उच्च शिक्षा से जुड़े अधिकार को आसानी से नहीं छीना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने उच्च और व्यावसायिक शिक्षा को लेकर अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि भले ही संविधान के तहत उच्च शिक्षा हासिल करने के अधिकार को अलग से मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट नहीं किया गया हो, लेकिन इसे बिना ठोस वजह के सीमित नहीं किया जा सकता. अदालत के मुताबिक राज्य की जिम्मेदारी है कि वह किसी व्यक्ति को उच्च शिक्षा जारी रखने के अवसर से सिर्फ हल्के या कमजोर आधार पर वंचित न करे.
मामला नीट-यूजी 2024 परीक्षा से जुड़ा
यह टिप्पणी जस्टिस जसमीत सिंह की अदालत ने एक मेडिकल छात्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए की. मामला नीट-यूजी 2024 परीक्षा से जुड़ा था. छात्र हर्षित अग्रवाल ने परीक्षा में शामिल होने के बाद ओडिशा के भीमा भोई मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, बलांगीर में एमबीबीएस में दाखिला लिया था. उसने मेरिट के आधार पर सीट हासिल की थी. बाद में उसका दाखिला रद्द कर दिया गया और उसे मेडिकल कोर्स से बाहर कर दिया गया.
जांच में गवाह के तौर पर शामिल
मामले की पृष्ठभूमि नीट-यूजी 2024 में कथित पेपर लीक और दूसरी अनियमितताओं की जांच से जुड़ी थी. केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई इस मामले की जांच कर रही थी. जांच के दौरान कुछ उम्मीदवारों के नाम सामने आए थे. छात्र का नाम भी जांच से जुड़े लोगों की सूची में आया, लेकिन अदालत के सामने रखी गई जानकारी के मुताबिक उसे मामले में आरोपी नहीं बनाया गया था. वह जांच में गवाह के तौर पर शामिल था.
भरोसेमंद कारण होना जरूरी
छात्र की तरफ से दलील दी गई कि सिर्फ जांच में नाम आने के आधार पर उसकी पढ़ाई रोकना उचित नहीं है. अदालत ने भी इस पहलू को महत्वपूर्ण माना. कोर्ट ने कहा कि जब किसी छात्र ने खुली प्रवेश परीक्षा में मेरिट के आधार पर दाखिला हासिल किया हो और उसके खिलाफ किसी गड़बड़ी में शामिल होने की प्रथम दृष्टया पुष्टि नहीं हुई हो, तो उसकी पढ़ाई रोकने के लिए ठोस और भरोसेमंद कारण होना जरूरी है.
छात्र को आरोपी नहीं बताया गया
अदालत ने यह भी देखा कि सीबीआई की ओर से छात्र को आरोपी नहीं बताया गया था. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक जांच एजेंसी की चार्जशीट में भी छात्र आरोपी के तौर पर शामिल नहीं था. ऐसे में केवल जांच के दायरे में आने के आधार पर उसके मेडिकल कोर्स को रोकना अदालत को उचित नहीं लगा. हाईकोर्ट ने कहा कि छात्र ने प्रवेश परीक्षा पास कर जो शैक्षणिक अवसर हासिल किया है, वह महत्वपूर्ण है. किसी छात्र की पढ़ाई बीच में रोकने से उसकी आगे की शिक्षा और करियर पर सीधा असर पड़ सकता है. इसलिए ऐसा फैसला लेने से पहले संबंधित संस्थान और अधिकारियों को ठोस तथ्यों पर विचार करना होगा. अदालत ने अंततः छात्र की याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित पक्षों को उसे एमबीबीएस की पढ़ाई जारी रखने की अनुमति देने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा कि छात्र को पाठ्यक्रम के मुताबिक अपनी कक्षाओं में शामिल होने दिया जाए.
इस फैसले में हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षा के अधिकार को लेकर राज्य की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया. अदालत का संदेश साफ था कि किसी छात्र की उच्च या व्यावसायिक शिक्षा को रोकने जैसा कदम तभी उठाया जाना चाहिए, जब उसके पीछे वैध, वास्तविक और ठोस वजह मौजूद हो. केवल किसी जांच या संदेह से जुड़े होने के आधार पर छात्र की पढ़ाई रोकना पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता.
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