TMC की टूट के बाद चुनाव चिन्ह पर बवाल! 'लिफाफे' को लेकर कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से मांगा जवाब
पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनावों से पहले एक चुनाव चिन्ह को लेकर छिड़ा विवाद अब कलकत्ता हाईकोर्ट तक जा पहुंचा है. मामला जुड़ा है तृणमूल कांग्रेस से बगावत कर बनी नई पार्टी 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' को मिले 'लिफाफा' चुनाव चिन्ह से जिसे लेकर हाईकोर्ट ने खुद चुनाव आयोग से सवाल पूछ लिए हैं.
यह पूरा विवाद शुरू कहां से हुआ?
मई 2026 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा से हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ी टूट देखने को मिली थी. पार्टी के कुल 80 विधायकों में से करीब 60 विधायकों ने बगावत करते हुए निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुन लिया था. इसी घटनाक्रम के बाद चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके मशहूर 'जोड़ा फूल' चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया था.
West Bengal में दोनों गुटों को कौन सा नाम और चिन्ह मिला?
चुनाव आयोग ने पार्टी संस्थापक ममता बनर्जी के गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम दिया और उन्हें फुटबॉलर का चुनाव चिन्ह आवंटित किया था. वहीं, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम के साथ 'लिफाफा' का चुनाव चिन्ह दिया था.
#BREAKING Calcutta High Court says @ecisveep should act fairly and impartially, after it allotted a symbol used by ISF to contest the WB assembly elections to the TMC-D faction for the upcoming by-polls. https://t.co/j2iEwu21JF
— Live Law (@LiveLawIndia) September 24, 2026
'लिफाफा' चुनाव चिन्ह से विवाद क्यों खड़ा हुआ?
दरअसल यह 'लिफाफा' चिन्ह पहले से ही इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) का आधिकारिक चुनाव चिन्ह रहा है. पार्टी इसी निशान पर 2021 और 2026 दोनों विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है और भांगड़ सीट से पार्टी के इकलौते विधायक नौशाद सिद्दीकी इसी चिन्ह के दम पर लगातार दो बार जीत चुके हैं. ऐसे में यह चिन्ह अचानक किसी और पार्टी को दिए जाने से ISF के भीतर गहरी नाराजगी फैल गई, इस बारे में उन्होंने प्रशासन के सामने अपनी आपत्ति भी जताई है.
ISF का इस पर क्या कहना है?
ISF नेता नौशाद सिद्दीकी का कहना है कि यह चिन्ह उनके मतदाताओं के बीच पहले से बेहद पहचाना हुआ है और उपचुनाव से ठीक पहले इसे बदलना सीधे तौर पर मतदाताओं को भ्रमित करने वाला कदम है. उनका आरोप है कि यह पूरी कवायद बागी तृणमूल गुट को उनके समर्थकों के वोट आसानी से दिलाने की एक सोची-समझी चाल जैसी लगती है. पार्टी ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर बिना उनसे सलाह-मशविरा किए यह चिन्ह बदल कैसे दिया गया. उन्होंने कहा कि इस बारे में उनकी पार्टी पदाधिकारियों को नहीं बताया गया, जो गलत है.
चुनाव आयोग का इस पर क्या पक्ष है?
एक रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग की दलील है कि ISF एक गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है. इसलिए उसके पास किसी आरक्षित चुनाव चिन्ह पर दावा करने का अधिकार नहीं है. यही वजह है कि आयोग ने इस चिन्ह को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' को आवंटित करना उचित समझा और बदले में ISF को 'अलमारी' का नया चुनाव चिन्ह दे दिया.
हाईकोर्ट में मामला कैसे पहुंचा?
अपने पुराने चुनाव चिन्ह को लेकर हुए इस बदलाव के खिलाफ ISF ने कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया. बता दें जस्टिस कृष्णा राव की सिंगल बेंच के सामने यह याचिका सुनवाई के लिए पेश हुई. सुनवाई के दौरान पार्टी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि जब ISF पहले से इसी चिन्ह पर चुनाव लड़ चुकी है तो अचानक दूसरी पार्टी के बीच विवाद में उसी चिन्ह को किसी और को सौंप देना कहां तक उचित अधिकार का इस्तेमाल माना जा सकता है.
West Bengal government tells Calcutta High Court that plea by Mamata Banerjee-led TMC seeking defreeze of three bank accounts frozen is now infructuous.
