राजनीति में कुसंस्कार को बढ़ावा देती कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी चुनावों में लगातार पराजय का सामना कर रही है जिसने पार्टी युवराज राहुल गांधी को हताश कर दिया है। उनको इस हताशा से उबारने के लिए कांग्रेस ने पेपर लीक तथा छात्रों की अन्य समस्याओं को आधार बनाकर “छात्रों की गूंज” नाम का अभियान अभियान आरंभ किया जिससे कांग्रेस तथा राहुल गाँधी को छात्रों व युवाओं के एकमात्र हितैषी के रूप में स्थापित किया जा सके। जेन ज़ी के जोर शोर और सोशल मीडिया पर तमाम हल्ले गुल्ले के साथ शुरू हुआ राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम पहले झूठे तथा गलत तथ्यों के कारण चर्चा में रहा और फिर अर्मादित, अनुशासनहीन व्यवहार के कारण। पहले चरण में मनुस्मृति के अपमान से आरम्भ हुआ ये कार्यक्रम अगले चरण में राहुल और संदीप दीक्षित ने द्वारा प्रधानमंत्री पर अशालीन कटाक्ष तक पहुंचा जिसमें एक विदेशी महिला राष्ट्राध्यक्ष पर अपमानजनक टिप्पणी की गयी, उसका विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि ये लोग इंदौर पहुँच गए।
मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 19 सितंबर 2026 को छात्रों की गूँज का आयोजन किया गया। यहाँ एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री की गई उनकी विदेश नीति का मजाक बनाया गया। सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सर पुलकित मणि ने उनकी मां का भी उपहास उड़ाया और राहुल गांधी ने उनका इस कुकृत्य में साथ दिया। इंदौर में जो कुछ हुआ उसकी निंदा केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं अपितु कांग्रेस के सहयोगी समाजवादी पार्टी व शिवसेना का उद्धव गुट भी कर रहा है। मुंबई में शिवसेना नेता आनंद दुबे ने कहा कि मंच से किसी के परिवार के बारे में आपत्तिजनक बात करना उचित नहीं है। आने वाले समय में सभी राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इस कृत्य को सर्कस व राहुल गांधी को “असंस्कारी नाराज फूफा“ करार दिया है।
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कांग्रेस के मंच पर जिस प्रकार पुलकित मणि से मिमिक्री कराई गयी वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के निकृष्टतम उपयोग का उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा कि मैं एक वीडियो देख रहा था जिसमें उन्होंने नारी शक्ति का अपमान किया है। लोगों में संस्कार नहीं है। हमारी परंपरा कहती है- पहले आप। रास्ते में बुजुर्ग, महिला, दिव्यांग को पहले जाने देना हमारा संस्कार है लेकिन जो भारत को अपमानित करने का लक्ष्य मान लेते हैं वे कुटुम्बकम भाव को नहीं समझ सकते। सत्य, असत्य और अर्धसत्य होता है और कुछ लोग अर्धसत्य कहकर ही भारत की छवि धूमिल करना चाहते हैं। राहुल के मंच से मोदी जी की मां का उपहास भारत माता का उपहास है, भारत की समस्त मातृशक्ति का उपहास है। मां के उपहास को भारत की मूल आत्मा कतई स्वीकार नहीं करेगी और न ही कभी माफ करने वाली है।
यह सत्य है भारत की सनातन आस्था वाली आम जनता इस प्रकार से किए जाने वाले स्त्री अपमान को सहन नहीं करती और समय आने पर उत्तर देती है। बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के मंच से पीएम मोदी की मां को गाली दी गई और बिहार में कांग्रेस का सफाया हो गया । इसी प्रकार राहुल गांधी अपने बयान, “लोग मंदिरों में लड़कियां छेड़ने के लिए जाते हैं” के बाद हुस अपना हश्र भी देख सकते हैं।
राहुल गांधी पूरी तरह से भ्रम फ़ैलाने की राजनीति कर रहे हैं और विकृत मानसिकता से ग्रस्त हो चुके हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धूमिल करना, सनातन संस्कृति को बदनाम करना तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर भरत की बदलती हुई तस्वीर की विकृत छवि प्रस्तुत करना है। किंतु हो इसका विपरीत रहा है राहुल गांधी अपने ही बुने जाल में फंसते जा रहे हैं। इससे उनका निकल पाना या सुधर जाना बहुत कठिन हो गया है । राहुल गांधी के असभ्य व्यवहार के कारण युवा वर्ग उनसे नहीं जुड़ पा रहा है। कांग्रेस का सबसे दुर्भाग्यूपर्ण पहलू यह है कि कोई भी वरिष्ठ नेता राहुल को समझाने के लिए आगे नहीं आता, उनको युवराज का दर्जा हासिल है इसके चाटुकार लोग इंदौर जैसी घटनाओं का समर्थन करने के लिए उतर पड़ते हैं।
