108 साल पहले भारतीय सैनिकों ने ऐसे कराई थी हाइफा की आजादी, दिल्ली के तीन मूर्ति हाइफा चौक पर मना विजय दिवस
भारतीय वीरता की वो कहानी, जिसकी गूंज 108 साल बाद भी भारत और इजराइल में सुनाई देती है. 23 सितंबर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय रियासतों की सेनाओं से जुड़े घुड़सवार लांसर्स ने ऑटोमन साम्राज्य के कब्जे वाले हाइफा पर निर्णायक हमला किया था. घोड़ों पर सवार भारतीय सैनिकों ने भाले और तलवारों के साथ ऐसी सैन्य कार्रवाई की, जिसने हाइफा पर मित्र राष्ट्रों का कब्जा स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई.
इसी ऐतिहासिक घटना की 108वीं वर्षगांठ पर बुधवार को नई दिल्ली के तीन मूर्ति हाइफा चौक पर भारत और इजराइल के लोगों ने एक साथ हाइफा विजय दिवस मनाया. कार्यक्रम में भारतीय सैनिकों के साहस, भारत-इजराइल के ऐतिहासिक संबंध और दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक एवं रणनीतिक सहयोग को याद किया गया.
23 सितंबर 1918... जब भारतीय लांसर्स ने किया हाइफा पर हमला
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिक ब्रिटिश भारतीय सेना के हिस्से के रूप में पश्चिम एशिया के विभिन्न मोर्चों पर तैनात थे. हाइफा अभियान में 15वीं इम्पीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसमें जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लांसर्स शामिल थे. भारत के विदेश मंत्रालय की ऐतिहासिक सामग्री के मुताबिक सितंबर 1918 में सीरिया अभियान के दौरान 15वीं इम्पीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड ने हाइफा की ओर बढ़ते हुए एक संकरे मार्ग से घुड़सवार हमला किया और शहर पर कब्जा किया. विदेश मंत्रालय ने इसे मजबूत किलेबंदी के खिलाफ घुड़सवार सेना के हमले का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बताया है.
23 सितंबर 1918 की इस कार्रवाई को भारतीय सैन्य इतिहास में विशेष महत्व दिया जाता है. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार हाइफा पर हमले के दौरान भारतीय सैनिकों ने भारी प्रतिरोध के बीच कार्रवाई की. अलग-अलग स्रोतों में हताहतों के आंकड़ों में अंतर मिलता है; 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मौजूदगी में हुए समारोह से जुड़े सरकारी/मीडिया विवरणों में 44 भारतीय सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान का उल्लेख किया गया था.
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तीन मूर्ति में क्यों लगी हैं तीन प्रतिमाएं?
दिल्ली का तीन मूर्ति स्मारक सीधे तौर पर इसी सैन्य इतिहास से जुड़ा हुआ है. यहां स्थापित तीन कांस्य प्रतिमाएं हैदराबाद, जोधपुर और मैसूर लांसर्स का प्रतिनिधित्व करती हैं. तीनों रियासतों की सेनाएं 15वीं इम्पीरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड का हिस्सा थीं. यही वजह है कि तीन मूर्ति चौक केवल दिल्ली का एक ऐतिहासिक चौराहा नहीं, बल्कि प्रथम विश्व युद्ध के पश्चिम एशियाई मोर्चे पर भारतीय सैनिकों की भूमिका की स्मृति से भी जुड़ा स्थल है.
मोदी-नेतन्याहू की मुलाकात के दौरान बदला नाम
जनवरी 2018 में इजराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत दौरे पर आए थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेतन्याहू ने तीन मूर्ति स्मारक पर भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि दी और तीन मूर्ति चौक का नाम बदलकर 'तीन मूर्ति हाइफा चौक' किया गया. दोनों नेताओं ने स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की और विजिटर बुक में हस्ताक्षर किए थे. भारत के विदेश मंत्रालय की उस समय की सामग्री में भी तीन मूर्ति चौक के नामकरण को हाइफा की लड़ाई में भारतीय सैनिकों की भूमिका से जोड़ा गया है.
