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यूपी में 21 सीटों का सियासी टेस्ट! राज्यसभा से MLC तक, 2027 से पहले किसकी कैसी तैयारी?

Explainer: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ मौका आ रहा है. ये मौका है विधानसभा चुनाव 2027 का. हालांकि इससे पहले भी प्रदेश का सियासी पारा हाई होने वाला है और इसकी वजह है  अक्टूबर का महीना. एक तरफ राज्यसभा की 10 सीट के लिए चुनाव होना है वहीं दूसरी तरफ विधान परिषद की 11 सीटों पर भी वोटिंग होगी.

राज्यसभा चुनाव की तारीख 16 अक्टूबर है वहीं शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 11 एमएलसी सीट पर 23 अक्टूबर को वोटिंग होगी. ऐसे में दोनों चुनावों को विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल कहा जाए तो गलत नहीं होगा. यही कारण है कि सभी राजनीतिक दलों के संगठन, रणनीति और चुनावी प्रबंधन की परीक्षा के तौर पर इसे देख रहे हैं. 

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि इन चुनावों की प्रकृति विधानसभा चुनाव से अलग है.  राज्यसभा चुनाव में विधायक वोट करते हैं, जबकि शिक्षक और स्नातक क्षेत्र की MLC सीटों के लिए संबंधित पंजीकृत मतदाता मतदान करते हैं. इसलिए दोनों चुनाव अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों की तस्वीर पेश कर सकते हैं. फिर इन चुनावों के नतीजे निश्चित रूप से जनता और नेता के मन की बात जरूर बता देते हैं. 

16 अक्टूबर को राज्यसभा की 10 सीटों पर मतदान

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होगा. चुनाव आयोग ने 29 सितंबर को अधिसूचना जारी करने, 6 अक्टूबर तक नामांकन, 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच और 9 अक्टूबर तक नाम वापसी की तारीख तय की है. मतदान होने की स्थिति में 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक वोटिंग होगी और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी.

10 में से किस दल के पास कितनी सीट?

इन 10 सीटों में फिलहाल आठ सीटें बीजेपी, एक समाजवादी पार्टी और एक बहुजन समाज पार्टी के पास हैं. इनमें राम गोपाल यादव और रामजी गौतम जैसे मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है. एक सीट पहले ही खाली हो चुकी है, क्योंकि पूर्व सांसद दिनेश शर्मा ने इस्तीफा देकर अंडमान-निकोबार के उपराज्यपाल का पद संभाला है.

राज्यसभा चुनाव में संख्या बल सबसे बड़ा फैक्टर

राज्यसभा का चुनाव सीधे जनता नहीं करती. इसमें उत्तर प्रदेश विधानसभा के निर्वाचित विधायक मतदान करते हैं और चुनाव सिंगल ट्रांसफरेबल वोट यानी एकल संक्रमणीय मत वाली आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से होता है. मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन की स्थिति मजबूत दिखाई देती है. मीडिया रिपोर्टों में बीजेपी के आठ सीटें हासिल करने की संभावना पर चर्चा है, जबकि सपा अपनी मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर दो सीटों की स्थिति में बताई जा रही है.

लेकिन अंतिम नतीजे उम्मीदवारों की संख्या और विधायकों के वोटों पर निर्भर करेंगे. यदि अपेक्षा से अधिक उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं तो अतिरिक्त वोटों का महत्व बढ़ सकता है.

क्रॉस-वोटिंग पर क्यों टिकी नजर?

राज्यसभा चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा क्रॉस-वोटिंग और फ्लोर मैनेजमेंट को लेकर है. 2024 के राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपेक्षित संख्या से अलग परिणाम आया था और बीजेपी ने आठ सीटें जीती थीं. उस चुनाव में सपा के कुछ विधायकों के क्रॉस-वोटिंग करने की रिपोर्ट सामने आई थी.

इस बार भी यदि मुकाबला अतिरिक्त सीटों तक जाता है, तो पार्टियों के लिए अपने विधायकों को एकजुट रखना महत्वपूर्ण होगा. उम्मीदवारों का चयन, सहयोगी दलों का समर्थन, विधायकों के वोटों का प्रबंधन और पार्टी के भीतर अनुशासन ये सभी पहलू चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण रहेंगे.

इसलिए राज्यसभा चुनाव को केवल सीटों की संख्या के लिहाज से नहीं, बल्कि दलों की संगठनात्मक क्षमता और विधानसभा के भीतर उनके प्रबंधन के लिहाज से भी देखा जा रहा है.

23 अक्टूबर को 11 MLC सीटों का चुनाव

राज्यसभा चुनाव के ठीक एक सप्ताह बाद उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान होगा. ये सीटें शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से संबंधित हैं.

यह चुनाव राज्यसभा से बिल्कुल अलग है. यहां विधानसभा के सभी विधायक वोट नहीं करते, बल्कि संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत शिक्षक और स्नातक मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं.

