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देशभर में प्याज की आपूर्ति बढ़ाने की कवायद तेज, कोलकाता के लिए पहुंचेगी ‘कांडा एक्सप्रेस’

पश्चिम बंगाल में प्याज की आपूर्ति बढ़ाने के प्रयासों के तहत मूल्य स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ) के बफर स्टॉक से प्याज लेकर कांडा एक्सप्रेस गुरुवार को कोलकाता पहुंचने वाली है. एक आधिकारिक बयान में यह जानकारी दी गई है. पश्चिम बंगाल में एनएएफईडी और एनसीसीएफ की मोबाइल वैन के माध्यम से लगभग 1,400 मीट्रिक टन प्याज 35 रुपए प्रति किलो की दर से वितरित किया जा चुका है.

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि कांडा एक्सप्रेस के आने से अतिरिक्त मात्रा में प्याज की आवाजाही अधिक कुशलता से हो सकेगी, जिससे बाजार में उपलब्धता में सुधार होगा और मौसमी कीमतों पर दबाव कम होगा. बयान में आगे कहा गया कि आगमन से प्याज की अधिक मात्रा की आवाजाही में तेजी आने की उम्मीद है और कोलकाता और आसपास के जिलों में, विशेष रूप से त्योहारी मौसम से पहले, इसकी उपलब्धता और मजबूत होगी. बयान में आगे कहा गया है कि कोलकाता जाने वाली कांडा एक्सप्रेस, रेल और सड़क परिवहन के हाइब्रिड नेटवर्क के माध्यम से पीएसएफ बफर स्टॉक से प्याज की सुनियोजित आपूर्ति की चल रही रणनीति का हिस्सा है.

एनएएफईडी और एनसीसीएफ के माध्यम से बफर स्टॉक का लक्षित निपटान 24 अगस्त से शुरू हुआ, और बाजार की आवश्यकताओं के आधार पर देश के विभिन्न हिस्सों में आपूर्ति धीरे-धीरे भेजी जा रही है. मंत्रालय ने बताया कि कोलकाता में वर्तमान में 25 से अधिक स्थानों पर खुदरा बिक्री की जा रही है, जिनमें कोले मार्केट, मेचुआ मंडी, मानिकतला मार्केट, रामपुरिया मार्केट और श्याम बाजार जैसे प्रमुख बाजार शामिल हैं. इसके अलावा, सरकार ‘सुफल बंगला’ के माध्यम से बफर स्टॉक प्याज की खुदरा बिक्री की संभावना तलाश रही है, जिससे उपभोक्ताओं को अतिरिक्त पहुंच मिलेगी और इस पहल का दायरा व्यापक होगा. बफर स्टॉक से प्याज की आपूर्ति अब तक देश भर के 100 से अधिक शहरों में की जा चुकी है.

बफर स्टॉक हस्तक्षेप के बाद बाजार में उपलब्धता में सुधार का संकेत देते हुए, 17 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में खुदरा प्याज की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं या उनमें गिरावट आई है. पिछले सप्ताह जिन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में प्याज की कीमतों में गिरावट आई है, उनमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु और बिहार शामिल हैं.

Input: IANS

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2030 तक AI-आधारित 'ट्रांसफॉर्मेशन इंजन' बन सकते हैं भारत के जीसीसी: रिपोर्ट

भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) वर्ष 2030 तक केवल बैक-ऑफिस या सपोर्ट इकाइयों की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक कंपनियों के लिए एआई-संचालित 'एजेंटिक ट्रांसफॉर्मेशन इंजन' बन सकते हैं. डेल टेक्नोलॉजीज और जिनोव की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में वही जीसीसी सफल होंगे, जो केवल एआई प्रयोगों तक सीमित रहने के बजाय डेटा, तकनीक और शासन से जुड़ी मजबूत नींव तैयार कर वास्तविक कारोबारी परिणाम देने पर ध्यान देंगे.

रिपोर्ट के अनुसार, 70 प्रतिशत जीसीसी नेताओं के पास पहले से एआई से जुड़ा स्पष्ट रोडमैप या चार्टर मौजूद है. भारत के जीसीसी वैश्विक एआई प्रतिभा का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं और देश में 1,200 से अधिक जीसीसी केंद्र एआई तथा मशीन लर्निंग क्षमताएं विकसित कर चुके हैं. डेल टेक्नोलॉजीज इंडिया के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मनीष गुप्ता ने कहा कि जैसे-जैसे जीसीसी अधिक रणनीतिक जिम्मेदारियां संभालेंगे, डेटा, इंफ्रास्ट्रक्चर और गवर्नेंस जैसी मजबूत बुनियादी क्षमताएं नवाचार का आधार बनेंगी. उनका कहना है कि जो जीसीसी अभी से इन क्षेत्रों में निवेश करेंगे, वे तय करेंगे कि वैश्विक कंपनियां एआई का उपयोग किस प्रकार करेंगी.

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रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्तमान में 2,100 से अधिक जीसीसी कार्यरत हैं, जो लगभग 23.6 लाख लोगों को रोजगार देते हैं और वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 98.4 अरब डॉलर का राजस्व उत्पन्न कर चुके हैं. जिनोव के अध्यक्ष सिद्धांत रस्तोगी ने कहा कि पिछले दो दशकों में जीसीसी की चर्चा मुख्य रूप से पैमाने, प्रतिभा और क्षमताओं को लेकर होती थी, लेकिन अब अगला दशक 'स्वामित्व और नेतृत्व' का होगा. रस्तोगी ने कहा कि एआई और एजेंटिक सिस्टम्स के व्यवसायिक प्रक्रियाओं में शामिल होने के साथ जीसीसी से केवल सेवाएं देने की नहीं, बल्कि उत्पादों, प्लेटफॉर्म्स, बाजारों और कारोबारिक परिणामों की जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा की जाएगी.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 64 प्रतिशत जीसीसी नेता पहले से दोहरी वैश्विक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं. वे न केवल भारत स्थित केंद्रों का संचालन कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर किसी महत्वपूर्ण कारोबारी कार्य का नेतृत्व भी कर रहे हैं. एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि 66 प्रतिशत जीसीसी नेता अपनी एआई रणनीति में राजस्व और कारोबारी प्रभाव को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं. इससे स्पष्ट है कि एआई की चर्चा अब केवल लागत कम करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यवसायिक विकास और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त से जुड़ चुकी है.

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि एआई-आधारित एजेंटिक वर्कफ्लो पारंपरिक चैट-आधारित एआई सिस्टम्स की तुलना में कहीं अधिक कंप्यूटिंग संसाधनों की मांग करते हैं. जहां एक सामान्य चैट इंटरैक्शन में लगभग 1,000 से 2,000 टोकन्स की आवश्यकता होती है, वहीं एजेंटिक वर्कफ्लो में 10,000 से 5 लाख टोकन्स तक की जरूरत पड़ सकती है. इसलिए समय रहते सही इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश करना बेहद जरूरी होगा. अध्ययन में यह भी अनुमान लगाया गया है कि जीसीसी में होने वाले 55 प्रतिशत नियमित कार्य एआई आधारित ऑटोमेशन के दायरे में आ सकते हैं, जबकि वर्ष 2030 तक लगभग 60 प्रतिशत कार्यबल को नए कौशल सीखने (रिस्किलिंग) की आवश्यकता होगी, इसलिए अनिवार्यता एआई प्रशिक्षण में वृद्धि करने की नहीं, बल्कि कार्य की मौलिक रूप से पुनर्कल्पना करने की है.

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INPUT: IANS

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