— Bar and Bench (@barandbench) September 21, 2026
State argues this plea should be closed as infructuous since ECI recently ordered a freeze on TMC party name and symbol. pic.twitter.com/Wk0UVhxM87
हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को क्या फटकार लगाई?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में चुनाव आयोग से पूछा कि जब उसके पास कुल 183 चुनाव चिन्ह मौजूद हैं तो आखिर उसने यही 'लिफाफा' वाला चिन्ह क्यों चुना. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस तरह के फैसले पार्टियों को बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर कर रहे हैं जिससे न्यायपालिका पर अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है।
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अदालत ने अब क्या आदेश दिया है?
कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से इस पूरे मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब की है. अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि आयोग बताए कि आखिर 'लिफाफा' चिन्ह को ऋतब्रत बनर्जी के गुट को आवंटित करने के पीछे उसका क्या तर्क है.
डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस की तरफ से क्या सफाई दी गई?
पार्टी प्रवक्ता ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए यही दोहराया कि चूंकि ISF एक गैर-मान्यता प्राप्त दल है. इसलिए आयोग का यह फैसला नियमों के दायरे में पूरी तरह सही है.
इस पूरे विवाद का उपचुनाव पर क्या असर पड़ सकता है?
गौरतलब है कि ISF ने वामपंथी दल CPI(M) के साथ अपना लंबे समय का गठबंधन तोड़ते हुए नंदीग्राम उपचुनाव से अली मोहम्मद साबे मिराज खान को अपने दम पर मैदान में उतारा है. नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होना है. ऐसे में चुनाव चिन्ह को लेकर मचा यह विवाद ठीक मतदान से पहले दोनों पार्टियों के लिए प्रचार और मतदाताओं तक पहुंच की रणनीति पर सीधा असर डाल सकता है.
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कजाकिस्तान में हो रहा मध्य एशिया का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास, 7000 सैनिक हुए शामिल
Kazakhstan Military Exercise: सितंबर 2026 में कजाकिस्तान मध्य एशिया का इस साल का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास कर रहा है. रणनीतिक कमांड-एंड-स्टाफ अभ्यास 'बैटिल तोइतारिस 2026' में करीब 7,000 सैनिक और लगभग 2,000 हथियार व सैन्य उपकरण शामिल हैं.
इस अभ्यास की खास बात इसका बड़ा पैमाना ही नहीं, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी है. कजाकिस्तान यह परख रहा है कि उसकी थल सेना, वायुसेना, नौसेना, सैन्य कमांड और क्षेत्रीय बल एक साथ मिलकर कितनी प्रभावी तरीके से काम कर सकते हैं. अभ्यास में बिना पायलट वाले विमान यानी UAV और FPV ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, कई स्तरों वाली एयर डिफेंस, डिजिटल कमांड सेंटर, रोबोटिक सिस्टम और निगरानी जैसी तकनीकों को शामिल किया गया है. इसके अलावा सैनिकों की तेजी से तैनाती और अलग-अलग सैन्य इकाइयों के बीच बेहतर तालमेल पर भी जोर दिया जा रहा है.
सैन्य तैयारियों को परख रहा कजाकिस्तान
इस अभ्यास के जरिए कजाकिस्तान आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों के हिसाब से अपनी सैन्य तैयारियों को परख रहा है. इसमें जमीन, हवा और समुद्र से जुड़े सैन्य अभियानों के साथ नई तकनीकों को एक साथ इस्तेमाल करने की क्षमता का परीक्षण किया जा रहा है. 'बैटिल तोइतारिस 2026' को कजाकिस्तान की सैन्य तैयारियों और आधुनिक तकनीक को अपनाने की दिशा में एक अहम अभ्यास के तौर पर देखा जा रहा है. यह अभ्यास यह भी दिखाता है कि मध्य एशिया में सैन्य संगठन आधुनिक युद्ध तकनीक और डिजिटल सिस्टम पर कितना ध्यान दे रहे हैं.
कई हिस्से, एक रणनीतिक सोच
'बैटिल तोइतारीस' (Batyl Toitarys) की मुख्य खासियत यह है कि इसमें कई तरह की सेनाएं और गतिविधियां एक साथ शामिल होती हैं. हवाई हिस्से में एयर डिफेंस फोर्सेज की 'अश्याक अस्पन 2026' (Ashyk Aspan 2026) एक्सरसाइज शामिल है; जमीनी हिस्से में 'आइबाल्टा 2026' (Aibalta 2026); और समुद्री हिस्से में 'खज़ार' (KHAZAR) एक्सरसाइज. 'बेकेट 2026' (Beket 2026) में क्षेत्रीय और अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल का पहलू शामिल है.
