Vamana Jayanti: Vaman Dwadashi पर पंचामृत अभिषेक और तुलसी दल से करें पूजन, जीवन में आएगी सुख-समृद्धि
हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है और श्रीहरि के विभिन्न अवतारों के विशेष महत्व के बारे में भी बताया गया है। भगवान विष्णु के इन्हीं अवतारों में एक अवतार भगवान वामन का अवतार है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वामन जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान वामन की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
तिथि और मुहूर्त
द्रिक पंचांग के मुताबिक 22 सितंबर की रात 09:43 बजे से भाद्रपद शुक्ल द्वादशी तिथि की शुरुआत हुई है। वहीं आज यानी की 23 सितंबर की रात 10:50 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 23 सितंबर 2026 को वामन जयंती मनाई जा रही है। इसको वामन द्वादशी के नाम से भी जानते हैं।
कौन सा अवतार हैं वामन
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विष्णु के दशावतारों में पांचवें अवतार भगवान वामन हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह अवतार के बाद श्रीहरि ने वामन रूप धारण किया था। धार्मिक मान्यता है कि वामन भगवान का जन्म भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को हुआ था। इनके माता अदिति और पिता ऋषि कश्यप माने जाते हैं। भगवान वामन ने अपने इस अवतार से राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी।
पूजन विधि
इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान वामन का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। फिर एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु या भगवान वामन की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर 'ॐ नमो भगवते वामनाय नमः' मंत्र का जाप करते हुए भगवान विष्णु का पहले पंचामृत और बाद में साफ पानी से अभिषेक करें।
भगवान विष्णु को पीले पुष्प, अक्षत, चंदन, पीले वस्त्र और तुलसी दल आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान को तुलसी दल के साथ सात्विक भोग और फल अर्पित करें। इसके बाद वामन अवतार से जुड़ी कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और सुख-समृद्धि की कामना करें।
महत्व
इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-आराधना की जाती है। इस दिन जो भी जातक भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना और उनके वामन स्वरूप की पूजा करता है। व्रत, पूजा, कथा और दान-पुण्य जैसे कार्य करता है। उसके जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य आता है।
Mahalaxmi Vrat Puja: Mahalakshmi Vrat आज से शुरू, धन समृद्धि के लिए इस तरह करें कलश स्थापना और पूजन
मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए और घर में सुख-सौभाग्य व धन की वृद्धि के लिए महालक्ष्मी का व्रत फलदायी माना जाता है। 15 दिनों तक चलने वाले इस महालक्ष्मी व्रत में धन की देवी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। महालक्ष्मी व्रत करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह व्रत 19 सितंबर से शुरू होकर 03 अक्तूबर तक चलेगा। वहीं व्रत के पहले दिन कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है। तो आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत की तिथि, कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में...
तिथि और मुहूर्त
वैदिक पंचांग क मुताबिक महालक्ष्मी व्रत के लिए 18 सितंबर की दोपहर 01:00 मिनट से भाद्रपद माह के शुक्ल अष्टमी तिथि की शुरूआत हुई है। जोकि आज यानी की 19 सितंबर की दोपहर 03:26 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 19 सितंबर 2026 से महालक्ष्मी व्रत शुरू हो रहा है।
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कलश स्थापना का मुहूर्त
महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी को समर्पित व्रत है। माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करता है, उसको मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि व शांति बनी रहती है।
प्रातःकाल मुहूर्त- सुबह 04:57 मिनट से लेकर 06:08 मिनट तक है।
दूसरा शुभ मुहूर्त- सुबह 07:40 मिनट से लेकर 09:11 मिनट तक है।
मध्याह्न शुभ मुहूर्त- सुबह 11:01 मिनट से लेकर दोपहर 01:28 मिनट तक है।
ऐसे करें कलश स्थापना
इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद पूजा स्थल की सफाई करें और गंगाजल का छिड़का करें। फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर मां लक्ष्मी की तस्वीर स्थापित करें। अब एक तांबे के कलश में साफ जल भरें और इसमें सिक्का और अक्षत डालें। फिर कलश के ऊपरी भाग पर आम के पत्ते लगाएं और कलश के मुंह पर नारियल रखे। फिर कलश पर रोली और कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं।
पूजन विधि
कलश स्थापना के बाद मन में मां लक्ष्मी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद मां लक्ष्मी को फूल, अक्षत, कुमकुम, चंदन और धूप-दीप आदि अर्पित करें। मां लक्ष्मी को श्रृंगार की सामग्री और 16 गांठों वाला डोरा अर्पित करें। फिर विधि-विधान और श्रद्धा के साथ मां लक्ष्मी की पूजा करें। इस दौरान श्रीसूक्त और महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करना शुभ माना जाता है। पूजा के अंत में मां लक्ष्मी को खीर, फल, मिठाई या पंचमेवा आदि का भोग लगाएं और घी का दीपक जलाकर आरती करें।
महत्व
जो व्यक्ति महालक्ष्मी व्रत करता है, उसके जीवन में दरिद्रता नहीं आती है। मां लक्ष्मी की कृपा से धन संकट का सामना नहीं करना पड़ता है। वहीं व्यक्ति के अन्न, भोजन, धन, जमीन, भवन, प्रसिद्धि, आयु और सफलता में वृद्धि होती है।
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