परिणीति चोपड़ा की ओटीटी डेब्यू सीरीज ‘शक’ का ट्रेलर आउट, सस्पेंस से भरपूर है कहानी
बॉलीवुड एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा एक बार फिर अपने नए किरदार के साथ दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए बिल्कुल तैयार हैं। अपनी शादी और फिर प्रेगनेंसी के बाद उन्हें एक्टिंग से थोड़ा दूर देखा गया था लेकिन अब उन्होंने वापसी की तैयारी कर ली है। दरअसल, एक्ट्रेस पहली बार किसी वेब सीरीज में नजर आने वाली हैं।
दरअसल, एक्ट्रेस को ओटीटी की सीरीज शक: ट्रस्ट नो वन में देखा जाने वाला है। कुछ समय पहले ही इस सीरीज का ऐलान किया गया था और तब से ही यह चर्चा में बनी हुई है। अब इसकी चर्चा और भी बढ़ गई है क्योंकि सीरीज का शानदार ट्रेलर रिलीज कर दिया गया है। इसमें एक्ट्रेस का एंट्रेंस रोल दिखाया गया है जो फैंस को बहुत पसंद आया।
शक का ट्रेलर आउट
शक का जो ट्रेलर सामने आया है, उसकी शुरुआत एक बच्चे की किडनैपिंग से दिखाई गई है। डिलीवरी के बाद अस्पताल में मां बनी परिणीति का बच्चा चोरी हो जाता है। देखते ही देखते 8 साल गुजर जाते हैं लेकिन एक मां अपनी बच्चों की खोज लगातार करती रहती है। मामले में ट्विस्ट तब आता है जब अचानक 8 साल बाद उसके पास बच्ची की फोटो आती है। पुलिस को शक होता है कि कहीं बच्ची अपने सर्किल में से किसी ने तो किडनैप नहीं की है। शक कि सूई हर शख्स पर जाती है यहां तक की परिणीति की सास और पति पर भी शक किया जाता है।
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सस्पेंस से भरा है ट्रेलर
सीरीज का पूरा ट्रेलर मिस्ट्री और सस्पेंस से भरा हुआ है। परिणीति एक साइकेट्रिक से मिलती है और अपना इलाज करती है। उसे लगता है कि कोई उसे पागल करना चाहता है। दूसरी तरफ वह अपनी बच्ची को ढूंढने के लिए तांत्रिक का सहारा लेती है। वीडियो में जमकर सस्पेंस और थ्रिल दिखाया गया है। परिणीति के अलावा अन्य कलाकारों की भूमिका भी काफी मजबूत है।
कब आएगी शक
शक की रिलीज डेट की बात करें तो इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर 24 सितंबर को पेश किया जाएगा। इसमें परिणीति के साथ जेनिफर विंगेट, सोनी राजदान, अनूप सोनी, ताहिर राज भसीन, शरलीन सेठी और सुमित व्यास जैसे कलाकार नजर आने वाले हैं।
SC/ST Act में 2018 के संशोधन को फिर चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका, अग्रिम जमानत पर उठाया था सवाल
SC/ST एक्ट में वर्ष 2018 में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि इस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट वर्ष 2020 में ही बरकरार रख चुका है। ऐसे में कोर्ट ने मामले में दोबारा हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता ने मुख्य रूप से SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर लगी रोक को चुनौती दी थी। उनकी ओर से पेश एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने इसे ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ बताते हुए कानून के दुरुपयोग की आशंका जताई। उन्होंने एक्ट के तहत दर्ज मामलों में सजा की दर और पीड़ितों को दिए गए मुआवजे का मुद्दा भी कोर्ट के सामने रखा, लेकिन बेंच इन दलीलों के आधार पर मामले को दोबारा खोलने के लिए तैयार नहीं हुई।
आखिर 2018 में SC/ST एक्ट में क्या बदला था?
इस विवाद की शुरुआत मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट के डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में दिए गए फैसले से हुई थी। कोर्ट ने उस समय SC/ST एक्ट के तहत कुछ मामलों में FIR दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच और आरोपी की गिरफ्तारी से पहले अनुमति की व्यवस्था की थी। जरूरत पड़ने पर अग्रिम जमानत की गुंजाइश भी रखी गई थी।
इसके बाद संसद ने उसी साल SC/ST एक्ट में संशोधन कर सेक्शन 18A जोड़ दिया। इसके जरिए FIR दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच की जरूरत खत्म कर दी गई और गिरफ्तारी से पहले किसी अधिकारी की मंजूरी लेने की शर्त भी हटा दी गई। संशोधन के बाद एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर लगी रोक भी बहाल हो गई।
2020 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला
संसद से हुए इस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन फरवरी 2020 में कोर्ट ने इसे बरकरार रखा। कोर्ट ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया था कि अगर शिकायत को देखने पर पहली नजर में SC/ST एक्ट के तहत अपराध बनता ही नहीं है, तो ऐसे मामले में अदालत अग्रिम जमानत पर विचार कर सकती है।
इसी संशोधन को अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि अग्रिम जमानत पर रोक एक तरह का ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ है और कानून के इन प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है। बेंच ने इस पर दोबारा विचार करने से इनकार करते हुए वर्ष 2020 के फैसले का हवाला दिया।
सजा की दर और मुआवजे पर भी उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मामलों में सजा की कम दर का भी जिक्र किया। राज्यसभा में दिए गए एक जवाब का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मुआवजे के तौर पर करीब 493 करोड़ रुपये बांटे गए हैं। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए दलील दी कि इससे FIR दर्ज कराने को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट इन दलीलों से 2018 के संशोधन को दोबारा जांचने के लिए तैयार नहीं हुआ और याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया।
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