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गद्दी को लेकर बद्रीकाश्रम में 73 सालों से विवाद:एक वसीयत पर बने दो गुट, 1989 में कोर्ट पहुंचा केस; गोविंदानंद बोले- अविमुक्तेश्वरानंद नहीं शंकराचार्य

उत्तराखंड में स्थित ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य विवाद कोई नया नहीं है। यह लड़ाई उस शंकराचार्य के निधन के बाद शुरू हुई, जिनके बाद गद्दी संभालने के लिए नियम और परंपरा तय की गई थी। समय के साथ यह विवाद अदालतों तक पहुंचा और अब 73 साल बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है। प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई घटना के बाद गद्दी का ये पुराना विवाद फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में दैनिक भास्कर एप ने स्वामी गोविंदानंद सरस्वती से बातचीत की, जो अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य बनने को कोर्ट में चुनौती देने वालों में शामिल हैं। गोविंदानंद ने बातचीत में कहा कि ज्योतिर्मठ का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, इसलिए किसी को भी खुद को “असली शंकराचार्य” घोषित करने का अधिकार नहीं है। उनका कहना है कि कोर्ट ने जब तक अंतिम फैसला नहीं सुनाया, तब तक स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ही इस पीठ की जिम्मेदारी निभाने के लिए कहा था। वह सवाल उठाते हैं कि जब केस अभी भी पेंडिंग है, तो अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य कैसे माना जा सकता है। अब समझिए कैसे-कब और कहां से शुरू हुआ गद्दी का विवाद 1953 से शुरुआत- एक वसीयत, दो दावे और दो गुटों की नींव 1941 में 165 साल बाद ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य बनाए गए स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के निधन के बाद 1953 में यह सवाल खड़ा हुआ कि ज्योतिष्पीठ की गद्दी पर अगला शंकराचार्य कौन होगा। उसी दौर में वसीयत के आधार पर एक पक्ष ने स्वामी शांतानंद सरस्वती (रामजी त्रिपाठी) को शंकराचार्य मानते हुए 12 जून 1953 को काशी में उनका अभिषेक कर दिया। वहीं दूसरा पक्ष इस वसीयत और स्थापना को मानने से इनकार करता रहा और उसने 13 दिनों बाद यानि 25 जून 1953 को स्वामी कृष्णबोध आश्रम को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया। यहीं से विवाद “एक पीठ, दो दावे” के रूप में शुरू हुआ और आगे की पूरी कहानी इसी दरार पर चलती रही। 1989 में कोर्ट तक पहुंचा मामला एक ही मठ के दो गुट सामांतर गद्दी पर दावा करने लगे, 1973 में कृष्णबोध आश्रम के निधन के बाद स्वरूपानंद सरस्वती इस पीठ के शंकराचार्य घोषित कर दिए गए तो दूसरे गुट के स्वामी शांतानंद सरस्वती ने 28 फरवरी 1980 को पद छोड़ स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी बना दिया। मामला सीधे तौर पर कोर्ट में तब पहुंचा जब स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती ने 17 अप्रैल 1989 की वसीयत में स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को शंकराचार्य के रूप में नामित किया और 15 नवंबर 1989 को उनके अभिषेक की तारीख भी तय करदी। उसी समय दूसरे पक्ष से स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि वासुदेवानंद को शंकराचार्य के रूप में स्थापित होने और स्वयं को शंकराचार्य घोषित करने से रोका जाए। हालांकि, इसके बावजूद 15 नवंबर 1989 को वासुदेवानंद का अभिषेक कर दिया गया और विवाद कोर्ट की लंबी लड़ाई में बदल गया। 2015 का फैसला- अदालत ने रोक लगाई विवाद चलता रहा जिसके बाद सिविल कोर्ट ने 5 मई 2015 को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ज्योतिष्पीठ का वास्तविक दावेदार मानते हुए स्वामी वासुदेवानंद को शंकराचार्य की पदवी धारण करने से रोक दिया था। इसके बाद वासुदेवानंद ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर सिविल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 22 सितंबर 2017 के आदेश में दोनों को इस पीठ का शंकराचार्य मानने से इनकार किया था। हाईकोर्ट ने वासुदेवानंद के दावे को पूरी तरह रद्द करते हुए स्वरूपानंद को विद्वान माना। कोर्ट ने ज्योतिष पीठ 1941 की गाइड लाइन के अनुसार तीन महीने में नये शंकराचार्य की नियुक्ति का आदेश दिया। इसके बाद वासुदेवानंद ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। 