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यूएई के पीछे हटने के बाद पाकिस्तान करेगा इस्लामाबाद एयरपोर्ट का निजीकरण
नई दिल्ली, 24 जनवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान सरकार ने इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी है। इससे पहले एयरपोर्ट के प्रबंधन और संचालन को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को आउटसोर्स करने की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था, क्योंकि अबू धाबी ने इस प्रक्रिया में कथित तौर पर “रुचि खो दी” थी। यह जानकारी एक्सप्रेस ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट में दी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यूएई की ओर से इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के आउटसोर्सिंग के लिए किसी इकाई का नाम बार-बार तय न किए जाने के कारण दोनों देशों के बीच गतिरोध पैदा हो गया। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तानी पक्ष ने अंतिम कॉल लेटर भेजकर यूएई से स्पष्ट जवाब मांगा था, लेकिन यूएई की ओर से कहा गया कि वह किसी नामित इकाई की पुष्टि नहीं कर सकता।
इसके बाद पाकिस्तान सरकार ने इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट को निजीकरण के लिए चिन्हित संस्थानों की सूची में शामिल कर लिया है। इससे पहले पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (पीआईए) का भी निजीकरण किया जा चुका है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान सरकार ने सरकार-से-सरकार (जी2जी) फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के मसौदे में कराची के जिन्ना इंटरनेशनल एयरपोर्ट और लाहौर के अल्लामा इकबाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट को शामिल करने की यूएई की मांग को स्वीकार नहीं किया था।
इसके अलावा, मसौदा जी2जी समझौते के तहत अबू धाबी और पाकिस्तान के बीच हवाई संपर्क के निजीकरण की यूएई की मांग को भी इस्लामाबाद ने नजरअंदाज कर दिया।
इस मुद्दे पर चर्चा और फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को अंतिम रूप देने के लिए निजीकरण पर प्रधानमंत्री के सलाहकार के नेतृत्व में, संबंधित मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल अबू धाबी भी गया था।
इससे पहले निजीकरण डिवीजन ने कैबिनेट कमेटी ऑन प्राइवेटाइजेशन को एक सारांश सौंपकर इस्लामाबाद, कराची और लाहौर के हवाई अड्डों को आउटसोर्सिंग के लिए सक्रिय निजीकरण सूची में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था।
एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण खराब शासन और कुप्रबंधन से पाकिस्तान के सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों को भारी नुकसान हो रहा है। बाद में इन्हें औने-पौने दामों पर बेचने की स्थिति आ जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर जवाबदेही और लगातार गिरते प्रदर्शन के बावजूद सरकारी उपक्रमों को बनाए रखा जाता है। जब इन पर भारी घाटा और असहनीय कर्ज का बोझ बढ़ जाता है, तब निजीकरण पर विचार किया जाता है।
--आईएएनएस
डीएससी
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