देश के युवाओं में आक्रोश है जिसके कारण कामेडियन पुलकित मणि के शो एक के बाद एक रद्द हो रहे हैं। राहुल गांधी के मंच से पर हुई मिमिक्री को हिंदुस्तान की हर मां और संपूर्ण मातृशक्ति का अपमान बताया जा रहा है लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता और आई टी सेल ण केवल इसके बचाव में लगे हैं वरन इसको मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं। उधर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने छात्रसंघ के चुनाव परिणामों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को 3-1 से विजयी बनाकर बता दिया कि देश का युवा क्या पसंद करता है।
- मृत्युंजय दीक्षित
दवा कंपनियों की लूट पर Supreme Court ने की सख्त टिप्पणी, 'दिनदहाड़े डकैती और वसूली' पर प्रशासन चुप क्यों है?
बीमारी इंसान को केवल शारीरिक रूप से नहीं तोड़ती, बल्कि इलाज का खर्च कई परिवारों की आर्थिक कमर भी तोड़ देता है। ऐसे समय में जब कोई परिवार कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो, तब जीवन बचाने वाली दवा की कीमत में दस गुना तक का अंतर सामने आए तो सवाल सिर्फ महंगी दवा का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का बन जाता है। हम आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को दवाओं की कीमतों में इसी भयावह अंतर पर गंभीर चिंता जताते हुए ऐसे सवाल उठाए हैं, जिनका जवाब सरकार, दवा कंपनियों, नियामक संस्थाओं और अस्पतालों, सभी को देना होगा।
मामला उस समय बेहद गंभीर हो गया जब अदालत के सामने बताया गया कि कैंसर की एक आवश्यक दवा खुदरा विक्रेताओं को करीब 2,700 रुपये में उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन उसी दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित है। यानी खुदरा मूल्य उस कीमत का लगभग दस गुना है जिस पर दवा खुदरा विक्रेता तक पहुंच रही है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अंतर पर कड़ा सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर किसी मरीज से इतनी बड़ी रकम क्यों वसूली जानी चाहिए और जिन अधिकारियों को ऐसी व्यवस्था पर निगरानी रखनी चाहिए, वे चुप क्यों हैं।
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देखा जाये तो यहां से सवालों की पूरी श्रृंखला शुरू होती है। अगर दवा की वास्तविक आपूर्ति कीमत और मरीज से वसूले जाने वाले मूल्य के बीच इतना बड़ा अंतर हो सकता है, तो मूल्य-निर्धारण की निगरानी कौन कर रहा है? अगर नियामक संस्थाएं मौजूद हैं, तो ऐसी कीमतें बाजार में पहुंचती कैसे हैं? और अगर नियम हैं, तो उनका पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
सर्वोच्च न्यायालय ने इस अंतर को लेकर बेहद कठोर भाषा का इस्तेमाल किया और इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ तथा ‘वसूली’ जैसे शब्दों से जोड़ा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब जीवनरक्षक दवा की कीमत इतनी अधिक हो जाती है तो मजबूर मरीज क्या करे? अदालत के समक्ष यह बात भी रखी गई कि इलाज के लिए परिवारों को मकान और गहने तक बेचने पड़ते हैं। यही इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू है।
देखा जाये तो एक स्वस्थ व्यक्ति किसी वस्तु की ऊंची कीमत देखकर उसे खरीदने से इंकार कर सकता है, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहा मरीज दवा को आसानी से मना नहीं कर सकता। कैंसर की दवा, हृदय की दवा या किसी दूसरी गंभीर बीमारी की आवश्यक औषधि उसके लिए विलासिता नहीं, जिंदगी की जरूरत है। ऐसे में मरीज और उसके परिवार की मजबूरी ही बाजार में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।
