‘ऑपरेशन त्राशी-I’ में शहीद जवान को दी जाएगी अंतिम विदाई:थोड़ी देर में हेलिकॉप्टर से बागेश्वर पहुंचेगा पार्थिव शरीर, ग्रेनेड हमले में हुए थे घायल
जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में ‘ऑपरेशन त्राशी-I’ में शहीद हुए बागेश्वर के हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया का आज 20 जनवरी को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार होगा। हवलदार गजेंद्र सिंह का पार्थिव शरीर आज हेलिकॉप्टर से बागेश्वर लाया जाएगा। इसके बाद उन्हें उनके पैतृक गांव ग्राम पंचायत बिथ्थी (पाण्याती) पहुंचाया जाएगा, जहां सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी। अधिकारियों के मुताबिक आतंकियों के छिपे होने की आशंका में चल रहे अभियान के दौरान अचानक हुए ग्रेनेड हमले में वे घायल हो गए थे। छर्रे लगने से उन्हें गंभीर चोटें आईं और 18-19 जनवरी की रात को राज्य के एक सैन्य अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। व्हाइट नाइट कोर ने दी श्रद्धांजलि, 19 जनवरी को किया ट्वीट व्हाइट नाइट कोर ने 19 जनवरी को एक्स (ट्विटर) पर ट्वीट कर हवलदार गजेंद्र सिंह को श्रद्धांजलि दी। ट्वीट में कहा गया कि जनरल ऑफिसर कमांडिंग, व्हाइट नाइट कोर और सभी रैंकों ने स्पेशल फोर्स के हवलदार गजेंद्र सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। कोर ने बताया कि हवलदार गजेंद्र सिंह ने 18-19 जनवरी की रात को सिंगपोरा इलाके में चल रहे आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान बहादुरी से कार्रवाई करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। पोस्ट में उनके साहस, वीरता और कर्तव्यनिष्ठा को नमन करते हुए शोकाकुल परिवार के साथ खड़े रहने की बात कही गई। ग्रेनेड हमले में घायल हुए थे 8 सैनिक सुरक्षा बलों के अधिकारियों के मुताबिक चत्रू क्षेत्र के मंद्रल-सिंहपोरा के पास सोनार गांव में रविवार को आतंकियों के खिलाफ अभियान शुरू हुआ था। इसी दौरान आतंकियों की तरफ से अचानक ग्रेनेड हमला किया गया, जिसकी चपेट में सैनिक आ गए। अधिकारियों ने बताया कि इस हमले में 8 सैनिक घायल हुए थे। हमला होते ही सैनिकों को छर्रे लग गए और कई जवान घायल हो गए। इसी अभियान के दौरान हवलदार गजेंद्र सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। सैन्य अस्पताल में ली अंतिम सांस अधिकारियों के मुताबिक घायल जवानों में से एक हवलदार गजेंद्र सिंह ने 18 और 19 जनवरी की रात को राज्य के एक सैन्य अस्पताल में इलाज के दौरान अंतिम सांस ली। इसके बाद उनकी शहादत की खबर जैसे ही उत्तराखंड पहुंची, गांव और परिवार में कोहराम मच गया। अभियान दोबारा शुरू, घने जंगल और खड़ी ढलानों में सर्च ऑपरेशन अधिकारियों के मुताबिक ग्रेनेड धमाके के बाद अभियान को रविवार देर रात रोक दिया गया था। इसके बाद सोमवार सुबह से घने जंगल और खड़ी ढलान वाले चुनौतीपूर्ण इलाके में इसे फिर से शुरू किया गया है। बताया गया कि सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की कई टीमें इलाके की तलाशी ले रही हैं। ड्रोन और खोजी कुत्तों की मदद से लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। इलाके में कड़ी सुरक्षा घेराबंदी की गई है, ताकि आतंकवादी भाग न सकें। इलाके में 2 से 3 आतंकी फंसे होने की आशंका अधिकारियों के मुताबिक इलाके में पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से जुड़े 2 से 3 आतंकवादियों का एक समूह फंसा हुआ है। इसी को लेकर ‘ऑपरेशन त्राशी-I’ नाम से संयुक्त अभियान चलाया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि यह मुठभेड़ इस साल जम्मू क्षेत्र में सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच तीसरी झड़प है। इससे पहले 7 से 13 जनवरी के बीच कठुआ जिले के बिलवार क्षेत्र के कहोग और नजोते जंगलों में मुठभेड़ हुई थी, हालांकि किसी के मारे जाने की खबर नहीं थी। गांव में मातम, हर आंख नम हवलदार गजेंद्र सिंह के शहीद होने की सूचना मिलते ही गांव और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग उनके आवास पर पहुंचे। शोकाकुल परिजनों को ढांढस बंधाते हुए लोगों ने वीर सपूत को श्रद्धांजलि दी। गांव का माहौल पूरी तरह गमगीन नजर आया और हर आंख नम थी। परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़, पत्नी-बच्चों की हालत बिगड़ी हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया के परिवार में उनके पिता धन सिंह गढ़िया, माता चंदा गढ़िया, पत्नी लीला गढ़िया और दो पुत्र हैं। बड़ा पुत्र राहुल गढ़िया