हाइफा और भारत का रिश्ता आज भी इतिहास की किताबों में
हाइफा की लड़ाई की कहानी आज भारत-इजराइल संबंधों के ऐतिहासिक संदर्भ का हिस्सा बन चुकी है. इजराइल में भी भारतीय सैनिकों की भूमिका को अलग-अलग स्मृति कार्यक्रमों और सैन्य इतिहास के माध्यम से याद किया जाता है. हालांकि हाइफा की लड़ाई को लेकर ऐतिहासिक विवरणों और उसकी व्याख्या में अंतर भी मिलता है. इसलिए इसे केवल एक प्रतीकात्मक सैन्य कथा के रूप में नहीं, बल्कि प्रथम विश्व युद्ध के व्यापक पश्चिम एशियाई अभियान के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है. 23 सितंबर को भारत में 'हाइफा डे' के तौर पर याद किए जाने की परंपरा रही है और भारतीय सेना की 61 कैवेलरी भी इस तारीख को अपने इतिहास से जोड़ती है. 2018 के समारोह से जुड़े विवरणों में इसे 61 कैवेलरी का रेजिमेंटल 'हाइफा डे' बताया गया था.
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तीन मूर्ति हाइफा चौक पर 108वीं वर्षगांठ
बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय और इजराइली प्रतिनिधियों ने 23 सितंबर 1918 की उस सैन्य कार्रवाई को याद किया. कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता और प्रचारक इंद्रेश कुमार ने भारतीय सैनिकों के साहस, उनके मनोबल तथा भारत और इजराइल के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों पर बात की. उन्होंने भारत और यहूदी समुदाय के बीच लंबे समय से चले आ रहे संपर्क तथा दोनों सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक समरसता का उल्लेख किया. हाइफा की लड़ाई को उन्होंने भारत और इजराइल के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव के एक महत्वपूर्ण प्रतीक के तौर पर रेखांकित किया.
इजराइल की ओर से नई दिल्ली स्थित इजराइली दूतावास के राजनीतिक सलाहकार Nittai Ben-Haiem कार्यक्रम में शामिल हुए. वे हाल ही में नई दिल्ली में राजनीतिक सलाहकार के रूप में अपनी नई जिम्मेदारी संभालने पहुंचे हैं और इजराइली दूतावास ने भी उनके भारत आगमन की जानकारी सार्वजनिक की है. Ben-Haiem ने भारत और इजराइल के मौजूदा संबंधों तथा भविष्य में दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं पर बात की. उनके संदेश में भारत-इजराइल साझेदारी को दोनों देशों के बीच विश्वास, साझा हितों, नवाचार और दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच संबंधों से जोड़कर देखा गया है.
सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं, रिश्तों की ऐतिहासिक कड़ी
हाइफा की 1918 की लड़ाई आज भारत और इजराइल के संबंधों में एक ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में सामने आती है. एक तरफ यह प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों की भूमिका और बलिदान को याद करने का अवसर है, तो दूसरी तरफ तीन मूर्ति हाइफा चौक इस इतिहास को दिल्ली के सार्वजनिक स्थान से जोड़ता है. 2018 में तीन मूर्ति चौक के नामकरण के समय भी यही इतिहास भारत-इजराइल संबंधों के संदर्भ में प्रमुखता से सामने आया था. प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू द्वारा संयुक्त रूप से भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देना इस ऐतिहासिक स्मृति को दोनों देशों के आधुनिक राजनयिक संबंधों से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण क्षण था.
108 साल बाद भी 23 सितंबर की तारीख यह याद दिलाती है कि प्रथम विश्व युद्ध के वैश्विक संघर्ष में भारतीय सैनिक केवल भारत के बाहर तैनात सैनिक नहीं थे, बल्कि उन्होंने पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में भी निर्णायक भूमिका निभाई थी. दिल्ली का तीन मूर्ति हाइफा चौक इसी इतिहास का एक स्थायी स्मारक है.
Pitru Paksha 2026: क्या महिलाएं पितृ पक्ष में कर सकती है पिंडदान? जानें क्या लिखा है गरुड़ पुराण में
Pitru Paksha 2026: इस वर्ष पितृपक्ष का प्रारंभ 26 सितंबर 2026 से होने वाला है. यह अवधि पितरों की आत्मा की शांति के लिए खास माना जाता है. पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं. सनातन धर्म में पिंडदान भी एक विशेष रीति है, जिसका पालन करना शुभ होता है. आमतौर पर आपने देखा होगा कि पितरों के लिए किए जाने वाले इन कार्यों को करने के लिए परिवार के पुरुष ही सही माने जाते हैं. इस कारण ही लोगों में गलत धारणा बन गई है कि सिर्फ पुरुष ही इस कर्म को कर सकते हैं. यह कार्य महिलाएं नहीं कर सकती है. जबकि धर्मग्रंथों में श्राद्ध के नियम काफी अलग बताए गए हैं.