इन राष्ट्रीय युद्धाभ्यासों के साथ एक अलग अंतरराष्ट्रीय हिस्सा भी जुड़ा है: 'फ्रंटियर 2026' (Frontier 2026), जो कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन (CSTO) के सेंट्रल एशियन रीजन (CRDF CAR) की 'कलेक्टिव रैपिड डिप्लॉयमेंट फोर्सेज' की एक एक्सरसाइज है. 'फ्रंटियर' को 'बैटिल तोइतारीस' के साथ एक ही सोच के तहत आयोजित किया गया था। इसमें लगभग 1,500 जवान, 300 से ज़्यादा सैन्य और खास उपकरण, और 115 UAV शामिल थे. इसलिए कजाकिस्तान सिर्फ एक टैंक ब्रिगेड, एविएशन यूनिट या एयर-डिफ़ेंस सिस्टम का ही टेस्ट नहीं कर रहा है. वह यह भी देख रहा है कि क्या उसकी सेना के अलग-अलग हिस्से एक साथ मिलकर काम कर सकते हैं या नहीं.
यह काबिलियत आधुनिक सेना की क्षमता को मापने का एक मुख्य पैमाना बनती जा रही है. अब सिर्फ काबिल एयरक्राफ्ट, टैंक या ज़मीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल सिस्टम का होना ही काफी नहीं है. इंटेलिजेंस, मज़बूत कम्युनिकेशन और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम के जरिए उन्हें आपस में जुड़ा होना चाहिए, ताकि टारगेट के बारे में जानकारी को जल्द से जल्द फैसले और फिर कार्रवाई में बदला जा सके.
हवा से होने वाले नए तरह के खतरों के खिलाफ एयर डिफेंस
एयर डिफेंस का पहलू खास तौर पर सीखने लायक है. सरीशागन में, बड़े पैमाने पर हवाई हमलों को रोकने की तैयारी को परखने के लिए 'बैटिल तोइतारिस' (Batyl Toitarys) के तहत 'अशिक अस्पन 2026' (Ashyk Aspan 2026) अभ्यास किया गया। इसमें एयर फ़ोर्स यूनिट्स, एयर-डिफेंस फॉर्मेशन्स और EW (इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर) यूनिट्स ने मिलकर काम किया. यह पारंपरिक एयर-डिफेंस स्थितियों से काफी अलग है. आज, हवाई खतरों में एक साथ एयरक्राफ्ट, मिसाइलें, टोही प्लेटफॉर्म, स्ट्राइक UAV और सस्ते FPV सिस्टम शामिल हो सकते हैं. ऐसे मिले-जुले खतरों का मुकाबला किसी एक हथियार सिस्टम से करना लगभग नामुमकिन है. इस अभ्यास में कई स्तरों वाली एयर डिफेंस, एयर-डिफेंस एम्बुश (घात लगाकर हमला), ऑफ़-बोर्ड टारगेट डेज़िग्नेशन (लक्ष्य की पहचान), तेजी से जगह बदलना और अलग-अलग तरह के UAV के खिलाफ जवाबी उपाय शामिल थे.
रडार और EW सिस्टम को एक साझा इंटेलिजेंस और सर्विलांस पिक्चर (निगरानी की जानकारी) में जोड़ा गया था. यह एक अहम बात है। कज़ाकिस्तान एयर डिफेंस का परीक्षण अलग-अलग बैटरी के समूह के तौर पर नहीं, बल्कि 'सिस्टम ऑफ़ सिस्टम्स' (कई सिस्टम के एक साथ काम करने वाले सिस्टम) के तौर पर कर रहा है, जिसमें लक्ष्य का पता लगाना, उसकी पहचान करना, इलेक्ट्रॉनिक असर डालना और हमला करना - ये सब एक ही कड़ी का हिस्सा होने चाहिए.
FPV ड्रोन युद्ध का आम हिस्सा बनते जा रहे हैं
कुछ साल पहले तक, FPV ड्रोन को एक खास तरह की टेक्नोलॉजी माना जाता था. अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं. सस्ते ड्रोन टोही और हमले के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले हथियार बन गए हैं. इससे सेनाओं को यूनिट की रणनीति, जमीनी किलेबंदी, छिपने के तरीकों और एयर डिफेंस के बारे में एक साथ नए सिरे से सोचने पर मजबूर होना पड़ा है.
