मध्य प्रदेश में 'No UPI Day': ₹2000 से अधिक के डिजिटल भुगतान पर MDR चार्ज का व्यापारियों ने किया विरोध
मध्यप्रदेश में मर्चेंट पेमेंट्स पर लगने वाले प्रस्तावित एमडीआर (MDR) चार्ज के विरोध में राज्यभर के व्यापारियों ने 'नो यूपीआई डे' (No UPI Day) मनाकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है. राजधानी भोपाल, इंदौर और ग्वालियर सहित प्रदेश के प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों में दुकानदारों ने ऑनलाइन लेन-देन स्वीकार न करने का फैसला किया.
क्या है विवाद का मुख्य कारण?
सरकार द्वारा प्रस्तावित नए नियमों के अनुसार ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट यूपीआई भुगतानों पर 0.4% तक एमडीआर (Merchant Discount Rate) चार्ज लगाने का प्रावधान किया गया है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 तय की गई है. हालांकि यह शुल्क सीधे तौर पर आम जनता या आम ग्राहकों (P2P लेन-देन) पर लागू नहीं होगा. लेकिन व्यापारियों का मानना है कि इसका सीधा वित्तीय प्रभाव उन्हीं के व्यवसाय पर पड़ेगा. भोपाल शहर के न्यू मार्केट सहित विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में व्यापारियों ने क्यूआर कोड और यूपीआई स्कैनर पर विरोध जताते हुए डिजिटल भुगतान लेने से इनकार कर दिया. मोबाइल, पेंट और प्लाईवुड व्यवसाय से जुड़े दुकानदारों का कहना है कि ग्राहकों को पहले डिजिटल लेन-देन की आदत डाल दी गई और अब उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है. ग्वालियर में 'कैंपस एंड चैंबर ऑफ कॉमर्स' तथा अन्य व्यापारिक संगठनों ने इस फैसले का विरोध किया है. व्यापारियों का कहना है कि अकेले ग्वालियर में ही करोड़ों रुपये का मासिक यूपीआई टर्नओवर होता है. ऐसे में अतिरिक्त चार्ज से थोक और खुदरा कारोबार बुरी तरह प्रभावित होगा.
आयुर्वेद की 'बृहत्त्रयी' : चरक और सुश्रुत संहिता व अष्टांग हृदय' का महत्व, जिनमें छिपा है आयुर्वेद का सार
नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। बुधवार को 11वां राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया जा रहा है। इस अवसर पर आयुर्वेद के मूल आधार - बृहत्त्रयी यानी चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय के बारे में जानना बेहद प्रासंगिक है। आयुर्वेद में इन तीनों ग्रंथों को सबसे प्रामाणिक और सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
चरक संहिता की रचना की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। इसकी शुरुआत महर्षि पुनर्वसु आत्रेय के उपदेशों से हुई, जिन्हें उनके शिष्य अग्निवेश ने अग्निवेश तंत्र के रूप में लिपिबद्ध किया। बाद में आचार्य चरक ने इसी ग्रंथ का संपादन और परिमार्जन किया, जो आगे चलकर चरक संहिता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। समय के साथ इस ग्रंथ का कुछ हिस्सा विलुप्त हो गया था, जिसके एक-तिहाई (1/3) भाग को बाद में आचार्य दृढबल ने लिखकर इसे पूर्ण रूप दिया।
आयुर्वेद में कहा गया है कि चरकस्तु चिकित्सिते श्रेष्ठ: यानी चिकित्सा के क्षेत्र में चरक श्रेष्ठ हैं। यह ग्रंथ 8 स्थानों और 120 अध्यायों में बंटा है। इनमें सूत्रस्थान 30, निदानस्थान 8, विमानस्थान 8, शारीरस्थान 8, इन्द्रियस्थान 12, चिकित्सास्थान 30, कल्पस्थान 12 और सिद्धिस्थान 12 अध्याय शामिल हैं।
सूत्रस्थान में स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग निवारण के मूल सिद्धांत हैं। विमानस्थान में दोष-भेषज-देश-काल-बल जैसे भावों का अंशांश विकल्प बताया गया है। शारीरस्थान में सत्व, आत्मा और शरीर का संबंध बताया गया है कि शरीरं हि सत्त्वमनुविधीयते सत्त्वं च शरीरम्।
चरक का प्रसिद्ध सिद्धांत है कि शमन चिकित्सा से दबा रोग फिर लौट सकता है, लेकिन संशोधन यानी पंचकर्म से नष्ट रोग दोबारा नहीं होता, जिता संशोधनैर्ये तु न तेषां पुनरुद्भव:।
वहीं, सुश्रुत संहिता शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का मूल और प्रामाणिक ग्रंथ है। काशीराज दिवोदास धन्वंतरि के उपदेशों को उनके योग्य शिष्य और विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत ने इस ग्रंथ के रूप में संकलित किया था। बाद में, पांचवीं शताब्दी में नागार्जुन ने इसमें उत्तरतंत्र जोड़कर इसका संशोधन किया। आधुनिक सर्जन भी महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक मानते हैं।
मूल रूप से यह 5 स्थानों और 120 अध्यायों में थी, जिनमें सूत्रस्थान 46, निदानस्थान 16, शारीरस्थान 10, चिकित्सास्थान 40, कल्पस्थान 8 अध्याय हैं। इसके बाद उत्तरतंत्र के 66 अध्याय जोड़ने पर अब कुल 186 अध्याय हैं।
इसमें अष्टविध शल्यकर्म, यंत्र, शस्त्र, क्षारकर्म, अग्निकर्म, जलौकावचारण, कर्णव्यध, व्रणबंधन जैसे शल्य सिद्धांतों का अद्भुत वर्णन है। शारीरस्थान में मर्मशारीर का वर्णन आधुनिक विज्ञान के लिए भी कौतूहल का विषय है। इसीलिए कहा गया कि शारीरे सुश्रुत: श्रेष्ठ:। इस पर डल्हण की निबन्धसंग्रह टीका सबसे लोकप्रिय है।
अष्टांग हृदय को आयुर्वेद का सार कहा जाता है। अष्टांग हृदय के लेखक सिंहगुप्त के पुत्र आचार्य वाग्भट हैं। इसमें 120 अध्याय छह खंडों में विभाजित हैं। वाग्भट स्वयं कहते हैं कि जैसे शरीर में हृदय सबसे महत्वपूर्ण है, वैसे ही आयुर्वेद के आठ अंगों का सार इस ग्रंथ में है।
उन्होंने कहा कि आयुर्वेद रूपी सागर को मंथने से अष्टांग संग्रह रूपी अमृत निकला और उसी से अष्टांग हृदय की उत्पत्ति हुई। इसमें बिखरी हुई जानकारी को एक जगह एकत्र किया गया है, जैसे अलग-अलग खेतों से जौ इकट्ठा करके ढेर बनाया जाता है।
अष्टांग आयुर्वेद के आठ अंग हैं। इनमें काया चिकित्सा, शल्य तंत्र, शालाक्य तंत्र (आंख, नाक, कान, गला), कौमारभृत्य (बाल रोग), अगदतंत्र (विष विज्ञान), भूत विद्या (मनोचिकित्सा), रसायन (कायाकल्प) और वाजीकरण शामिल है।
आज के समय में जब पूरी दुनिया आयुर्वेद की ओर लौट रही है, बृहत्त्रयी का अध्ययन न केवल चिकित्सकों के लिए, बल्कि हर भारतीय के लिए अपनी जड़ों को समझने का माध्यम है।
--आईएएनएस
एससीएच/एएस
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