IIT Bombay में छात्र की मौत पर न्यायिक जांच की मांग, Congress के प्रदर्शन के बाद भारी सुरक्षा तैनात
मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद वर्षा गायकवाड़ के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन के बाद, गुरुवार को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (IIT) बॉम्बे के मुख्य गेट के बाहर भारी सुरक्षा इंतज़ाम किए गए और पुलिस बैरिकेड्स लगाए गए। यह विरोध प्रदर्शन दूसरे साल के छात्र साहिल वाकोडे की दुखद मौत के मामले में जवाबदेही और न्याय की मांग के लिए आयोजित किया गया था। वाकोडे की मौत से जुड़े हालात की पूरी और स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग करते हुए, वर्षा गायकवाड़ ने बताया कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने छात्र के परिवार से बात की है और उन्हें पूरा समर्थन देने का भरोसा दिलाया है। राहुल जी ने परिवार से बात की और उन्हें भरोसा दिलाया हम आपकी लड़ाई लड़ेंगे और साहिल को न्याय दिलाकर रहेंगे। IIT बॉम्बे में यह कोई अकेली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं पहले भी कई बार हो चुकी हैं और हमने पूरी जांच की मांग की थी। हम देख रहे हैं कि शिक्षा का व्यवस्थित रूप से RSS-करण किया जा रहा है, धार्मिक बंटवारे को बढ़ावा दिया जा रहा है और खुलेआम भेदभाव किया जा रहा है। जब हम यहां सवाल करने आते हैं, तो वे हमें चुप कराने और दबाने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल करते हैं। मेरा सवाल है: BJP ने शिक्षा व्यवस्था का क्या हाल कर दिया है?
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उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह दुखद घटना एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है और आरोप लगाया कि जाति और धर्म की राजनीति की जा रही है। अहम प्रशासनिक पदों और वाइस-चांसलर की राजनीतिक नियुक्तियों की आलोचना करते हुए गायकवाड़ ने कहा कि इसकी पूरी जांच ज़रूरी है और शिक्षा व्यवस्था पर विचारधारा के इस कब्ज़े को खत्म करना होगा। वाइस-चांसलर से लेकर अहम प्रशासनिक पदों तक, राजनीतिक नियुक्तियां बड़े पैमाने पर हो रही हैं। गायकवाड़ ने इस घटना को महज़ आत्महत्या मानने से इनकार कर दिया; इसके बजाय, उन्होंने इसे बड़े शिक्षण संस्थानों में गहरी जड़ें जमा चुकी जातिवाद, सांप्रदायिकता और विचारधारा के दखल के कारण हुई संस्थागत मौत बताया। उन्होंने कहा हम देख रहे हैं कि RSS ने विश्वविद्यालयों और IIT में घुसपैठ कर ली है और वहां बड़े पैमाने पर जातिवाद और सांप्रदायिकता फैला रही है। हमारी नज़र में, साहिल वाकोडे की दुखद मौत जिसे आत्महत्या कहा जा रहा है। असल में आत्महत्या नहीं है; यह एक संस्थागत मौत है। आज इसके लिए किसी न किसी को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। अगर आप विश्वविद्यालयों में छात्र और फैकल्टी के अनुपात को देखें, तो आपको साफ़ तौर पर बड़े पैमाने पर भेदभाव और असमानता दिखाई देगी। हर कोई जानता है कि जातिगत भेदभाव क्या है और इसकी वजह से छात्रों को क्या-क्या झेलना पड़ता है।
J&K Assembly में 2019 से पहले नियुक्त शिक्षकों को TET से छूट का प्रस्ताव पारित
जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने बृहस्पतिवार को 31 अक्टूबर, 2019 से पहले नियुक्त शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) से छूट देने की मांग वाला प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया। स्कूल शिक्षा मंत्री सकीना इटू ने मंगलवार को विधानसभा में यह प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर ने कहा कि कई सदस्य इस मुद्दे पर बोलना चाहते हैं, जिसके बाद इसे बृहस्पतिवार तक के लिए टाल दिया गया। प्रस्ताव में शिक्षा का अधिकार अधिनियम में संशोधन कर 31 अक्टूबर, 2019 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी में शामिल होने से छूट देने की मांग की गई।
प्रस्ताव में कहा गया, ‘‘यह सदन सर्वसम्मति से केंद्र सरकार से आग्रह करता है कि ‘बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम-2009’ की धारा 23 में आवश्यक वैधानिक संशोधन किया जाए, ताकि 31 अक्टूबर, 2019 से पहले नियुक्त सभी शिक्षकों को टीईटी में शामिल होने से छूट दी जा सके।’’ इसमें कहा गया, ‘‘यह सदन शिक्षकों को टीईटी से छूट देने के लिए सभी आवश्यक कानूनी कदम उठाने और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के माध्यम से आवश्यक अधिसूचना जारी करने का केंद्र सरकार से भी आग्रह करता है।’’ चर्चा के दौरान सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के विधायक फारूक शाह ने कहा कि कई वर्षों से काम कर रहे शिक्षकों को टीईटी से छूट दी जानी चाहिए, जबकि नए शिक्षकों के लिए (इस) परीक्षा का आयोजन किया जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने कहा कि शिक्षकों को नियमित प्रशिक्षण के लिए भेजा जाना चाहिए। विधायक ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) स्थापित करने और उन्हें मजबूत करने की भी मांग की।
एक अन्य नेकां विधायक नजीर गुरेजी ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि शिक्षकों को सबसे अधिक वेतन मिलना चाहिए, क्योंकि वे ऐसे छात्रों को पढ़ाते हैं जो आगे चलकर चिकित्सक, अभियंता और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी बनते हैं। इटू ने प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए सदस्यों का आभार जताया और कहा कि केवल एक अन्य राज्य ने ही ऐसा प्रस्ताव पारित किया है। उन्होंने कहा, ‘‘जम्मू-कश्मीर दूसरा राज्य होगा।
हमें केंद्र सरकार के समक्ष यह रखना होगा कि हम शिक्षकों की गरिमा के किसी भी तरह के हनन का समर्थन नहीं कर सकते। हम यह नहीं कह रहे हैं कि शिक्षक परीक्षा नहीं दे सकते, लेकिन हम उनसे परीक्षा देकर अपनी योग्यता साबित करने के लिए नहीं कह सकते, जबकि उनके कई छात्र चिकित्सक और आईएएस अधिकारी बन चुके हैं।’’ इटू ने कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार इस मामले को लेकर पहले ही उच्चतम न्यायालय का रुख कर चुकी है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सदस्यों से केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की अपील की कि वह उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह बताए कि शिक्षक परीक्षा देने में सक्षम हैं, लेकिन यह उनकी गरिमा का सवाल है।
मंत्री ने सदन से प्रस्ताव पारित करने का आग्रह किया। चर्चा के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने प्रस्ताव को ध्वनिमत से मतदान के लिए सदस्यों के समक्ष रखा, जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया।
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