Prabhasakshi NewsRoom: Chintan Shivir में अपने मंत्रियों के साथ PM Modi कर रहे 'महामंथन', कई बड़े फैसले होने वाले हैं!
सरकार चलाना सिर्फ फैसले लेने का नाम नहीं है, असली परीक्षा यह है कि फैसला जमीन पर कितनी तेजी से उतरता है और उसका फायदा आखिरी कतार में खड़े आदमी तक कितनी आसानी से पहुंचता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बुधवार से शुरू हुआ दो दिवसीय चिंतन शिविर इसी कसौटी पर सरकार के कामकाज को परखने की कवायद है। सरकार के तीसरे कार्यकाल के करीब आधे पड़ाव पर पहुंचे इस मंथन में सवाल सीधा है कि अब तक क्या हुआ, कहां कमी रह गई और अगले पड़ाव में क्या करना है?
पहले दिन चार घंटे से ज्यादा चली बैठक में शासन व्यवस्था, सुधारों, जनकल्याणकारी योजनाओं की पहुंच, महिलाओं और युवाओं तक सरकारी योजनाओं की जानकारी और लाभ पहुंचाने जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। मंत्रियों को आठ समूहों में बांटा गया और प्रधानमंत्री ने हर समूह के साथ अलग-अलग संवाद किया। यानी मामला सिर्फ भाषण का नहीं, सीधे फीडबैक का भी था। मंत्रियों से जानकारी ली गई, अनुभव सुने गए और आगे की दिशा को लेकर सुझाव दिए गए।
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मोदी की राजनीति और शासन शैली में एक बात लगातार दिखाई देती है कि दिल्ली में बैठकर सिर्फ फाइलें देखने की बजाय जनता की परेशानी को समझा जाता है और प्रशासन को उसके हिसाब से ढाला जाता है। यही वजह है कि इस चिंतन शिविर में भी जोर सिर्फ नई योजनाएं बनाने पर नहीं, बल्कि मौजूदा योजनाओं की डिलीवरी को बेहतर करने पर है। सरकारी मशीनरी में तालमेल बढ़े, मंत्रालय एक-दूसरे से कटकर काम न करें और लाभार्थी को एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर न लगाने पड़ें, यह सोच बैठक के केंद्र में दिखाई देती है।
साथ ही ‘जन विश्वास से जन आधार’ का विचार इसी राजनीतिक भाषा को प्रशासनिक जमीन देने की कोशिश है। मोदी सरकार की प्राथमिकता स्पष्ट है। सरकार सुधार, सुशासन, जीवन को आसान बनाना, अनावश्यक अनुपालन घटाना और सार्वजनिक सेवाओं को ज्यादा प्रभावी बनाने पर जोर दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी पहले भी मंत्रियों को यह संदेश देते रहे हैं कि सरकार का पहला काम जनता की समस्याओं का समाधान और जीवन को आसान बनाना होना चाहिए।
इस मंथन का दूसरा बड़ा पहलू है 'विकसित भारत 2047'। इसकी तैयारी वर्ष 2021 से चल रही है। दस सचिव समूहों को अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अल्पकालीन और दीर्घकालीन योजनाओं का खाका तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। विभिन्न क्षेत्रों के हितधारकों से व्यापक विचार-विमर्श हुआ और मंत्रिपरिषद के सामने अब तक आठ दौर की प्रस्तुतियां और चर्चाएं हो चुकी हैं। मौजूदा चिंतन शिविर उसी लंबी प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है।
इस बार सचिवों के समूहों, मंत्रालयों, विभागों, मंत्रिमंडल सचिवालय और नीति आयोग के काम को एक साथ देखने की कोशिश हो रही है। देखा जाये तो सरकार में काम बहुत हो रहा हो, लेकिन अगर एक मंत्रालय की योजना दूसरे मंत्रालय की कार्यप्रणाली से टकरा जाए तो जनता को फायदा नहीं मिलेगा। इसलिए अंतर-मंत्रालयी समन्वय, योजनाओं की प्रगति, नीति लागू करने की गति, समय प्रबंधन और सरकारी सेवाओं की पहुंच को खास महत्व दिया गया है।
आर्थिक मोर्चा भी इस मंथन से अलग नहीं है। मोदी सरकार विकास की रफ्तार बनाए रखने, घरेलू मांग और निवेश को गति देने तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आने वाले झटकों से अर्थव्यवस्था को बचाने की रणनीति पर भी विचार कर रही है। वैश्विक व्यापार की अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा कीमतों के जोखिम के बीच दीर्घकालीन लक्ष्य और तत्काल आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है।
यह बैठक इसलिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के मध्य चरण में है। आने वाले समय में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, गोवा, हिमाचल प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं और वर्ष 2029 का लोकसभा चुनाव भी सामने है। ऐसे में सरकार के सामने विकास योजनाओं को गति देने और उनके असर को जनता तक पहुंचाने की दोहरी चुनौती है।
उधर, विपक्ष ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं और कांग्रेस ने ‘चिंतन बैठक’ को ‘चिंता बैठक’ कहकर निशाना साधा है। लेकिन मोदी सरकार का तर्क और इस बैठक की संरचना एक अलग तस्वीर पेश करती है। यह स्पष्ट दिख रहा है कि मोदी सरकार अपने काम का हिसाब भीतर से लेने, कमियां पहचानने और आगे की प्राथमिकताएं तय करने की कोशिश कर रही है।
