुज जिले में भीषण भूकंप आया था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.7 थी। करीब 700 किलोमीटर दूर तक भूकंप के झटके महसूस किए गए। कच्छ और भुज शहर में 12,000 से ज्यादा लोगों की जान गई थी और करीब 6 लाख लोगों को बेघर होना पड़ा। पूरी खबर पढ़ें… तबाही के बीच पैदा हुआ बेटा, नाम रखा भूकंप; एक बच्चा 3 दिन बाद मलबे से निकला जिंदा यह 26 जनवरी 2001 की सुबह थी। घड़ी में 8.40 मिनट का समय हुआ था, तभी गुजरात के कच्छ में विनाशकारी भूकंप आया। इसी समय अंजार तालुका की वोहरा कॉलोनी में असगरअली लकड़ावाला घर के बाहर बैठे हुए थे। भूकंप के झटके आते ही वे बाहर भागे। पूरी खबर पढ़ें..

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