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राहुल गांधी ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की, SIR विवाद के बीच कहा कि उन्हें 'सरकारी गवाह बनना चाहिए'

भारत के चुनाव आयोग (ECI) के भीतर मतभेदों की खबरों और 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) प्रक्रिया को लेकर जारी घमासान के बीच देश की राजनीति गर्मा गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर देश की चुनावी व्यवस्था पर हमला करने का गंभीर आरोप लगाते हुए उनसे तुरंत अपने पद से इस्तीफ़ा देने की मांग की है। दिल्ली में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने 'इंडियन एक्सप्रेस' की उस रिपोर्ट पर तीखी प्रतिक्रिया दी, जिसमें दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी) ने वोटर लिस्ट के तौर-तरीकों और डेटा मैनेजमेंट पर 14 अलग-अलग मौकों पर अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं।


राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार से 'गवाह बनने' को कहा
गांधी ने कहा कि दो चुनाव आयुक्तों ने अपनी आपत्तियां जताकर "समझदारी भरा काम" किया है और उन्होंने उनके इस कदम की सराहना की। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से गवाह बनने की भी अपील की और इस मांग को लोकतंत्र की रक्षा की ज़रूरत से जोड़ा। गांधी ने कहा, "इसके नतीजे होंगे। हम लोकतंत्र को बर्बाद नहीं होने देंगे। ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दी जाएगी।" उन्होंने आगे कहा, "दोनों चुनाव आयुक्तों ने समझदारी भरा काम किया है। मैं इसकी सराहना करता हूं। मिस्टर (ज्ञानेश) कुमार को गवाह बन जाना चाहिए। यह देशभक्ति का काम होगा। हम जानते हैं कि क्या हुआ है और हम इसका खुलासा करेंगे।" गांधी ने कुमार के इस्तीफ़े की भी सीधे तौर पर मांग की। उन्होंने कहा, "मैं मांग करता हूं कि ज्ञानेश कुमार तुरंत इस्तीफ़ा दें, आपने चुनाव प्रणाली पर हमला किया है।"

राहुल गांधी का आरोप है कि भारत में चुनावों में धांधली हो रही है
गांधी ने कहा कि चुनाव आयोग "वोट का संस्थागत संरक्षक" है और आरोप लगाया कि यह साबित करने के लिए पर्याप्त जानकारी मौजूद है कि भारत में चुनावों में धांधली हो रही है। गांधी ने कहा, "चुनाव आयोग वोट का संस्थागत संरक्षक है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसे सबूत के साथ दिखाया है, और इतनी जानकारी पहले से मौजूद है जिससे यह 100% पक्का हो जाता है कि भारतीय चुनावों - लोकसभा चुनाव, 2024 के चुनाव, विधानसभा चुनाव - सभी में धांधली हो रही है।" इसके बाद गांधी ने कुमार के बारे में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा जताई गई चिंताओं का ज़िक्र किया। गांधी ने कहा, "दो चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठा रहे हैं। मैं भी सवाल उठाता रहा हूं। उन सवालों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। भारत के लोगों ने उन पर विश्वास किया, लेकिन भारत के संस्थागत ढांचे को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी।"

राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर सवाल उठाए
गांधी ने उस प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए जिसके ज़रिए कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। गांधी ने कहा, "ज्ञानेश कुमार को भारत के प्रधानमंत्री ने चुना था, किसी छोटे-मोटे व्यक्ति ने नहीं। उन्हें अमित शाह ने चुना था।" उन्होंने आगे कहा, "अब दो चुनाव आयुक्त कह रहे हैं कि श्री ज्ञानेश कुमार हमारी वोटिंग प्रणाली में हुई अव्यवस्था और नुकसान के लिए ज़िम्मेदार हैं।"