यही वजह है कि इन चुनावों में स्थानीय संगठन, मतदाता पंजीकरण, बूथ स्तर की तैयारी और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ का महत्व बढ़ जाता है.

शिक्षक और स्नातक मतदाता क्यों अहम?

शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों को लंबे समय से राजनीतिक दलों के लिए अलग तरह की चुनौती माना जाता है. यहां चुनावी मुद्दों में शिक्षा, रोजगार, भर्ती, वेतन, पुरानी पेंशन, विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों से जुड़े सवाल तथा सरकारी कर्मचारियों से जुड़े विषय प्रमुख हो सकते हैं.

इसी वजह से राजनीतिक दलों के लिए इन सीटों पर उम्मीदवार का स्थानीय नेटवर्क और संबंधित मतदाताओं के बीच सक्रियता महत्वपूर्ण होती है.

सपा अपने सामाजिक समीकरण और शिक्षक-कर्मचारी मुद्दों को लेकर मैदान तैयार कर रही है, जबकि बीजेपी का जोर संगठनात्मक नेटवर्क और मतदाता संपर्क पर रहने की बात सामने आ रही है.

सपा के लिए MLC चुनाव क्यों महत्वपूर्ण?

विधान परिषद की 100 सदस्यीय सदन में सपा के फिलहाल 10 सदस्य हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह संख्या नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए आवश्यक 10 प्रतिशत के स्तर से जुड़ी हुई है. इसलिए इन 11 सीटों के नतीजे सपा की परिषद में स्थिति पर भी असर डाल सकते हैं.

इसके अलावा MLC चुनाव विपक्षी दलों के बीच आपसी तालमेल की भी परीक्षा हो सकते हैं. शिक्षक और स्नातक सीटों पर स्थानीय स्तर के समीकरण विधानसभा चुनावों से अलग होते हैं, इसलिए यहां उम्मीदवारों की व्यक्तिगत स्वीकार्यता और संगठन की पहुंच दोनों महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

बीजेपी के सामने क्या चुनौती है?

बीजेपी के लिए दोनों चुनाव अलग-अलग तरह की परीक्षा लेकर आए हैं. राज्यसभा में चुनौती मुख्य रूप से विधानसभा के संख्या बल को चुनावी नतीजे में बदलने की है. वहीं MLC चुनाव में पार्टी को उन मतदाताओं तक पहुंच बनानी होगी जो सीधे विधानसभा चुनाव के सामान्य मतदाता नहीं हैं, बल्कि विशेष निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत हैं.
यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी संगठन पहले से चुनावी तैयारियों में जुटा है. ऐसे में अक्टूबर के ये चुनाव स्थानीय संगठन की सक्रियता और केंद्रदीय नेतृत्व की रणनीति के बीच तालमेल का भी संकेत दे सकते हैं. 

2027 से पहले क्यों अहम है अक्टूबर का मुकाबला?

इन चुनावों को सीधे 2027 विधानसभा चुनाव का परिणाम मानना सही नहीं होगा. दोनों चुनावों की मतदाता संरचना और चुनावी प्रणाली अलग है. फिर भी इनसे पार्टियों को अपनी संगठनात्मक स्थिति का आकलन करने का अवसर मिलेगा. 

राज्यसभा चुनाव में विधायकों का समर्थन, गठबंधन और फ्लोर मैनेजमेंट सामने आएगा. वहीं एमएलसी चुनाव में शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच उम्मीदवारों की पकड़, स्थानीय संगठन और मतदाता संपर्क की परीक्षा होगी.  इसलिए अक्टूबर में होने वाले ये 21 चुनावी मुकाबले उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी चर्चा में रहने वाले हैं.

सेमीफाइनल की चर्चा, लेकिन तस्वीर अलग-अलग होगी

राज्यसभा और MLC चुनाव को 2027 से पहले का राजनीतिक सेमीफाइनल कहा जा रहा है, लेकिन इनके नतीजों को विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत मानना सावधानी के बिना उचित नहीं होगा.

बावजूद इसके राजनीतिक दलों के लिए इन चुनावों का महत्व कम नहीं है. राज्यसभा चुनाव पार्टी के अंदरूनी गणित और विधायक प्रबंधन को परखेंगे, जबकि MLC चुनाव विशेष मदताता समूहों के बीच संगठन की पहुंच की तस्वीर दिखाएंगे. 

बहरहाल अब नजर 16 अक्टूबर के राज्यसभा चुनाव और उसके एक सप्ताह बाद 23 अक्टूबर के MLC चुनाव पर रहेगी. इन दोनों के बीच उम्मीदवार चयन, गठबंधन, नामांकन और चुनावी रणनीति उत्तर प्रदेश की 2027 की राजनीतिक तैयारियों को लेकर कई संकेत जरूर दे सकती है.

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