सवाल यह भी है कि क्या किसी अस्पताल की अपनी दवा दुकान से ही दवा खरीदने के लिए मरीज को मजबूर किया जाना चाहिए? हम आपको बता दें कि याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को बाहर से सस्ती दवा खरीदने की अनुमति नहीं देते और अस्पताल की ही दवा दुकान से महंगी दवा लेने के लिए मजबूर करते हैं। इन आरोपों की अंतिम कानूनी पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन अदालत ने इन परिस्थितियों और कीमतों के अंतर को गंभीरता से लिया है।
देखा जाये तो मामला तब और गंभीर हो जाता है जब सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का पैसा इसमें शामिल हो। सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता जताई कि यदि किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत अस्पताल महंगी कीमत पर दवा की प्रतिपूर्ति हासिल करता है, तो अंततः उस खर्च का भार करदाताओं पर पड़ सकता है। अदालत ने ऐसी स्थिति में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की आशंका पर भी सवाल उठाया।
यहां सरकार और नियामक तंत्र से एक और बड़ा सवाल है। जब दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था मौजूद है, तो क्या उसका दायरा पर्याप्त है? सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि कई दवाएं मूल्य-सीमा के दायरे से बाहर हैं और गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने को लेकर नियामकीय खालीपन मौजूद है। हालांकि इस पूरे मामले में यह भी जरूरी है कि हर ऊंची कीमत को अपने आप घोटाला या हर अस्पताल और दवा कंपनी को दोषी न माना जाए। अस्पतालों के एक प्रमुख संगठन ने हाल में कहा है कि दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य अस्पताल तय नहीं करते और खरीद कीमत तथा मरीज से लिए गए मूल्य के अंतर को अलग-अलग परिस्थितियों में जांचना चाहिए। इसलिए असली जरूरत पारदर्शी जांच, कीमतों की स्पष्ट जानकारी और जिम्मेदारी तय करने की है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की मौजूदा सुनवाई ने कम से कम एक महत्वपूर्ण दरवाजा खोल दिया है कि अब सवाल पूछा जा रहा है।
और आम आदमी के लिए यही सबसे बड़ी उम्मीद है। अदालत ने केवल महंगी दवा की शिकायत सुनकर मामला आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि यह पूछा कि कीमत तय करने की व्यवस्था क्या है, नियामक कहां है, मरीज पर इतना बोझ क्यों है और सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है। हम आपको बता दें कि अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होनी है, जिसमें दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने और सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े प्रस्तावों पर आगे विचार होना है।
सर्वोच्च न्यायालय की यह सख्ती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वास्थ्य कोई ऐसा बाजार नहीं होना चाहिए जहां मरीज की मजबूरी मुनाफे का अवसर बन जाए। जरूरत अब सिर्फ तीखी टिप्पणियों की नहीं, बल्कि ऐसी ठोस व्यवस्था की है जिसमें दवा की वास्तविक लागत, निर्माता का मूल्य, खुदरा मूल्य और मरीज से वसूली जाने वाली रकम के बीच पारदर्शिता हो। क्योंकि बीमारी से लड़ रहा आम आदमी पहले ही जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा है। उसे इलाज के नाम पर कीमतों की ऐसी भूलभुलैया में धकेलना, जहां वह अपनी जिंदगी बचाने के लिए घर-गहने बेचने को मजबूर हो जाए, तब इस व्यवस्था पर सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन सवालों को अदालत की चौखट से बाहर समाज के सामने ला दिया है। अब निगाह इस बात पर है कि इन सवालों के बाद व्यवस्था बदलती है या फिर महंगी दवाओं का यह खेल उसी तरह चलता रहता है।
-नीरज कुमार दुबे
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