Earbuds छोड़ Wired Earphones और MP3 Player अपना रहे युवा, डिजिटल थकान बनी वजह
आज के आधुनिक दौर में टेक्नोलॉजी काफी बढ़ गई है। जबसे से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हर चीज काफी आसान हो गई है। आजकल देखा जा रहा है कि हर वक्त कनेक्टेड रहने की यह मजबूरी से अब लोग दूर जा रहे हैं, लोगों की डिजिटल थकान बढ़ती जा रही हैं।
अब लोग टेक मार्केट के दिलचस्प ट्रेंड से दूर भाग रहे हैं। लोग स्मार्टफोन्स के हाई-टेक फीचर्स को साइड करके वापिस पुराने गैजेट्स की तरफ बढ़ रहे हैं, जो भागदौड़ की जिंदगी के बीच कुछ सुकून के पल दे रहा है।
वायर्ड ईयरफोन्स और MP3 प्लेयर्स की तरफ बढ़ रहे
आज के समय में युवा Earbuds से हटकर अब वायर्ड ईयरफोन्स की तरफ बढ़ रहे हैं। लोग अब ऑफलाइन MP3 प्लेयर को अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा बना रहे हैं। इस बीच, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांड 'बोट' (boAt) के मार्केटिंग मैनेजर राघव शाह ने बताया है कि, हाल ही के महीनों में वायर्ड ईयरफोन और डिजिटल ऑडियो प्लेयर खरीदने वाले नए ग्राहकों की तादाद लगभग 8 गुना बढ़ गई है।
इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह शांति की तलाश। लोग संगीत सुनते समय व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और ई-मेल के लगातार बजने वाले नोटिफिकेशन से परेशान हो चुके है। बिना किसी डिस्टरबेंस के म्यूजिक एन्जॉय करना चाहते हैं।
बढ़ती मांग के हैरान करने वाले आंकड़े:
वायर्ड ऑडियो
इन प्रोडक्ट्स पर नए ग्राहकों में करीब 10 गुना की वृद्धि दर्ज की गई है।
कॉम्पैक्ट कैमरा
आजकल कैमरों की मांग और सप्लाई का अनुपात 10:1 के स्तर पर पहुंच गया है।
शिपमेंट
इस साल 2025 में दुनिया भर में कॉम्पैक्ट कैमरा शिपमेंट में 29.6% का इजाफा देखा गया है।
नई पीढ़ी को क्यों भा रहे हैं पुराने गैजेट्स?
अक्सर लोग इन्हें नॉस्टैल्जिया मानकर खारिज कर देते हैं, लेकिन जिन युवाओं ने कभी आईपॉड या पुराने वॉकमैन देखे तक नहीं, उनके लिए यह एक फ्रेश और नया अनुभव है। वहीं, टेक्स एक्सपर्ट मानते हैं कि नई पीढ़ी का यह तकनीकी का विरोध नहीं, बल्कि उस पर अपना नियंत्रण से हटकर सोची-समझी कोशिश है।
Global AI कंपनियों का Valuation टिकाऊ नहीं, KPMG India प्रमुख ने जताई चिंता
केपीएमजी इंडिया के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) येजदी नागपोरवाला ने मंगलवार को वैश्विक स्तर की कुछ बड़ी कृत्रिम मेधा (एआई) कंपनियों के मूल्यांकन मॉडल पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत भले ही शुरुआती दौर में एआई की दौड़ में बढ़त बनाने से चूक गया हो, लेकिन देश के पास इस अंतर को पाटने और आगे निकलने का पूरा मौका है।
उन्होंने कहा कि देर-सबेर भारत के पास अपना खुद का लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) होना ही है। सीईओ ने भरोसा जताया कि देश ऐसा मॉडल विकसित करेगा और प्रौद्योगिकी परिवेश तथा वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) की मौजूदगी के चलते यह पूरी तरह अलग और अनूठा हो सकता है।
नागपोरवाला ने वैश्विक स्तर पर कुछ बड़ी एआई कंपनियों को दिए जा रहे ऊंचे मूल्यांकन पर भी संदेह जताया और कहा कि इस तरह का मूल्यांकन स्थायी नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, यदि आप इनमें से कुछ बड़ी कंपनियों के राजस्व और मूल्यांकन मॉडल को देखें, तो उन राजस्व मॉडलों के आधार पर इस मूल्यांकन को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता।
मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जब उनका राजस्व ही 50 अरब डॉलर से कम है, तो उनका मूल्यांकन एक हजार अरब डॉलर या उससे अधिक कैसे हो सकता है। यह पूछने पर कि क्या भारत एआई की दौड़ में पिछड़ गया है, नागपोरवाला ने कहा, कुछ मायनों में हां, और कुछ मायनों में नहीं। उन्होंने आगे कहा कि हमारे पास इस अंतर को पाटने और आगे निकलने का एक अच्छा अवसर है।
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