राहुल गांधी ने 'वोट-चोरी' को कानूनों और संस्थाओं से जोड़ा
गांधी ने एक ऐसी कड़ी का ज़िक्र किया जो वोट, कानूनों और संस्थाओं को आपस में जोड़ती है। उन्होंने कहा, "वोट-चोरी से कानून-चोरी होती है... कानून-चोरी से संस्था-चोरी होती है। यही वह कड़ी है जो बनी है।" गांधी ने तर्क दिया कि वोट के साथ किसी भी तरह की कथित छेड़छाड़ का असर संसद और उसके ज़रिए बनाई गई संस्थाओं पर पड़ेगा। उन्होंने कहा, "अगर वोट चोरी हुआ है और संसद में बैठे सांसद चोरी हुए वोट के आधार पर वहां हैं, तो उनके द्वारा बनाया गया कोई भी कानून गैर-कानूनी है, और उनके द्वारा किया गया कोई भी संस्थागत बदलाव भी गैर-कानूनी है।"

राहुल गांधी ने पहले किए गए 'वोट-चोरी' के दावों को याद किया
गांधी ने उन घटनाओं का भी ज़िक्र किया जो दो चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाए गए आपत्तियों से पहले हुई थीं। गांधी ने कहा, "21 दिसंबर 2023 को एक अजीब कानून पारित किया गया। एक ऐसा कानून पारित किया गया जो चुनाव आयुक्त को जांच से छूट देता है। वह भारतीय कानूनी प्रणाली के दायरे से बाहर है।" इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र पर हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा, "7 फरवरी को हमने महाराष्ट्र पर अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस की। हमने बहुत स्पष्ट रूप से कहा कि वोट-चोरी हो रही है, और हमने सबूत भी पेश किए।" गांधी ने कहा कि बाद में उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री को असहमति पत्र सौंपा, जिसमें चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन की प्रक्रिया को लेकर चिंताएं जताई गई थीं। उन्होंने कहा, "मेरी राय को नज़रअंदाज़ कर दिया गया और उस व्यक्ति को भारत के प्रधानमंत्री ने नियुक्त किया।"

राहुल गांधी ने महादेवपुरा और हरियाणा का ज़िक्र किया
गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने तब "महादेवपुरा वोट चोरी" के सबूत पेश किए और दावा किया कि बाद में और जानकारी सामने आने लगी। गांधी ने कहा, "हमने तब महादेवपुरा वोट चोरी का मामला दिखाया। धीरे-धीरे दबाव बढ़ रहा है क्योंकि हमें और ज़्यादा जानकारी मिल रही है। अंदर से जानकारी लीक हो रही है और हमें वह मिल रही है।" उन्होंने आगे कहा, "संस्था पर दबाव बढ़ रहा है और उन्हें समझ आ रहा है कि अब कोई समस्या आने वाली है।"

गांधी ने 16 अगस्त और 1 सितंबर को हुई "वोट-चोरी अधिकार यात्रा" का भी ज़िक्र किया, और उसके बाद 18 सितंबर को हुई घटना का ज़िक्र किया जिसे उन्होंने "अलंद वोट-चोरी" कहा। गांधी ने कहा "यहां, हम एक खास तरीका दिखा रहे हैं जो अपनाया जा रहा है। ये चिट्ठियां तब शुरू होती हैं, जब हमारे आलंद में वोट चोरी हुई और लगभग उसी समय जब हरियाणा में वोट चोरी हुई। गांधी ने कहा "चुनाव आयुक्तों को यह पता था। वे समझ रहे थे कि क्या हो रहा है। लेकिन फिर उन्होंने तय किया कि कुछ करने की ज़रूरत है। तभी ये चिट्ठियां शुरू हुईं।

इसके बाद गांधी ने कांग्रेस की उस प्रेजेंटेशन का ज़िक्र किया जिसे उन्होंने "हरियाणा वोट चोरी" कहा। उन्होंने कहा "हम हरियाणा में हुई वोट चोरी पर प्रेजेंटेशन देते हैं, जो सच कहूं तो सबसे चौंकाने वाली प्रेजेंटेशन है क्योंकि वहां बहुत ज़्यादा गड़बड़ियां हुई थीं। अब, वे दो सज्जन इसे सार्वजनिक करते हैं। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता-विरोधी लहर) कैसे गायब हो जाती है। गांधी ने एंटी-इनकंबेंसी के बारे में भी बात की और कहा कि ऐतिहासिक रूप से इसने पूरे भारत में राजनीतिक दलों और सरकारों को प्रभावित किया है।