2017 में अभिषेक की मान्यता का दावा- लेकिन केस सुप्रीम कोर्ट चला गया स्वामी गोविंदानंद का दावा है कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ज्योतिष्पीठ को शंकराचार्य मानते हुए भारत धर्म महामंडल (वाराणसी) ने हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार अक्टूबर 2017 में मध्य प्रदेश के परमहंस गंगा आश्रम में अभिषेक कर मान्यता दी थी। इसी दौर में विवाद खत्म होने की जगह और ज्यादा उलझ गया, क्योंकि दोबारा से प्रक्रिया पर सवाल उठे और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया। गोविंदानंद के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में आदेश दिया था, कि अंतिम आदेश आने तक स्वामी स्वारूपानंद सरस्वती शंकराचार्य के पद पर बने रहेगें। 2022 में स्वारूपानंद का निधन हो गया लेकिन कोर्ट का अंतिम आदेश नहीं आया। अब पूरे मामले में यहीं से एंट्री हुई अविमुक्तेश्वरानंद की। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की वसीयत के आधार पर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निजी सचिव और शिष्य सुबोद्धानंद महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ का नया शंकराचार्य घोषित कर दिया। अखाड़ों ने कहा- यह नियुक्ति नियमों के खिलाफ है इस घोषणा के बाद संन्यासी अखाड़ों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ का नया शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया। निरंजनी अखाड़े के सचिव और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने दावा किया कि अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति नियमों के खिलाफ जाकर की गई है। उनका कहना है कि शंकराचार्य बनाने की एक तय प्रक्रिया होती है, जिसका पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने अभिषेक पर लगाई रोक स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य होने का दावा करने वाले स्वामी गोविंदानंद सरस्वती इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे, कोर्ट ने नए शंकराचार्य के रूप में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अभिषेक पर रोक लगा दी। हालांकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा है की कोर्ट के ऑर्डर से पहले ही उनका अभिषेक हो चुका था। गोविंदानंद के आरोप- 'गलत दस्तावेज लगाए, योग्यता नहीं' स्वामी गोविंदानंद सरस्वती ने दावा किया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सुप्रीम कोर्ट में कुछ ऐसे दस्तावेज लगाए हैं जो वैध नहीं हैं। गोविंदानंद का कहना है कि अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य घोषित करने की पूरी प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद पर आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि वे शंकराचार्य जैसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पद की योग्यता नहीं रखते। हालांकि गोविंदानंद के इन दावों और आरोपों पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष इस बातचीत में नहीं मिल सका। ----------------------------- ये खबर भी पढ़ें... 165 साल तक बिना शंकराचार्य के रही बद्रीकाश्रम पीठ: चयन के लिए जगतगुरु की किताब से बने सख्त नियम, पदवी को लेकर आज भी विवाद जारी प्रयागराज माघ मेला प्रशासन के नोटिस के बाद उत्तराखंड में स्थित ज्योतिषपीठ (बद्रीकाश्रम) के शंकराचार्य पद का विवाद फिर चर्चा में आ गया है। प्रशासन ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से सवाल किया है कि वे सार्वजनिक तौर पर अपने नाम के आगे “शंकराचार्य” क्यों लिख रहे हैं। (पढ़ें पूरी खबर)

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छोटी उम्र में बड़ा कमाल! आर्मी अफसर की बेटी अक्षिता ने बनाई कूड़े को खाद बनाने वाली अनोखी मशीन, अब कंपनियों में मची फंडिंग की होड़!

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