दूसरी तरफ, नकली दुश्मन द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ऐसे ही सिस्टम के खिलाफ कई स्तरों वाली सुरक्षा है: जैसे EW (इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर), एयर डिफेंस, छिपने की तकनीक, फील्ड इंजीनियरिंग और पैंतरेबाजी. यह आज के दौर की लड़ाइयों की एक अहम खासियत है, और कजाकिस्तान साफ तौर पर इन सीखों को अपनी कॉम्बैट ट्रेनिंग में शामिल करने की कोशिश कर रहा है.
ड्रोन से लेकर जमीनी रोबोट तक
इसमें एक कम साफ़ दिखने वाला तकनीकी पहलू भी है. कजाकिस्तान की सेना धीरे-धीरे बिना इंसानी मदद के चलने वाले जमीनी सिस्टम की क्षमता को परखने लगी है. इस काम से पहले 'शायकस' (Shaiqas) नाम की मिलिट्री-इंजीनियरिंग प्रतियोगिता हुई थी, जिसमें हवाई और जमीनी सिस्टम की जांच की गई थी। इसके बाद, सबसे अच्छे डिजाइनों को सैनिकों के साथ मिलकर प्रैक्टिकल ट्रायल का मौका मिला.
इस तरीके पर ध्यान देना जरूरी है
मिलिट्री रोबोटिक्स किसी प्रदर्शनी में तो प्रभावशाली लग सकते हैं, लेकिन युद्ध के मैदान की जरूरतें बिल्कुल अलग होती हैं: जैसे भरोसेमंद होना, मुश्किल रास्तों पर चलने की क्षमता, मज़बूत कम्युनिकेशन सिस्टम, आसानी से मरम्मत और चलाने में आसान होना. इसलिए, किसी एक्सपेरिमेंटल सिस्टम को सीधे डेमो हॉल से निकालकर बड़े मिलिट्री अभ्यास में ले जाने से उसकी असल उपयोगिता काफी जल्दी पता चल सकती है. यहां तक कि साधारण रोबोटिक प्लेटफ़ॉर्म भी आगे चलकर ऐसे काम कर सकते हैं जिनमें लोगों के लिए ज्यादा जोखिम होता है, जैसे खतरनाक इलाकों की टोह लेना, गोला-बारूद पहुंचाना या घायलों को सुरक्षित बाहर निकालना.
एक नए बख्तरबंद वाहन से ज्यादा जरूरी एक डिजिटल हेडक्वार्टर हो सकता है. मेरी नजर में, 'बैटिल टॉयटारिस' (Batyl Toitarys) की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक है डिजिटल हेडक्वार्टर कॉन्सेप्ट का ट्रायल. मैटिबुलक में तैयारियों के दौरान, सीनियर जनरल स्टाफ अधिकारियों और डिजिटलाइजेशन के लिए जिम्मेदार रक्षा अधिकारियों ने अलग-अलग इसके कामकाज और सपोर्टिंग इन्फॉर्मेशन और कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर की जांच की.
मैदानों से कैस्पियन सागर तक
इलाके की विविधता इसमें शामिल फ़ोर्स की विविधता से मेल खाती है. हवाई पहलू को 'अश्याक अस्पन' (Ashyk Aspan), जमीनी पहलू को 'आइबाल्टा' (Aibalta), नौसैनिक पहलू को 'खजार' (KHAZAR) और क्षेत्रीय व अंतर-एजेंसी पहलू को 'बेकेट' (Beket) के जरिए दिखाया जाता है. कैस्पियन सागर में, नौसैनिक फोर्स को जमीनी ट्रेनिंग रेंज वाली यूनिट्स से बिल्कुल अलग काम करने पड़ते हैं.
सैन्य शक्ति के क्षेत्रीय केंद्र के रूप में कजाकिस्तान
मध्य एशिया में अपनी सैन्य क्षमताओं का साफ़ तौर पर आधुनिकीकरण हो रहा है. इस क्षेत्र के देश नए विमान और बिना पायलट वाले सिस्टम (unmanned systems) हासिल कर रहे हैं, घरेलू रक्षा उद्योग विकसित कर रहे हैं, हवाई सुरक्षा को बेहतर बना रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय सैन्य सहयोग बढ़ा रहे हैं. इस पृष्ठभूमि में, 'बैटिल तोइतारीस 2026' (Batyl Toitarys 2026) का दायरा और महत्व कजाकिस्तान को मध्य एशिया में सैन्य शक्ति और सुरक्षा समन्वय के प्रमुख केंद्रों में से एक के रूप में देखने का आधार बनता है.
यह सिर्फ 7,000 जवानों और 2,000 उपकरणों की बात नहीं है.
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