गांधी ने कहा हरियाणा 50 सालों से कभी एक पार्टी तो कभी दूसरी पार्टी को चुनता रहा है। अचानक एंटी-इनकंबेंसी गायब हो जाती है। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही होता है; अचानक यह गायब हो जाती है। उत्तर प्रदेश में भी बदलाव होता है। कभी समाजवादी पार्टी, कभी बीएसपी; यह गायब हो जाती है। मध्य प्रदेश में, यह गायब हो जाती है। गुजरात में, यह गायब हो जाती है।

उन्होंने आगे कहा यह हमारे लिए एक बुनियादी सवाल रहा है। हम किसी व्यक्ति की लोकप्रियता और सरकार के कामकाज को तो समझ सकते हैं, लेकिन हम यह नहीं समझ सकते कि एंटी-इनकंबेंसी कैसे गायब हो जाती है। इसके बाद गांधी ने एंटी-इनकंबेंसी के न होने की स्थिति की तुलना उन राजनीतिक प्रणालियों से की जो लोकतांत्रिक नहीं हैं। उन्होंने कहा सद्दाम हुसैन के इराक में एंटी-इनकंबेंसी नहीं होती। उत्तर कोरिया में भी नहीं होती। इस धरती पर ऐसी कोई डेमोक्रेसी नहीं है जहां एंटी-इनकंबेंसी न हो। राहुल गांधी ने भारत में एंटी-इनकंबेंसी को एक 'बुनियादी ताकत' बताया।

गांधी ने अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि और एंटी-इनकंबेंसी के बारे में अपनी समझ पर भी बात की। गांधी ने कहा मैं यहां हाल ही में चर्चा में रही कुछ बातों पर अपनी राय रखना चाहता हूं। मैं एक राजनीतिक परिवार से आता हूं, और मैंने 50 से ज़्यादा साल एक राजनीतिक परिवार में बिताए हैं।

उन्होंने आगे कहा भारत में, एंटी-इनकंबेंसी नाम की एक बुनियादी ताकत है जो बहुत तेज़ी से किसी भी सरकार का विरोध करने लगती है। यह किसी को नहीं बख्शती। गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, "इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश युद्ध जीता था, वे अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थीं, और फिर अचानक, एक-दो साल के भीतर ही, भारी सत्ता-विरोधी लहर और भारी दबाव का सामना करना पड़ा।" गांधी ने कहा, "एक के बाद एक कई नेताओं के साथ बिल्कुल यही होता है। कांग्रेस नेताओं के साथ भी ऐसा होता है और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ भी।" उन्होंने आगे कहा, "लेकिन किसी वजह से, नरेंद्र मोदी, शाह या बीजेपी के साथ ऐसा कभी नहीं होता।"

राहुल गांधी ने वोट को संविधान और संस्थाओं से जोड़ा
गांधी ने वोट को संविधान, कानूनों और संस्थाओं से भी जोड़ा और उन्हें एक ही कड़ी का हिस्सा बताया। गांधी ने कहा, "वोट, जिसकी सुरक्षा चुनाव आयोग को करनी चाहिए, उसी से हमारे संविधान को ताकत मिलती है। संविधान से हमारे कानून बनते हैं और कानूनों से हमारी संस्थाएं बनती हैं। यह एक कड़ी है।" उन्होंने आगे कहा, "अगर वोट खत्म हो गया, तो हमारा संविधान भी खत्म हो गया। अगर संविधान खत्म हो गया, तो हमारे कानून गैर-कानूनी हो जाते हैं। अगर कानून गैर-कानूनी हैं, तो हमारी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं रह जाता।" गांधी ने कहा कि यह मुद्दा चुनावी व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा, "यहां मुख्य सवाल यह है कि यह सिर्फ वोट पर हमला नहीं है; यह हर भारतीय की सोच, बुनियादी ढांचे और अभिव्यक्ति पर हमला है।" गांधी ने आगे कहा, "हम बार-बार कह रहे हैं कि वोट को लेकर समस्या है।"

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Explained | विपक्ष ने की ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाने की मांग: भारत में CEC को कैसे हटाया जा सकता है? यहां जानें क्या हैं नियम