है, जबकि छोटा पुत्र धीरज गढ़िया कक्षा 4 में पढ़ता है और अपनी मां के साथ देहरादून में रहता है। जवान की पत्नी लीला गढ़िया दोनों पुत्रों के साथ हेलिकॉप्टर से गरुड़ के मेलाडुंगरी हेलीपैड पहुंचीं। वहां से टैक्सी द्वारा उन्हें कपकोट लाया गया। परिजनों के अनुसार पत्नी बार-बार बेसुध हो रही हैं, जबकि मासूम बच्चे पिता को याद कर उनसे लिपटकर फूट-फूट कर रो रहे हैं। गांव में शोक और सन्नाटा पसरा हुआ है। छोटे भाई शिक्षक बोले- देश सेवा ही था लक्ष्य शहीद के छोटे भाई किशन सिंह गढ़िया एंजल एकेडमी स्कूल में शिक्षक हैं। उन्होंने बताया कि गजेंद्र सिंह गढ़िया शुरू से ही देश सेवा के प्रति समर्पित थे और अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानते थे। उन्होंने कहा कि देश के लिए सेवा करना ही उनका लक्ष्य था और वे हमेशा अपनी ड्यूटी को प्राथमिकता देते थे। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने भी शहीद की वीरता को नमन किया है। मुख्यमंत्री धामी ने जताया शोक, दी श्रद्धांजलि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वीर जवान के बलिदान पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने शहीद के परिवार के प्रति संवेदना जताई और दुख की इस घड़ी में साथ खड़े रहने की बात कही।
बाजरा की नई किस्म:वैज्ञानिकों ने विकसित किया दुनिया का पहला "थ्री वे' सूखा रोधी बाजरा "RHB 273', कम बारिश में भी 28% तक ज्यादा फसल
देश के शुष्क क्षेत्रों के किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कम पानी में होने वाली बाजरा की नई किस्म विकसित की है। राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान दुर्गापुरा ने अंतरराष्ट्रीय संस्थान आईसीआर आईएसएटी के साथ मिलकर दुनिया का पहला "थ्री-वे' (त्रिधा) संकर बाजरा आर एचबी 273 विकसित किया है। यह नई किस्म न केवल सूखे से लड़ने में सक्षम है, बल्कि पैदावार और पोषण के मामले में भी पुरानी किस्मों से कहीं बेहतर है। हाल ही में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देश भर के लिए 25 फसलों की 184 उन्नत किस्में जारी की है। इसमें आरएचबी 273 को राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के उन अति-शुष्क क्षेत्रों के लिए अधिसूचित किया गया है, जहां पूरे साल में भी 400 मिमी से भी कम बारिश होती है। यह किस्म पारंपरिक बाजरे की तुलना में कई मायनों में ज्यादा लाभकारी है। तीन वर्षों के परीक्षण में इसने 22-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर अनाज की पैदावार दी है, जो मौजूदा किस्मों से 13 से 28% अधिक है। साथ ही यह कम समय में पककर तैयार हो जाएगी। यह फसल मात्र 75-76 दिनों में पककर तैयार हो जाती है, जिससे किसानों का समय बचेगा। यह हाइब्रिड है, जो अनाज के साथ-साथ 48 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उच्च गुणवत्ता वाला भूसा चारा भी देगा। कृषि वैज्ञानिक डॉ एसके जैन ने बताया कि रारी दुर्गापुरा में संचालित अखिल भारतीय समन्वित बाजरा अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान हैदराबाद के सहयोग से इस किस्म को विकसित किया है। यह किस्म बाजरे की प्रमुख बीमारियों जैसे "डाउनी मिल्ड्यू' और "ब्लास्ट' के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है। स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह किस्म लाभदायक है। इसमें 10.5% प्रोटीन, 44 पीपीएम आयरन और 37 पीपीएम जिंक पाया जाता है, जो कुपोषण से लड़ने में मददगार साबित होगा। इसकी पहचान करना भी आसान है क्योंकि इसके पुष्पगुच्छों पर विशेष रेशे होते हैं, जो इसे पक्षियों के नुकसान से भी बचाएंगे। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका 'थ्री-वे हाइब्रिड' होना है। इससे बीज उत्पादन की लागत कम आएगी। 3 से 3.5 लाख हेक्टेयर में कम बरसात राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में लगभग 3 से 3.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर वार्षिक वर्षा 400 मिमी से कम होती है। इस क्षेत्र की कठोर पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण बाजरे की पैदावार राष्ट्रीय औसत से लगभग 35% कम होती है। किस्मों की सीमित विविधता के कारण कृषि उत्पादकता भी कम है। राजस्थान में गत वर्ष 43.52 लाख हेक्टेयर में बाजरा बोया गया था। इसमें सर्वाधिक बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, सीकर, चूरू, नागौर, जालोर, अलवर, जयपुर आदि जिलों में खेती हो रही है।
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