सनातन परंपराओं के अनुसार, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके निमित्त श्राद्ध व तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं. धार्मिक मान्यता है कि इन कार्यों के जरिए मृतक के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य व्यक्त करना होता है. मगर सवाल यह है कि यदि किसी के परिवार में कोई पुरुष या उत्तराधिकारी नहीं है, तो क्या महिलाएं भी पिंडदान कर सकती है? आइए जानते हैं गरुड़ पुराण इस पर क्या कहता है.
गरुड़ पुराण में महिलाओं के श्राद्ध करने पर क्या नियम है?
गरुड़ पुराण में श्राद्ध कर्म के महत्व और उसे करने वाले व्यक्ति के बारे में व्याख्या की गई है. इस ग्रंथ में एक श्लोक है, जिसमें बताया गया है कि पुत्र के अभाव में पत्नी, बहू और अन्य निकट संबंधियों द्वारा श्राद्ध करना चाहिए. यह श्लोक है- पुत्राभावे वधू: कुर्यात् आर्याभावे शिष्य एव वा...
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क्या इस श्लोक का मतलब?
गरुड़ पुराण में वर्णित इस श्लोक का अर्थ है कि यदि पुत्र उपलब्ध न हो, तो परिस्थितियों के अनुसार, पत्नी या बहू श्राद्ध कर्म कर सकती है. यदि इनका अभाव है तो परिवार के अन्य सदस्य जैसे की भाई-भतीजा या भांजा भी श्राद्ध और पिंडदान कर सकते हैं. अगर ऐसे निकट संबंध के रिश्तेदार न हो तो, मित्र, शिष्य या अन्य योग्य मनुष्य भी श्राद्ध कर सकता है. इससे संकेत मिल रहा है कि श्राद्ध कर्म को लेकर सिर्फ पुरुषों की आवश्यकता वाली धारणा गलत है. यह रीति-रिवाज सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं है और जरूरत पड़ने पर घर की महिलाएं भी पिंडदान कर सकती है.
क्या महिलाएं पिंडदान कर सकती हैं?
धर्मशास्त्रों में मत थोड़े भिन्न भी हो सकते हैं. जैसे कि धार्मिक परंपराओं के अनुसार, पुत्र या निकट पुरुष संबंधियों को ही श्राद्ध व पिंडदान करने का अधिकार है. लेकिन पुत्र ने होने पर परिस्थितियां अलग होती है. इसलिए, पत्नी, पुत्रवधू और अन्य योग्य परिजन द्वारा श्राद्ध कर्म किया जा सकता है. इसलिए, ऐसा कहना भी सही नहीं है कि हर परिस्थिति में महिलाओं द्वारा पिंडदान होना चाहिए और न ही वे पूरी तरह इससे वंचित है. पारिवारिक स्थिति के अनुसार ही सही व्यक्ति का चुनाव किया जाता है.
सीता माता भी किया था राजा दशरथ का पिंडदान!
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सीता और राजा दशरथ की कथा का उल्लेख मिलता है. प्रचलित कथा बताती है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, सीता माता और लक्ष्मण गया पहुंचे थे. वहां उन्हें दशरथ जी का श्राद्ध करना था. कथा के मुताबिक, राम और लक्ष्मण दोनों ही श्राद्ध सामग्री एकत्रित करने गए थे. इसी दौरान माता सीता को राजा दशरथ के दर्शन हुए और उन्होंने सीता जी को समय निकलने से पूर्व ही पिंडदान करने की इच्छा व्यक्ति की. इसके बाद माता सीता ने फल्गु नदी, केतकी फूल और बरगद के पेड़ को साक्ष्य मानकर रेत का पिंड बनाकर राजा दशरथ का पिंडदान किया था. यह कथा मुख्य रूप से धार्मिक परंपराओं और गया की मान्यताओं में प्रचलित बताई जाती है. इसे महिलाओं द्वारा पिंडदान करने का मुख्य उदाहरण माना जाता है.
तो यानी महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती है?
धार्मिक ग्रंथों के बताई गई अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार, महिलाओं द्वारा श्राद्ध करने के वर्णन है. खासतौर पर पुत्र, पति, निकट पुरुष संबंधियों के अभाव में पत्नी या पुत्रवधू श्राद्ध कर्म कर सकती है. हालांकि, सनातन धर्म में कई संप्रदाय हैं और हर स्थान की और परिवार की परंपराएं अलग हो सकती है. इसलिए, वहां के नियम अलग भी हो सकते हैं. सलाह दी जाती है कि ऐसे कार्यों को स्वयं न करें बल्कि किसी योग्य ब्राह्मण की सलाह लेने के बाद ही करें.
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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