वैसे, इस प्रकार की कवायद का यह पहला मौका नहीं है। 21 अक्टूबर 2021 को भी ऐसा ही अभ्यास हुआ था, जिसमें शासन और नीति निर्माण पर चर्चा हुई थी। हम आपको यह भी बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रियों को मंत्रालयों के कामकाज के लाइव डैशबोर्ड रखने, योजनाओं की नियमित समीक्षा करने और कर्मचारियों से सीधे बातचीत कर फीडबैक लेने के निर्देश दिए गए हैं। यहां तक कि मंत्रालयों और विभागों की सरकारी वेबसाइटों को आम लोगों के लिए अधिक सरल और उपयोगी बनाने पर भी जोर दिया गया है।
देखा जाये तो राजनीति में जनता से जुड़ने की बात करना आसान है, लेकिन उसे सरकार के कामकाज में उतारना मुश्किल होता है। मोदी सरकार के इस चिंतन शिविर का मकसद भी यही है कि जनता की जरूरतों को समझा जाए, सरकार के कामकाज की समीक्षा की जाए और यह देखा जाए कि लोगों तक योजनाओं और सुविधाओं का फायदा कितनी तेजी से पहुंच रहा है। आखिरकार चुनावी नारों से ज्यादा असर उस काम का होता है जो गांव, कस्बे और शहर के आम आदमी की जिंदगी में दिखाई दे। सरकारी योजना का लाभ समय पर मिले, प्रक्रिया आसान हो, शिकायत सुनी जाए और मंत्रालयों की खींचतान का खामियाजा जनता को न भुगतना पड़े, यही वह जमीन है जहां किसी भी सरकार की असली परीक्षा होती है।
बहरहाल, मोदी का यह मंथन देश के आदमी तक सरकार की बात पहुंचाने और वहां से उसकी आवाज वापस सत्ता के गलियारों तक लाने की एक गंभीर कोशिश दिखाई दे रही है। उम्मीद है कि इस मंथन से निकला अमृत देश को बड़ा लाभ पहुँचायेगा और इस कवायद के बाद देश को कई बड़े फैसले देखने को मिलेंगे।
Sam Altman और Dario Amodei की UN से अपील, AI के विकास पर बने वैश्विक सुरक्षा नियम
प्रमुख कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) कंपनियों के प्रमुखों ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र से मानवता को बचाने के लिए अपील करते हुये कहा कि तेजी से विस्तार कर रही इस प्रौद्योगिकी को किसी तरह नियंत्रित किया जाना चाहिए, जिसे उन्होंने ही विकसित किया है। एंथ्रोपिक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डारियो अमोदेई ने कहा, ‘‘अगर एआई का प्रबंधन ठीक से नहीं किया गया तो मेरा मानना है कि यह पूरी मानवता के लिए खतरा बन सकता है।’’ वहीं, उनकी प्रतिस्पर्धी कंपनी ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने कहा, ‘‘हम एआई के हाथों भविष्य पर अपना नियंत्रण खो सकते हैं।’’ दोनों प्रमुखों ने कहा कि बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी बात रखने वाले दुनिया के देशों को इस तकनीक को इतना शक्तिशाली होने से रोकने के लिए किसी तरह के सुरक्षा उपाय तय करने होंगे, ताकि इसे नियंत्रित करना मुश्किल न हो जाए। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एआई की शक्ति किसी एक कंपनी या देश तक सीमित न हो।
उन्होंने मानवता की बेहतरी के लिए इस तकनीक के लाभों का भी उल्लेख किया और कहा कि एआई ‘‘लोगों को अपने जीवन पर अधिक नियंत्रण और शक्ति देने’’ में मदद कर सकता है। ब्रिटेन के विदेश मंत्री एड मिलिबैंड ने सुरक्षा परिषद में कहा, ‘‘ये तकनीकी नेता हमें स्पष्ट शब्दों में बता रहे हैं कि दुनिया पर किसी आपदा को आने से रोकने की जिम्मेदारी केवल उन्हीं पर नहीं छोड़ी जा सकती।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम उनकी बात को नजरअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि वे सही कह रहे हैं।’’ मिलिबैंड ने कहा कि अगले साल जब ब्रिटेन जी-20 की अध्यक्षता करेगा तो वह एआई को नियंत्रित करने के मुद्दे को चर्चाओं के केंद्र में रखेगा। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य ‘‘यह सुनिश्चित करने के लिए कि एआई का विकास सुरक्षित हो’’ एक समान वैश्विक मानक तैयार करना होगा।
अमेरिका के व्हाइट हाउस के विज्ञान सलाहकार माइकल क्रेटसियोस ने कहा, ‘‘एआई के नियंत्रण को लेकर चिंताएं इसके आगे के विकास को रोकने या इसे नए वैश्विक शासन ढांचे से सीमित करने का कारण नहीं हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम चाहते हैं कि हमारे सहयोगी और साझेदार इस तकनीक के लाभों में भागीदार बनें।’’ अमेरिका और चीन एआई में वर्चस्व के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में चीनी राजदूत फू कोंग ने जोर देकर कहा कि सभी देशों को अपनी जरूरत और पसंद के अनुसार एआई तकनीक चुनने में सक्षम होना चाहिए। उन्होंने बिना नाम लिए कुछ बड़ी शक्तियों पर ‘‘डिजिटल वर्चस्व’’ हासिल करने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
कोंग ने इसके बजाय देशों से ओपन-सोर्स मॉडल को बढ़ावा देने का आह्वान किया, जो इस तकनीक को लेकर चीन का दृष्टिकोण है। दुनिया के ज्यादातर नेताओं के लिए एआई को लेकर एक अहम सवाल यह है: जीवन और मृत्यु से जुड़े फैसलों पर नियंत्रण किसका होना चाहिए — इंसान का या मशीन का? इससे एक दिन पहले, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने ‘‘हत्यारे रोबोट’’ को लेकर चेताया था।
विशेषज्ञों और यूरोपीय नेताओं ने कहा कि यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है, और यह एक भयावह वास्तविकता है।
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