भारत के चुनाव आयोग (ECI) के अंदरूनी मतभेदों की खबरों के बीच, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने देश के शीर्ष चुनावी नेतृत्व पर तीखा हमला किया है और कथित वोट चोरी में शामिल लोगों को साफ तौर पर "देशद्रोही" कहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के सामने वोटर लिस्ट के कामकाज के तरीकों और डेटा मैनेजमेंट को लेकर 14 अलग-अलग मौकों पर औपचारिक रूप से लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इस विवाद के बीच, विपक्ष ने अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाने का संकल्प लिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कानूनी विशेषज्ञों की मदद से महाभियोग प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और जल्द ही संयुक्त विपक्ष की ओर से दोनों सदनों में इसका नोटिस सौंपा जाएगा।

इस विवाद के बीच, विपक्ष ने अब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाने का संकल्प लिया है। खबर है कि कानूनी विशेषज्ञों की मदद से महाभियोग प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और जल्द ही संयुक्त विपक्ष की ओर से दोनों सदनों में नोटिस सौंपा जाएगा। यह भविष्य में चुनाव आयुक्त के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?
• भारत के चुनाव आयोग पर देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की बड़ी जिम्मेदारी है।

• देश के राष्ट्रपति, तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं।

• इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और केंद्रीय कैबिनेट का एक सदस्य शामिल होते हैं।

• 2023 के कानून के अनुसार, चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त होने वाले लोगों के पास सरकार में सचिव स्तर के पदों पर काम करने का पूर्व अनुभव होना चाहिए।

• उन्हें चुनाव कराने और उनके प्रबंधन का ज्ञान और अनुभव होना चाहिए।

• आयुक्तों की नियुक्ति छह साल के कार्यकाल के लिए या 65 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो) की जाती है।

• मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जजों के समान सुविधाएं और वित्तीय लाभ मिलते हैं।

CEC को कैसे हटाया जा सकता है?
• संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरह और उन्हीं आधारों पर उनके पद से हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। • यह बात 2023 के एक्ट की धारा 11(2) में भी कही गई है।

• उन्हें सिर्फ़ "साबित गलत व्यवहार या अक्षमता" के आधार पर ही हटाया जा सकता है।

• गलत व्यवहार में कोई भी भ्रष्ट तरीका या पद का गलत इस्तेमाल शामिल हो सकता है।

• अक्षमता का मतलब ऐसी स्थिति से है जब कोई अधिकारी अपने कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हो।

• मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया जाएगा।

• भारत के चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को बहुत मुश्किल बना दिया गया है।

महाभियोग प्रस्ताव पेश होने के बाद क्या होता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, दोनों सदनों के सदस्यों को एक प्रस्ताव का नोटिस देना होता है, जिसे महाभियोग प्रस्ताव कहा जाता है, जिसमें गलत व्यवहार या अक्षमता का स्पष्ट आरोप लगाया जाता है। महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए, उस पर लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए। अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की सच्चाई का पता लगाने के लिए जांच की जाती है।

इसके बाद, संसद के दोनों सदनों में मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पद से हटाने का प्रस्ताव पास होना चाहिए। प्रस्ताव पास होने के बाद, राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आदेश देते हैं। संवैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद, राष्ट्रपति के पास इस मामले में संसद की सलाह पर काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।

महाभियोग प्रस्ताव कब खारिज किया गया?
अप्रैल में, राज्यसभा के चेयरमैन और लोकसभा के स्पीकर ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दोनों सदनों में विपक्ष द्वारा लाए गए महाभियोग प्रस्तावों को खारिज कर दिया। इस साल 12 मार्च को, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाने में विपक्ष का नेतृत्व किया, जिसमें लोकसभा प्रस्ताव पर 130 सांसदों और राज्यसभा प्रस्ताव पर 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। उस समय, मुख्य चुनाव आयुक्त पर पक्षपाती और भेदभावपूर्ण व्यवहार करने और चुनाव धोखाधड़ी और SIR की जांच में बाधा डालने का आरोप लगाया गया था।

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